Friday, March 16, 2012

इस 'खुदकुशी' ने दिनेश त्रिवेदी को नेता बना दिया

दुर्भाग्य से हाल के वर्षों में हमारे रेल मंत्री रेलवे की आर्थिक सेहत और ढांचागत विकास की बजाए लोकलुभावन घोषणाओं के लिए ज्यादा बेताब रहे हैं। दिनेश त्रिवेदी ने इस ढर्रे से आगे बढ़ने की कोशिश की है। उनके इस दावे को स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं बनता कि उन्होंने अपने पद की तुलना में भारतीय रेल के हितों को तरजीह दी है। अफसोस कि गठबंधन राजनीति, स्वार्थी राजनैतिक दलों और अहंवादी राजनेताओं के युग में संतुलित और भविष्योन्मुखी बजट पेश करने का अंत श्री त्रिवेदी जैसा दुखद होता है।

-बालेन्दु शर्मा दाधीच

दिनेश त्रिवेदी ने अपने रेल बजट भाषण की शुरूआत में अपने पूर्ववर्तियों को, जिनमें लाल बहादुर शास्त्री भी शामिल थे, याद किया था। इस तुलना को देखकर विपक्षी सांसदों के चेहरों पर मुस्कुराहट थी लेकिन त्रिवेदी अडिग थे। जैसा कि बाद में दिन भर घटी घटनाओं से साफ हो गया, श्री त्रिवेदी 'शहीदी अंदाज' में अपने राजनैतिक जीवन का सबसे बड़ा कदम उठाने जा रहे थे। उन्होंने संयत अंदाज में पेश किए गए अपने लंबे बजट भाषण के दौरान बहुत से नए प्रशंसक बनाए होंगे, जिसके दर्जनों प्रावधान न सिर्फ उनके पूर्ववर्तियों- ममता बनर्जी और लालू प्रसाद यादव की बनाई लीक से हटकर थे बल्कि भारतीय रेलवे की समस्याओं, जरूरतों और भविष्य की तैयारी के प्रति उनकी अच्छी समझबूझ को भी जाहिर कर रहे थे। ऐसे समय पर, जबकि परिवहन के क्षेत्र में बाकी सभी सेवाओं के शुल्क तेजी से बढ़े हैं, रेलवे को बरस.दर.बरस किसी भी तरह की शुल्क वृद्धि से मुक्त रखना न तो व्यावहारिक हो सकता है और न ही सेहतमंद, खासकर तब जब वह लगातार भारी घाटा उठा रही हो। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे रेल मंत्री पारंपरिक रूप से रेलवे की आर्थिक सेहत या विकास की बजाए लोकलुभावन घोषणाओं के लिए ज्यादा बेताब रहे हैं। दिनेश त्रिवेदी के इस दावे को स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं बनता कि उन्होंने अपने पद की तुलना में भारतीय रेल के हितों को तरजीह दी है। अफसोस कि गठबंधन राजनीति, स्वार्थी राजनैतिक दलों और अहंवादी राजनेताओं के युग में संतुलित और भविष्योन्मुखी बजट पेश करने का अंत श्री त्रिवेदी जैसा दुखद होता है।

कुछ दिन पहले तक दिनेश त्रिवेदी की छवि एक नामालूम से केंद्रीय मंत्री की थी जो बार-बार अपनी पार्टी अध्यक्ष द्वारा उपेक्षित किया जा रहा था। खबर थी कि दिल्ली से कोलकाता की एक फ्लाइट में ममता बनर्जी ने उन्हें पीछे की सीट पर भेज दिया था और मुकुल राय को अपने साथ बैठने को कहा था। कहा जाता है कि श्री त्रिवेदी की कुछ गतिविधियों से ममता बनर्जी खफा थीं। ये गतिविधियां क्या थीं? वे पिछले कुछ महीनों से राज्यों के दौरे कर वहां के मुख्यमंत्रियों से मुलाकात कर रहे थे और उनके राज्य की जरूरतों को समझने की कोशिश कर रहे थे। कोई केंद्रीय मंत्री अगर राज्य सरकारों के साथ समझबूझ कायम करने की कोशिश करता है तो शायद हर कोई इसे सराहेगा। लेकिन ममता बनर्जी नहीं, जो दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों की तरह किसी भी नेता को 'ढील' नहीं देना चाहतीं। हालांकि श्री त्रिवेदी की छवि किसी तेज-तर्रार मंत्री की नहीं रही, लेकिन ऐसा लगता है कि वे रेल मंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारी को काफी संजीदगी से ले रहे थे। शायद ममता बनर्जी की तुलना में कुछ ज्यादा ही, जिन्होंने लालू प्रसाद यादव के कायर्काल के दौरान भारी लाभ में चल रही रेलवे को घाटे, दूरंतो और कुछ लोकलुभावन वादों के सिवा ज्यादा कुछ नहीं दिया। दिनेश त्रिवेदी का बजट भाषण भी ममता बनर्जी की तुलना में बेहतर, संतुलित और संयमित था, जिसमें गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की पंक्तियों से लेकर कई शेरों और कविताओं को शामिल कर उन्होंने भाषा तथा अभिव्यक्ति पर ममता बनर्जी से बेहतर पकड़ का परिचय दिया। लेकिन जिस एक बात को शायद तृणमूल कांग्रेस पचा नहीं सकी, वह यह थी कि यह बजट भी ममता बनर्जी के पारंपरिक बजटों से कहीं बेहतर, ज्यादा व्यावहारिक और भविष्योन्मुखी था।

ममता बनर्जी की मांग पर जिन्हें रेल मंत्री बनना है, उन मुकुल राय से बहुत ज्यादा उम्मीद मत लगाइए। ये वही मुकुल राय है जिन्होंने एक ट्रेन हादसे के बाद प्रधानमंत्री द्वारा घटनास्थल पर पहुंचने का निदेर्श मिलने पर टका सा जवाब दिया था कि घटनास्थल को साफ किया जा चुका है और वहां जायजा लेने जैसी कोई जरूरत नहीं है। अलबत्ता, क्षेत्रीय क्षत्रपों की अल्पदृष्टि आधारित, 'सुरक्षित' राजनीति में ऐसे मंत्री ज्यादा अनुकूल समझे जाते हैं। याद कीजिए सुरेश प्रभु को, जिन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के जमाने में शिव सेना ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटवा दिया था जबकि नदियों को जोड़ने की परियोजना जैसे मामलों में उनकी भूमिका उत्कृष्ट रही थी। छोटे दलों के नेताओं को जरूरत से ज्यादा कायर्कुशलता दिखाना भारी पड़ जाता है। आपको दयानिधि मारन भी याद होंगे जिन्हें द्रमुक ने यूपीए.1 के दौरान केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटवाया था।

रेलवे को पटरी पर लाने की कोशिश

दिनेश त्रिवेदी के रेल बजट में नई रेलगाङ़ियों, नई रेलवे लाइनें बिछाने, दोहरीकरण और विद्युतीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने, ज्यादा माल ढुलाई और ज्यादा यात्रियों के लक्ष्य जैसे पारंपरिक फीचर तो हैं ही, लालू प्रसाद यादव की तरह बहुत नई जमीन न तोड़ते हुए भी कई किस्म की साहसिक और नई पहल की गई है। लालू प्रसाद यादव के कायर्काल को छोड़ दें तो भारतीय रेल अपना काम चलाने के लिए वित्त मंत्रालय की मेहरबानी पर ही निभ्रर रही है। ममता बनर्जी के कायर्काल में वह फिर से अपनी दयनीय स्थिति में लौट आई थी। लेकिन अब देश जिस किस्म की आर्िथक नीतियों पर चल रहा है, उनकी सफलता के लिए जरूरी है कि हर मंत्रालय आत्मनिभ्रर हो। वह न सिर्फ अपना खर्च खुद उठा सके, नए इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास कर सके बल्कि केंद्र सरकार को भी आर्िथक योगदान दे सके। उस लिहाज से लालू यादव के जमाने में रेलवे ने सही दिशा पकड़ी थी। दिनेश त्रिवेदी ने उसी दिशा को फिर से पकड़कर रेलवे को पटरी पर लाने का प्रयास किया है, हालांकि उनकी शैली लालू प्रसाद से अलग है।

रेल किराये बढ़ाने के मुद्दे पर ममता बनर्जी के पारंपरिक रुख से अवगत होते हुए भी उन्होंने सिर्फ धनी लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली श्रेणियों में ही नहीं बल्कि आम लोगों से जुड़ी श्रेणियों (जनरल डिब्बे और स्लीपर क्लास) के किरायों में भी मामूली बढ़ोत्तरी की है। मिसाल के तौर पर दिल्ली से पटना के बीच जनरल क्लास के किराए में कुल बीस रुपए की वृद्धि। किलोमीटर के लिहाज से जनरल डिब्बे में दो पैसे प्रति किलोमीटर और स्लीपर क्लास में पांच पैसे प्रति किलोमीटर की वृद्धि हुई है जिससे हम रेलयात्रियों को शायद कोई विशेष समस्या न हो लेकिन ममता बनर्जी को तकलीफ है जो खुद को गरीबों की मसीहा मानती हैं। बहरहाल, पार्टी में पीङ़ित और उपेक्षित श्री त्रिवेदी ने शायद अपनी 'राजनैतिक शहादत' से पहले लोकलुभावन कदमों की बजाए आर्थिक हालात के लिहाज से फैसले करना जरूरी समझा क्योंकि, उन्हीं के शब्दों में 'रेलवे को एअर इंडिया की दिशा में नहीं जाने दिया जाना चाहिए।'

रेल सुरक्षा और आधुनिकीकरण पर फोकस

श्री त्रिवेदी के रेल बजट में किराए बढ़ाकर करीब सात हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व जुटाने की व्यवस्था की है। इस समय किरायों के मद पर रेलवे को करीब बीस हजार करोड़ रुपए का सालाना नुकसान हो रहा है। रेल मंत्रालय ने केंद्रीय बजट में 45 हजार करोड़ रुपए की मांग की थी लेकिन उसे 24 हजार करोड़ रुपए ही आवंटित किए गए हैं। ऐसे में उसे नए स्रोतों की तलाश, सरकारी और निजी भागीदारी और रेलवे की परिसंपित्तयों के व्यावसायिक दोहन के जरिए एक मजबूत वित्तीय मॉडल तैयार करने की जरूरत है। खासकर तब जब आप सचमुच रेलवे का आधुनिकीकरण करना चाहते हों। श्री त्रिवेदी ने डॉ॰ अनिल काकोदकर और सैम पित्रोदा समितियों द्वारा रेलवे के आधुनिकीकरण और सुरक्षा संबंधी सिफारिशों पर अमल की बात कही है। भारतीय रेलवे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के लिए यह जरूरी है, लेकिन इन पर अमल का मतलब है अगले पांच साल में करीब दस लाख करोड़ रुपए का निवेश। सिर्फ वित्त मंत्री की उदारता पर निभ्रर रहकर इस किस्म का कायाकल्प संभव नहीं है। श्री त्रिवेदी को अहसास है कि रेलवे के कायाकल्प के लिए जिस किस्म के संसाधनों की जरूरत है, वे निजी क्षेत्र को साथ लिए बिना नहीं जुटाए जा सकते। इसी लिहाज से उन्होंने निजी क्षेत्र के साथ मिलकर रेलवे स्टेशनों के विकास और आधुनिकीकरण के लिए स्टेशन डेवलपमेंट कारपोरेशन की स्थापना का प्रावधान किया है, जिसका उद्योग जगत ने स्वागत किया है। इसके तहत अगले पांच साल में सौ प्रमुख रेलवे स्टेशनों का नए सिरे से विकास किया जाएगा।

रेल दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारण रेलयात्री अपनी सुरक्षा को लेकर लंबे अरसे से आशंकित रहे हैं। सन 2002 से 2001 के बीच कुल मिलाकर 1406 रेल हादसे हो चुके हैं जिनमें एक हजार से ज्यादा लोगों की जान गई है। रेल हादसों की रोकथाम के लिए आधुनिक संचार प्रणालियों और उपकरणों की खरीद पर चर्चा तो कम से कम दो दशकों से हो रही है लेकिन जमीनी स्तर पर हालात बदलते नहीं दिखाई दे रहे। लेकिन इस बार किसी मंत्री ने इन हादसों को गंभीरता से लिया है। श्री त्रिवेदी ने सुरक्षा के लिहाज से ढांचागत सुधार के लिए आठ हजार करोड़ रुपए का आवटन किया है। अगले पांच साल के भीतर बिना फाटक वाले रेलवे क्रासिंग को खत्म करने, एक स्वतंत्र रेलवे सुरक्षा प्राधिकरण की स्थापना, रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम के आधुनिकीकरण और उपग्रह आधारित रियल टाइम ट्रेन सूचना प्रणाली शुरू करने जैसे प्रावधान किए गए हैं। तीन हजार किलोमीटर की दूरी में ट्रेनों की भिड़ंत रोकने के लिए हाई.टेक रेलवे प्रोटेक्शन और वार्निंग सिस्टम लगाया जाने वाला है। रेलों और प्लेटफॉर्मों को साफ.सुथरा बनाना भी भले ही छोटा सा काम प्रतीत हो लेकिन यात्रियों की सेहत के लिहाज उसकी अहमियत में कोई संदेह नहीं है। दिनेश त्रिवेदी से ऐसी उम्मीद नहीं थी। कुछ तो उनके राजनैतिक दल के कारण और कुछ उनकी निष्क्रिय सी छवि के कारण भी। लेकिन उन्होंने सबको चौंका दिया है। न सिर्फ रेलवे के बारे में अपनी समझ से, बल्कि अपने विभाग की खातिर राजनैतिक आत्महत्या के लिए तैयार होकर भी। उन्हें यकीनन याद किया जाएगा।

(जागरण में प्रकाशित)

Tuesday, January 31, 2012

सुप्रीम कोर्ट में सेनाध्यक्ष

भले ही आप जनरल वीके सिंह के नजरिए से सहमत हों या नहीं, भारत के थलसेनाध्यक्ष होने के साथ.साथ वे एक सामान्य नागरिक भी हैं, जिसे अदालत की शरण में जाने का पूरा अधिकार प्राप्त है।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

अपनी आयु के विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाने के जनरल वीके सिंह के 'अप्रत्याशित' कदम ने सेना और सरकार दोनों को झकझोर दिया है। देश के शीर्ष जनरल होने के नाते जनरल सिंह इस बात से बेखबर नहीं होंगे कि उनके जैसे दजेर् के व्यक्ति द्वारा केंद्र सरकार को अदालत में खींचने के नतीजे दूरगामी होंगे. न सिर्फ सेना तथा सरकार के संबंधों के संदर्भ में, बल्कि उनके निजी कैरियर के लिहाज से भी। सुप्रीम कोर्ट में मामला सुनवाई के लिए आए इससे पहले जनरल सिंह को मीडिया तथा आम लोगों की स्क्रूटिनी का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें प्रतिष्ठान विरोधी दुस्साहस, सेना की गौरवशाली परंपरा को तोड़ने और निजी नैतिकता से विचलित होने का दोषी ठहराया जा रहा है। उन्हें इन कसौटियों पर कसते समय भी किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के थलसेनाध्यक्ष होने के साथ.साथ वे एक सामान्य नागरिक भी हैं, जिसे अदालत की शरण में जाने का पूरा अधिकार प्राप्त है। कुछ कनिष्ठ अधिकारी तो पहले भी अदालत जाते रहे हैं। अपने हक़ का इस्तेमाल करने के लिए उनकी सिर्फ इस आधार पर निंदा नहीं की जानी चाहिए कि पहले किसी जनरल ने ऐसा नहीं किया। परंपराएं आसमान से नहीं टपकतीं, बनाई जाती हैं।

जनरल सिंह का दावा है कि वे सेनाध्यक्ष के रूप में अपना कायर्काल एक और साल बढ़वाने के लिए यह सब नहीं कर रहे हैं। आयु का विवाद उनके लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल है जिसे सही अंजाम तक पहुंचाना वे जरूरी समझते हैं। हाल तक ज्यादातर लोगों के बीच यही धारणा थी कि सेना में सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद उनके मन में कोई और महत्वाकांक्षा बाकी नहीं रह जानी चाहिए तथा जो व्यक्ति शीर्ष पद तक पहुंच गया हो वह अपने साथ नाइंसाफी की शिकायत भला कैसे कर सकता है। जनरल सिंह के कैरियर ग्राफ को देखते हुए भी ऐसा नहीं लगता कि उन्हें केंद्र सरकार या रक्षा मंत्रालय के स्तर पर कोई पक्षपात झेलना पड़ा होगा। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सारे मामले में रक्षा मंत्री एके एंटनी का आचरण भी बहुत शालीन तथा गरिमापूर्ण रहा है। वे जनरल के विरुद्ध या इस विवाद पर सावर्जनिक रूप से ऐसी कोई भी टिप्पणी करने से बचे हैं, जो सेना या उसके प्रमुख की गरिमा को किसी तरह की ठेस पहुंचाती हो। किंतु यदि जनरल सिंह आयु संबंधी विवाद का समाधान पाने के लिए सर्वोच्च अदालत तक पहुंचे हैं तो इस 'छोटे से मुद्दे' पर उनकी गंभीरता तथा उनके दावे की मजबूती पर संदेह नहीं रह जाना चाहिए।

हालांकि सरकार, मीडिया या किसी और हल्के में जनरल सिंह की सत्यनिष्ठा पर उंगली नहीं उठाई गई है, लेकिन इस मुद्दे पर आम लोगों के बीच जानकारी का अभाव है। बहुत से लोग यह धारणा बनाकर चल रहे हैं कि शायद यह (जनरल सिंह द्वारा) दस्तावेजों में जन्म तिथि बदल दिए जाने संबंधी विवाद है। वास्तव में ऐसा नहीं है। जन्मतिथि में बदलाव जनरल सिंह के स्तर पर नहीं किया गया बल्कि वह प्रशासनिक स्तर पर हुई तकनीकी चूक का परिणाम है जिसका नतीजा उन्हें भोगना पड़ रहा है। आम तौर पर सेना सरकारी तंत्र के साथ होने वाले ऐसे किसी भी विवाद को सावर्जनिक रूप से उठाने से बचती आई है क्योंकि सरकार और ब्यूरोक्रेसी की बुनियादी रुचि यथास्थिति को बनाए रखने में ज्यादा होती है। जनरल सिंह से भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ाने की उम्मीद लगाई जा रही थी लेकिन शायद अपनी छवि को अप्रभावित रखने, अपनी सत्यनिष्ठा सिद्ध करने या फिर किसी और वजह से उन्होंने सरकार के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट की शरण लेने का फैसला किया जो अपने आप में एक नई नजीर कायम करेगा। जनरल सिंह ने अनेक बार कहा है कि उनके इस कदम को इस रूप में न देखा जाए कि वे सेनाध्यक्ष पद पर एक और साल बने रहने के लिए बेताब हैं। वैसे भी सरकार के साथ अविश्वास के संबंध पैदा होने के बाद वे देश के सेनाध्यक्ष के रूप में शायद ज्यादा लंबे समय तक न चल पाएं, भले ही आयु संबंधी विवाद पर अदालती फैसला उनके पक्ष में ही क्यों नहीं आता।

नैतिकता और बुनियादी मुद्दा

यदि जनरल सिंह खुद को 'प्रताङ़ित' महसूस कर रहे हैं तो सरकार भी उनके ताजा फैसले से कम आहत नहीं है। शायद इसीलिए उसने इस मामले में अपना पक्ष मजबूती के साथ रखने का फैसला किया और जनरल सिंह के साथ किसी किस्म की सुलह.सफाई में दिलचस्पी नहीं दिखाई। अच्छा होता कि हालात इस हद तक पहुंचते ही नहीं और सेना तथा अफसरशाही के स्तर पर ही इसका समाधान खोज लिया जाता। लेकिन अब बात सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है तो इस पर दोनों तरफ से दलीलें और प्रति-दलीलें दी जानी तय हैं। सरकारी पक्ष जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दे रहा है वह यह है कि जनरल सिंह ने पिछले तीन.चार साल के भीतर तीन बार लिखित रूप में इस बात का भरोसा दिलाया है कि वे 10 मई 1950 को ही अपनी जन्मतिथि के रूप में स्वीकार करने को तैयार हैं, जैसा कि सेना के दस्तावेजों में दर्ज है। उन्होंने अपनी पदोन्नतियों के समय ये लिखित वायदे किए थे, जिनमें सन 2008 में सैन्य कमांडर और 2010 में थलसेनाध्यक्ष के रूप में उनकी पदोन्नति का मौका शामिल है। सरकारी रुख नैतिकता पर आधारित है और यह उम्मीद करता है कि जनरल सिंह अपने वायदे पर कायम रहेंगे, और सेना के सर्वोच्च अधिकारी से इस किस्म की आशा लगाना अनुचित भी नहीं है। लेकिन दूसरी ओर, नैतिकता एक व्यक्ति.सापेक्ष अवधारणा है। वह किसी पर थोपी नहीं जा सकती।

ंसरकार का रुख भले ही नैतिकता की दृष्टि से कितना भी उचित हो, सुप्रीम कोर्ट में शायद ही टिक पाए क्योंकि अदालत को जनरल सिंह के वायदे पर फैसला नहीं देना बल्कि मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी करनी है। उसे बस इस तथ्य का फैसला करना है कि उनकी जन्मतिथि है क्या। वह प्रशासनिक मामलों में दखल शायद ही करना चाहे। जनरल सिंह के पास अपनी जन्मतिथि को कानूनी रूप से 10 मई 1951 सिद्ध करने के लिए पयरप्त शैक्षणिक तथा अन्य दस्तावेज मौजूद हैं। सरकार की दूसरी दलील यह है कि उसने इस मामले पर एटार्नी जनरल से राय ली थी जो जनरल सिंह के पक्ष में नहीं थी। बकौल सरकार, वह इस राय को मानने के लिए बाध्य है। हालांकि इस बीच सुप्रीम कोर्ट के चार पूवर् मुख्य न्यायाधीशों ने कहा है कि सरकार के सामने ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ऐसी किसी राय से प्रभावित होने वाला नहीं है लेकिन इससे जनरल सिंह का पक्ष मजबूत तो हुआ ही है। इन न्यायाधीशों ने एटार्नी जनरल द्वारा दिए गए मशविरे की मेरिट (गुण-दोष) पर भी सवाल उठाया है।

प्रशासनिक जटिलताएं

कुछ खबरों में इस मसले के इस तरह उठ खड़े होने को सेना की आंतरिक राजनीति का नतीजा भी बताया गया है। इशारा स्वाभाविक रूप से इस ओर है कि शायद सैन्य नेतृत्व का एक वर्ग जनरल सिंह के रिटायर होने पर कुछ खास अधिकारियों के शीर्ष स्थिति में आने की संभावना को लेकर सहज महसूस नहीं कर रहा है। दूसरी ओर रक्षा मंत्रालय पर उन जनरलों द्वारा दबाव पड़ रहा है, जिनकी पदोन्नति की संभावना जनरल सिंह के इस पद पर बने रहने से प्रभावित होने वाली है। अगर जनरल वीके सिंह की जन्मतिथि का वर्ष 1951 माना जाता है तो वे इस साल 31 मई के स्थान पर अगले साल 13 मार्च को रिटायर होंगे। इस बीच पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह, जिन्हें जनरल सिंह का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जा रहा है, रिटायर हो जाएंगे। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी जीवन भर जिस उपलब्धि का इंतजार करता है, उससे किसी तकनीकी कारण से वंचित हो जाए, यह कोई आदर्श स्थिति नहीं होगी। कई अन्य सेनाधिकारी भी इसी श्रेणी में होंगे। जाहिर है, मामला सिर्फ जनरल सिंह के कायर्काल का नहीं बल्कि कई अन्य जटिलताओं तथा प्रशासनिक गुत्थियों से जुड़ा है। सारे विवाद का एक संभावित हल यह हो सकता है कि जनरल सिंह को 'पदोन्नत कर' तीनों सेनाध्यक्षों की समिति का प्रमुख नियुक्त कर दिया जाए। सरकार ने शायद इस संभावना पर गौर भी किया था।

सारे घटनाक्रम का एक पहलू यह भी है कि सेना में बहुत से अधिकारी यह महसूस करते हैं कि नागरिक अफसरशाही द्वारा उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। उन्हें पयरप्त सम्मान व महत्व नहीं दिया जाता। उस लिहाज से बहुत से सैन्य अधिकारियों के लिए जनरल सिंह के अदालत जाने का प्रतीकात्मक महत्व भी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला जनरल सिंह के समर्थन में होता है तो वह एक तरह से इस वर्ग की निगाह में सेना के गौरव को पुनप्रर्तिष्ठित करेगा। यदि नागरिक अफसरशाही वाकई हमारे वीरोचित सेनाधिकारियों को 'कैजुअल' तरीके से लेती है तो वह दुभ्राग्यपूण्र है। जनरल सिंह के बारे में कहा जाता है कि न सिर्फ उनका कायर्काल गौरवशाली और निर्विवाद रहा है बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में वे बहुत कठोर रुख भी लेते रहे हैं। उनके सेनाध्यक्ष बनने पर हमारे सैन्य ढांचे को ज्यादा चुस्त-दुरुस्त बनाने, उसका आधुनिकीकरण किए जाने और भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने के बारे में उम्मीदें बंधी थीं। नए युग में भारत की बढ़ती भूमिका के मद्देनजर थल सेना पर क्या जिम्मेदारियां हैं और कैसे वह खुद को बदलते परिवेश के अनुरूप ढाल सकती है, इस बारे में वे न सिर्फ सजग हैं बल्कि प्रयास भी करते रहे हैं। दूसरी ओर एके एंटनी ने भी ऐसे रक्षा मंत्री के रूप में छाप छोड़ी है जो किसी विवाद में पड़े बिना, एकमेव संकल्प के साथ अपने दाियत्व निभाने में लगे हुए हैं। हमारे रक्षा प्रतिष्ठान के शीर्ष पर दो अच्छे तथा काबिल लोगों के साहचयर् का समापन ऐसे अिप्रय विवाद में हो, यह दुभ्राग्यपूण्र ही कहा जाएगा। बेहतर हो कि अब भी सरकार और थलसेनाध्यक्ष इस मामले का ऐसा हल निकाल लें जो न सिर्फ दोनों पक्षों को स्वीकायर् हो, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा के भी अनुकूल हो।

Saturday, December 3, 2011

लोकतंत्र इंतजार करो, संसद में हंगामा जारी है

एफडीआई पर हंगामे के शोर में लोकपाल का मुद्दा अखबारों की छोटी खबर बन गया है। सरकार को विधेयक पास न होने का एक अच्छा कारण मिल गया है। जब संसद सत्र ही नहीं हो पा रहा तो विधेयक पास कैसे कराया जाए?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

एक बार फिर संसद सत्र में हंगामे का बोलबाला है। बाईस नवंबर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र में हर दिन नियम से हंगामा होता है और दोनों सदनों की कार्यवाही टल जाती है, फिर से वही प्रक्रिया दोहराए जाने के लिए। कभी बांग्लादेश इसके लिए मशहूर हुआ करता था जहां विपक्षी दलों के बरसों लंबे बायकाट के कारण संसदीय साख में भारी गिरावट आई। संसदीय कायर्वाही में व्यवधान और स्थगन अब भारत में भी आश्चर्य का विषय नहीं रहा। बल्कि वह एक नज़ीर बनता जा रहा है। संसद सत्र पर हर घंटे खर्च होने वाली 25 लाख रुपए की रकम प्रासंगिक नहीं रह गई है। न ही जरूरी विधेयकों का पारित होना या न होना। ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष जोर.जोर से अपनी बात सुनाने के लिए संसद का इस्तेमाल कर रहे हैं। धरनों, प्रदर्शनों, बंद, हड़तालों, बहसों और चर्चाओं की तुलना में संसदीय हंगामा अपनी पसंद के मुद्दों की ओर ध्यान खींचने का आसान जरिया बन रहा है। नतीजे में संसदीय परंपराओं तथा गरिमाओं का क्षरण हो रहा है।

संसदीय कायर्वाही के आंकड़े निराशाजनक हैं। सन 2009 में शुरू हुई पंद्रहवीं लोकसभा में 200 प्रस्तावित विधेयकों में से अब तक सिर्फ 57 विधेयक पारित हो सके हैं। इनमें भी 17 फीसदी विधेयक ऐसे थे जिन पर पांच मिनट से भी कम समय के लिए चर्चा हुई। ऐसी चर्चाओं की सार्थकता का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इस बार के संसद के मौजूदा सत्र में 21 बैठकें होनी थीं मगर एक तिहाई सत्र का घटनाक्रम देखते हुए आगे बचे दिनों से भी विशेष उम्मीद नहीं पालनी चाहिए। इस बीच 31 विधेयकों के पारित होने और लोकपाल विधेयक समेत 23 बिलों को पेश किए जाने की संसदीय प्रक्रिया हालात संभलने का इंतजार कर रही है।

हंगामा जरूरी या चर्चा

संसद को चलने दिया जाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्र हित के मुद्दों को उठाने तथा उन पर सार्थक निर्णय करने और करवाने का वही मंच है। विधानसभाओं के सत्र तो वैसे ही राज्य सरकारों की राजनैतिक सुविधा-असुविधा पर आश्रित होकर निरंतर छोटे से छोटे होते जा रहे हैं। ले-देकर केंद्र में प्राय: समय पर संसदीय सत्रों का आयोजन होता है तो वह हंगामों की भेंट चढ़ जाता है। इससे वास्तव में किसी का नुकसान होता है तो हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का। सरकार तो अपने कार्यों को वैकल्पिक माध्यमों से भी पूरा कर लेती है। बेहतर यह हो कि भ्रष्टाचार, महंगाई, लोकपाल, नए राज्यों की स्थापना और ऐसे ही दूसरे महत्वपूण्र मुद्दों पर हंगामे की बजाए चर्चा हो। गतिरोध रास्ता रोकता है, उसे आगे नहीं बढ़ाता। किंतु पिछले तीन सत्रों के दौरान यदि संसद का सवरधिक समय किसी प्रक्रिया में व्यतीत हुआ तो वह थी. गतिरोध। इसके लिए किसी भी पक्ष को एकतरफा तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह हमारे राजनैतिक तंत्र की समस्या बन चुकी है।

आज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक और वामपंथी दलों ने जो रणनीति अपनाई है, वही राजग शासनकाल में कांग्रेस की रणनीति हुआ करती थी। पूवर् रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज के विरुद्ध लगे आरोपों को लेकर संसद में लंबे समय तक इसी तरह का गतिरोध पैदा किया गया। आज राजग ने पी चिदंबरम को संसद में न बोलने देने का निण्रय लिया है तो तब कांग्रेस जॉर्ज के साथ ऐसा ही करती थी। जब वे बोलने खड़े होते थे तो हंगामा होता था और कांग्रेसी सांसद सदन छोड़कर चले जाते थे। मुद्दे भी एक से हैं और परिस्थितियां भी एक सी। बस किरदार बदल गए हैं।

सरकार को राहत?

कई बार लगता है कि विपक्ष जिस हंगामे को अपनी बात पर जोर डालने का जरिया मान रहा है, वह सत्तारूढ़ दल के लिए कहीं अधिक अनुकूल सिद्ध हो रहा है। संप्रग सरकार 2जी घोटाले, महंगाई, भ्रष्टाचार, लोकपाल विधेयक, तेलंगाना की स्थापना और उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांगें और मंदी की आशंका जैसे मुद्दों पर घिरी हुई है। यदि संसद चलती तो ऐसे मुद्दों पर विपक्ष के हमले अवश्यंभावी थे। अन्ना हजारे दोबारा दिल्ली में अनशन पर बैठने की घोषणा कर चुके हैं। अनशन की अवधि उतनी प्रासंगिक नहीं है जितना कि उसका प्रभाव। सुब्रह्मण्यम स्वामी दूरसंचार घोटाले से जुड़े विवादों में गृह मंत्री पी चिदंबरम की भूमिका का पर्दाफाश करने का 'प्रण' लेकर बैठे हैं। पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा के बयानों और सरकारी दस्तावेजों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने के अदालती आदेश ने उनका काम आसान कर दिया है। सरकार कई मुद्दों पर जवाब देने की स्थिति में नहीं है। संसद चलता तो उसकी स्थिति कोई बहुत सुविधाजनक नहीं होने वाली थी।

लेकिन भला हो खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संबंधी फैसले का, जिसने यह सुनिश्चित कर दिया कि संसद चलेगी ही नहीं। यहां हम इस फैसले के गुणदोष पर चर्चा नहीं कर रहे क्योंकि उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के इतने साल बाद यह फैसला तो स्वाभाविक ही था, लेकिन मुद्दा इसकी टाइमिंग का है। इसकी घोषणा ऐन संसद सत्र के मौके पर किया जाना सिर्फ विपक्षी एकता को मजबूत करने वाला कदम मात्र नहीं है। यह एक चतुराई भरा राजनैतिक फैसला भी है। यह निण्रय अनायास नहीं हुआ होगा कि संसद सत्र के दौरान इसकी घोषणा सदन से बाहर की जाए। सरकार को इस पर संभावित विपक्षी प्रतिक्रिया का भली भांति अहसास रहा होगा। अब भले ही अन्ना हजारे कहते रहें कि शीतकालीन सत्र में लोकपाल विधेयक पारित न होने पर वे राष्ट्रव्यापी आंदोलन में जुट जाएंगे। एफडीआई पर हंगामे के शोर में लोकपाल का मुद्दा अखबारों की छोटी खबर बन गया है। सरकार को विधेयक पास न होने का एक अच्छा कारण मिल गया है। जब संसद सत्र ही नहीं हो पा रहा तो विधेयक पास कैसे कराया जाए? न महंगाई, न भ्रष्टाचार और न काला धन। कम से कम उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों तक उसे इन आक्रामक मुद्दों से कन्नी काटने का मौका मिल गया है।

Saturday, November 5, 2011

पाकिस्तान से आया ताज़ा हवा का झोंका

पिछले कुछ हफ्तों में भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों में कई सकारात्मक बदलाव आए हैं। संयुक्त राष्ट्र से लेकर राष्ट्रमंडल और पाक.अमेरिका टकराव से लेकर एमएफएन के दर्जे तक कुछ सकारात्मक घटित हो रहा है।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

भारत और पाकिस्तान के संबंध इसी तरह से आगे बढ़ने चाहिए। दोनों देशों के बीच छह दशकों से जिस तरह के कटु और आक्रामक रिश्ते चले आए हैं, उन्हें देखते हुए पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं पर ताज्जुब होता है। अचानक ऐसा क्या हुआ कि पाकिस्तान के रुख में बदलाव, वह भी सकारात्मक, आ रहा है? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के मुद्दे पर भारत ने पाकिस्तान के हक में वोट डाला। राष्ट्रमंडल के भारतीय महासचिव कमलेश शर्मा के कायर्काल को चार साल के लिए आगे बढ़ाने के मुद्दे पर पाकिस्तान ने भारत के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। कुछ दिन पहले भारतीय थलसेना का एक हेलीकॉप्टर गलती से पाक अधिकृत कश्मीर में चला गया और वहां के सुरक्षा अधिकारियों ने कोई भी नुकसान पहुंचाए बिना उसे लौटने की इजाजत दे दी जबकि अतीत में ऐसी घटनाओं में कई सैनिकों और असैनिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। फिर 15 साल लंबे अनिश्चय के बाद पाकिस्तान ने आखिरकार भारत को सबसे तरजीही देश (एमएफएन) का दर्जा देने का फैसला किया और अब खबर है कि 26 नवंबर 2008 के मुंबई विस्फोटों की जांच के सिलसिले में बनाया गया पाकिस्तानी आयोग तफ्तीश के लिए भारत आने वाला है। पता नहीं यह सिलसिला कितने कम या ज्यादा दिनों तक चलेगा, मगर इस उपमहाद्वीप में अमन और तरक्की चाहने वाला हर इंसान यही चाहेगा कि सद्भावना और सौहार्द का यह दौर यूं ही चलता रहे।

भौगोलिक सच्चाइयों, साझी विरासत और साझे इतिहास के जरिए दोनों देश एक दूसरे से कुछ यूं जुड़े हुए हैं कि उन्हें अलग करना नामुमकिन है। लेकिन पड़ोसी होते हुए भी हम एक.दूसरे से कितने दूर हैं! बड़ा अज़ीब रिश्ता है यह। पाकिस्तानी नागरिकों से पूछिए कि वे किससे सवरधिक नफरत करते हैं तो उनका जवाब होगा- भारत। यही सवाल भारत में पूछिए तो जवाब मिलेगा- पाकिस्तान। अब हालात को जरा पलटकर देखिए। जब भी माहौल सकारात्मक रहा है, पाकिस्तानियों ने भारतीयों के लिए और हमने पाकिस्तानियों के लिए इतना प्यार दिखाया है कि समझ ही नहीं आता कि इतनी भावनात्मक निकटता के बावजूद हमारे बीच नफरतों की दीवारें भला क्यों आ खड़ी होती हैं? तेरा साथ सह न पाऊं और तेरे बिना रह न पाऊं। अच्छी बात है कि आपसी संबंधों का रोलर-कास्टर एक बार फिर अच्छे दौर से गुजर रहा है। अब भले ही एमएफएन के मुद्दे पर पाकिस्तान में अस्थायी ऊहापोह, अंतरविरोधों और घबराहट का आभास हो रहा हो, यह एक सच्चाई है जो आज नहीं तो कल अमल में आ ही जाएगी।

भारत ने कितने मौकों पर पाकिस्तान की तरफ सौहार्द, सद्भावना और दोस्ती का हाथ बढ़ाया! रक्तहीन क्रांति के जरिए सत्ता हथियाने के बाद जब जनरल परवेज मुशर्रफ को पूरी दुनिया ने दुत्कार दिया था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी सत्ता को मान्यता दी और विश्व राजनीति में उपेक्षित, राष्ट्रमंडल से निष्कासित पाकिस्तान धीरे.धीरे मुख्यधारा में लौटा। क्रिकेट की दुनिया में जब कोई देश पाकिस्तान का दौरा करने को तैयार नहीं था तब भारतीय क्रिकेट टीम ने वहां जाकर यह धारणा दूर करने का प्रयास किया कि पाकिस्तान में आतंकवाद के हालात इतने बिगड़े हुए हैं कि वहां कोई विदेशी टीम जा ही नहीं सकती। सन 1996 में डब्लूटीओ के प्रावधानों के तहत भारत ने पाकिस्तान को सबसे तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिया। लेकिन जो घटना लोगों की निगाह में ज्यादा नहीं आई वह थी ताजा अमेरिका.पाक टकराव के दौर में भारत की ओर से जारी किया गया वह आधिकारिक बयान जिसकी उम्मीद पाकिस्तान को कभी नहीं रही होगी। जब पाकिस्तान पर अमेरिकी हमले की संभावनाओं की चर्चा हो रही थी, तब भारत ने अवसरवादिता की बजाए सद्भाव दिखाया और आधिकारिक चेतावनी दी कि दक्षिण एशिया में किसी भी आक्रामक कार्रवाई का इस इलाके में शांति, स्थिरता और विकास पर गभीर असर पड़ेगा। इससे भारत भी प्रभावित होगा। इस बयान ने पाकिस्तान को कितनी राहत दी होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। संभव है, इसके बाद ही भारत के प्रति उसका नजरिया बदला हो।

एमएफएन का दर्जा

अमेरिका ने कहा है कि पाकिस्तान द्वारा भारत को एमएफएन का दर्जा दिया जाना उनके आपसी संबंधों को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए सबसे महत्वपूण्र कदमों में से एक है। उद्योग और व्यापार जगत के दिग्गजों का मानना है कि इससे दोनों ही देशों को लाभ होगा और उनका आपसी व्यापार 2॰6 अरब डालर सालाना से बढ़कर नौ अरब डालर तक पहुंच जाएगा। यह खुलेपन का दौर है, जिसमें हर देश अपनी अर्थव्यवस्था को खोल रहा है। वैश्वीकरण के युग में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता अप्रासंगिक होती जा रही है। पाकिस्तान के इंजीनियरिंग और दवा उद्योग में भारतीय उत्पादों से मिलने वाली चुनौती को लेकर चिंता जरूर है, लेकिन टेक्सटाइल्स, सीमेंट, कृषि उत्पादों, सर्जिकल उपकरणों जैसी दर्जनों चीजें भारत को निर्यात कर वहां के उद्यमी भी लाभान्वित होने वाले हैं। भारत ने संकेत दिया है कि अगर पाकिस्तान एमएफएन के मुद्दे पर ठोस कदम उठाता है तो वह पाकिस्तानी कपड़ा उद्योगों को तरजीही रियायतें दे सकता है। टेक्सटाइल्स के क्षेत्र में में पाकिस्तान एक अहम निर्यातक है। इन सबके अलावा, उसे हर साल करीब दो अरब अमेरिकी डालर की मदद उन भारतीय सामानों के सीधे आयात के कारण होगी जो फिलहाल पाक पाबंदियों के चलते दुबई के रास्ते वहां भेजे जाते हैं। भारतीय नियरतकों से मिलने वाले कर अलग हैं। इन सबसे अहम, यह कदम दोनों देशों के कारोबारी संबंधों से तनाव और संदेह के वातावरण से आजाद कर सौहार्द की ओर ले जाएगा। कारोबारियों के लिए वीजा नियमों का सरलीकरण और उदारीकरण भी होने जा रहा है। अब दोनों देशों के कारोबारी न सिर्फ ज्यादा आसानी से सीमा के इधर-उधर आ जा सकेंगे बल्कि दूसरी तरफ की कंपनियों से रिश्ते भी कायम करेंगे। वे एक दूसरे के बाजार और उद्यमिता से काफी कुछ पाएंगे। कारोबारी क्षेत्र का सौहार्द राजनीति और समाज के स्तर पर भी कुछ न कुछ असर जरूर डालेगा। वैसे ही, जैसे नागरिकों से नागरिकों के रिश्ते डालते हैं।

पाकिस्तान सरकार ने देर से ही सही एक सही, बुद्धिमत्तापूर्ण और साहसिक कदम उठाया है। उसे दुष्प्रचार अभियान चलाने वालों और मामले को भावनात्मक मुद्दों से जोड़ने वालों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। भारत के साथ कारोबारी संबंध मजबूत बनाकर श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल ने काफी लाभ उठाया है। ऐसा करने से पाकिस्तान का भी कोई नुकसान होने वाला नहीं है। जिस विशाल भारतीय बाजार पर दुनिया भर के व्यापारियों की नजर है, उस तक आसान, तरजीही पहुंच उसके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकती है, बशर्ते वह इन नए अवसरों का फायदा उठा सके। आर्थिक रूप से असमान रूप से विकसित देशों के बीच व्यापार में असंतुलन की गुंजाइश हमेशा रहती है, जैसा भारत और चीन के बीच है। अगर पाकिस्तान को व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका है तो वह जायज टैरिफ के जरिए उसे अनुशासित करने के लिए स्वतंत्र है ही।

क्या थी झिझक

भारत में जहां एमएफएन के मुद्दे को एक कारोबारी मुद्दा माना जाता है, वहीं पाकिस्तान में इसे आपसी राजनैतिक विवादों के साथ जोड़कर देखा जाता है, खासकर कश्मीर के साथ। एक के बाद एक पाकिस्तानी सरकारों ने यही रुख अपनाया कि जब तक कश्मीर समस्या हल नहीं होती, भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा नहीं दिया जाएगा, भले ही डब्लूटीओ के तहत यह अपेक्षा की जाती है कि उसका हर सदस्य राष्ट्र एक-दूसरे को एमएफएन का दर्जा देगा। वहां ऐसा माना जाता था कि आपसी संबंध सामान्य हुए तो कश्मीर का सवाल उपेक्षित हो जाएगा जिसे बड़ी कोशिशों के बाद एक भावनात्मक मुद्दे के रूप में आम पाकिस्तानी नागरिकों के मन में जिंदा रखा गया है। पाकिस्तान सरकार के फैसले के बाद आने वाली नकारात्मक प्रतिक्रियाओं में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठा है। इसे पाकिस्तान की कश्मीर नीति में नरमी के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान सरकार की इस घोषणा के बाद कि यह फैसला सेना और आईएसआई की सहमति से किया गया है, वहां के लोगों को इस तरह का असुरक्षा बोध नहीं होना चाहिए।

कुछ पाकिस्तानी उद्योग संगठनों ने कहा है कि भारत की ओर से पंद्रह साल पहले मिले एमएफएन के दर्जे का उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ है क्योंकि भारत ने बहुत सी पाकिस्तानी चीजों के आयात पर नॉन-टैरिफ बैरियर लगाए हुए हैं। इस सिलसिले में कपड़े और सीमेंट की मिसालें दी जाती हैं। हालांकि यह आरोप पूरी तरह गलत नहीं है लेकिन इसे पाकिस्तानी नजरिए के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। कोई भी देश यह नहीं चाहेगा कि दूसरा देश स्वयं उसे ऐसी सुविधा दिए बिना उसके बाजार का एकतरफा तौर पर फायदा उठाता रहे। अब जबकि पाकिस्तान ने हमें एमएफएन का दर्जा देने का फैसला कर लिया है, भारत की तरफ से खड़ी की गई रुकावटें भी धीरे-धीरे खत्म हो जानी चाहिए। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने पाकिस्तानी कपड़ा निर्यातकों को नई रियायतें देने का संकेत दिया है, जो सीमा के इस पार आसन्न मैत्रीपूण्र बदलावों की ओर संकेत करता है। कुछ हम बढ़ें, कुछ आप बढ़ो॰॰ वैश्वीकरण के दौर में दूरियां ऐसे ही खत्म होती चली जाएंगी।

Friday, October 7, 2011

अन्वेषक, आविष्कारक, उद्यमी, स्वप्नदृष्टाः अद्वितीय स्टीव जॉब्स

स्टीव जॉब्स सिर्फ सपने देखने वाले ही नहीं थे, वे सपनों को सच करके दिखाने वाले ऐसे अद्वितीय इंसान थे जिन्होंने अपनी तकनीकों, उत्पादों और विचारों के जरिए विश्व में क्रांतिकारी बदलावों को जन्म दिया।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

दुनिया की शीर्ष आईटी कंपनी एपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने कई साल तक कैंसर से लड़ने के बाद पांच अक्तूबर को इस दुनिया से विदा ले ली। महज 56 साल की उम्र में स्टीव जॉब्स का चला जाना न सिर्फ सूचना प्रौद्योगिकी जगत बल्कि पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा आघात है। वे सिर्फ सपने देखने वाले ही नहीं थे, वे सपनों को सच करके दिखाने वाले ऐसे अद्वितीय इंसान थे जिन्होंने अपनी तकनीकों, उत्पादों और विचारों के जरिए विश्व में क्रांतिकारी बदलावों को जन्म दिया। स्टीव जॉब्स सामान्य वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और तकनीशियनों से अलग थे। वे एक अन्वेषक, शोधकर्ता और आविष्कारक थे। आईटी की दुनिया में तकनीक का सृजन करने वाले तो बहुत हैं लेकिन उसे सामान्य लोगों के अनुरूप ढालने और तकनीक को खूबसूरत, प्रेजेन्टेबल रूप देने वाले बहुत कम। स्टीव जॉब्स एक बहुमुखी प्रतिभा, एक पूर्णतावादी, करिश्माई तकनीकविद् और अद्वितीय 'रचनाकर्मी' थे, तकनीक के संदर्भ में उन्हें एक पूर्ण पुरुष कहना गलत नहीं होगा।

उनके देखे 56 वसंतों के दौरान अगर यह विश्व क्रांतिकारी ढंग से बदल गया है तो इसमें खुद स्टीव जॉब्स की भूमिका कम नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहे गए ये शब्द कितने सटीक हैं कि 'स्टीव की सफलता के प्रति इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या होगी कि विश्व के एक बड़े हिस्से को उनके निधन की जानकारी उन्हीं के द्वारा आविष्कृत किसी न किसी यंत्र के जरिए मिली।' स्टीव जॉब्स, दुनिया भर में फैले हुए आपके आविष्कारों के हम करोड़ों उपयोक्ता और आपकी उद्यमिता तथा अद्वितीय मेधा के अरबों प्रशंसक आपको कभी भुला नहीं पाएंगे।

स्टीव जॉब्स का जीवन अनगिनत पहलुओं, किंवदंतियों और प्रेरक कथाओं का अद्भुत संकलन रहा है। हर मामले में वे दूसरों से अलग किंतु शीर्ष पर दिखाई दिए। चाहे वह एपल से निकलने के बाद का जीवन संघर्ष हो या फिर लंबी जद्दोजहद के बाद उसी एपल में वापसी और फिर उसे आईटी की महानतम कंपनी बनाने की उनकी सफलता। माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स के साथ उनकी लंबी प्रतिद्वंद्विता के भी दर्जनों किस्से रहे हैं। दोनों किसी समय मित्र थे किंतु बाद में अलग-अलग रास्तों पर चले गए। न सिर्फ व्यवसाय की दृष्टि से बल्कि तकनीकी दृष्टि से भी उन्होंने आईटी की दुनिया में दो अलग-अलग धुर स्थापित किए। दोनों बहुत सफल, बहुत सक्षम, विस्तीर्ण किंतु परस्पर विरोधाभास लिए हुए। कभी बिल तो कभी गेट्स, सकारात्मक प्रतिद्वंद्विता की इस प्रेरक दंतकथा के उतार-चढ़ाव तकनीकी विश्व के बाकी दिग्गजों के लिए सीखने के नए अध्याय बनते चले गए। किंतु अंततः स्टीव एक विजेता के रूप में विदा हुए। कोई डेढ़ साल पहले एपल ने माइक्रोसॉफ्ट को पछाड़कर दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनी बनने का गौरव प्राप्त किया। और इसके पीछे यदि किसी एक व्यक्ति की प्रेरणा, जिजीविषा, लगन, प्रतिभा और उद्यमिता थी, तो वे थे स्टीव जॉब्स।

स्टीव के योगदान को बिल गेट्स से बेहतर कौन आंक सकता है, जिन्होंने उनके निधन पर कहा कि 'दुनिया में किसी एक व्यक्ति द्वारा इतना जबरदस्त प्रभाव डाले जाने की मिसालें दुर्लभ ही होती हैं, जैसा कि स्टीव जॉब्स ने डाला। उनके योगदान का प्रभाव आने वाली कई पीढ़ियां भी महसूस करेंगी।'

भविष्यदृष्टा स्टीव

विलक्षण थे स्टीव जॉब्स। वे सामान्य वैज्ञानिकों, तकनीक विशषज्ञों, शोधकर्ताओं, विद्वानों, अन्वेषकों, आविष्कारकों, उद्यमियों में नहीं गिने जा सकते। वे तो यह सब कुछ थे, बल्कि उससे भी कहीं अधिक एक भविष्यदृष्टा। हर कोई उनके काम और जीवन से कितना कुछ सीख सकता है। तकनीक में वे शीर्ष पर पहुंचे, डिजाइन में उनका कोई सानी नहीं था, मार्केटिंग तथा ब्रांडिंग के दिग्गज भी उनकी रणनीतियों का विश्लेषण करने में लगे रहते थे, मैन्यूफैक्चरिंग में उनका कोई जवाब नहीं था, उत्पादों की यूजेबिलिटी पर उन्हें चुनौती देना मुश्किल था। वे आगे चलने वाले व्यक्ति थे, बाकी लोग बस उनका अनुगमन करते थे- येन महाजनो गतः सः पंथा। स्टीव इस सहस्त्राब्दि की प्रतिभाओं में गिने जाएंगे जैसे लियोनार्दो द विंची, टामस एल्वा एडीसन, डार्विन, आइंस्टीन, न्यूटन आदि हैं। खासतौर पर वे लियोनार्दो द विंची के बहुत करीब खड़े दिखते हैं, जिन्होंने विज्ञान और तकनीक ही नहीं, और भी एकाधिक क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा की चिरंजीवी छाप छोड़ी।

स्टीव ने हमेशा बड़े सपने देखे, बड़ी कल्पनाएं कीं। जब कंप्यूटिंग की दुनिया काली स्क्रीनों से जद्दोजहद करती रहती थी, वे मैकिन्टोश कंप्यूटरों के माध्यम से ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस (कंप्यूटर की चित्रात्मक मॉनीटर स्क्रीन) ले आए। जब इस मशीन के साथ हमारा संवाद कीबोर्ड तक सिमटा हुआ था तब उन्होंने माउस को लोकप्रिय बनाकर कंप्यूटिंग को काफी आसान और दोस्ताना बना दिया। कंप्यूटर के सीपीयू टावर का झंझट खत्म कर उसे मॉनीटर के भीतर ही समाहित कर दिया तो सिंगल इलेक्ट्रिक वायर कंप्यूटिंग डिवाइस पेश कर हमें तारों के जंजाल में उलझने से बचाया। वह स्टीव जॉब्स के कॅरियर का पहला दौर था। उसके बाद उन्होंने बुरे दिन भी देखे और एपल से निकाले भी गए। लेकिन जब कुछ साल बाद वे उसी कंपनी में लौटे तो नई ऊर्जा, नए जोश और नए हौंसलौं के साथ लौटे। कहीं कोई शत्रुभाव नहीं, सिर्फ सकारात्मक ऊर्जा, बड़े लक्ष्य, और कुछ क्रांतिकारी परिकल्पनाएँ जो पहले आई-पॉड (2001) और फिर आई-फोन (2007) तथा आई-पैड (2010) की अपरिमित सफलता के रूप में हमारे सामने आई। जब दुनिया कीबोर्ड और मोबाइल कीपैड से जूझ रही थी, उन्होंने हमें टच-स्क्रीन से परिचित कराया और इस असंभव सी लगने वाली टेक्नॉलॉजी को इतनी सरल, संभव और व्यावहारिक बना दिया कि हैरत हुई कि पहले किसी ने ऐसा क्यों नहीं सोचा।

एपल के उत्पाद स्टेटस सिंबल तो सदा से रहे हैं, अपने दूसरे चरण में वे लोकप्रियता का जो जबरदस्त पैमाना स्टीव जॉब्स के उत्पादों ने छुआ, वह बड़े-बड़े मार्केटिंग दिग्गजों को भी चकित करने वाला था। हर उत्पाद करोड़ों की संख्या में बिका और हर तकनीक-जागरूक, संचार-प्रेमी, मनोरंजनोत्सुक युवा का सपना बन गया। एपल से अनुपस्थिति के वर्षों में भी उन्होंने एक बहुत बड़ी एनीमेशन ग्राफिक्स कंपनी को जन्म दिया, जिसका नाम था- पिक्सर एनीमेशन। यह एक अलग ही क्षेत्र था- एनीमेशन फिल्मों का, जिसमें उनकी सफलता ने डिज्नी जैसे महारथी को भी चिंतित कर दिया था।

कभी हार नहीं मानी

स्टीव जॉब्स थे ही ऐसे। अनूठे, अलग, मनमौजी, किंतु परिणाम देने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले। भारत से उनका गहरा रिश्ता रहा। बिल गेट्स अगर स्कूल की पढ़ाई अधूरी छोड़ आए थे तो स्टीव कॉलेज की। दोनों दिग्गजों की आपसी समानताएं कई बार चौंका देती हैं। बहरहाल, स्टीव ने भारत में घूम-घूमकर मानसिक शांति की तलाश का जो उपक्रम किया, बिल के व्यक्तित्व में आध्यात्म का वह अंश मिसिंग है। इसी आध्यात्मिक गहराई ने स्टीव के व्यक्तित्व और प्रतिभा को वह गहनता दी होगी, जिसके बल पर उन्होंने न सिर्फ तकनीकी विश्व के दिग्गजों के साथ प्रतिद्वंद्विता में कभी हार नहीं मानी, बल्कि कैंसर जैसे अपराजेय प्रतिद्वंद्वी के सामने भी प्रबल आत्मबल का परिचय दिया। कैंसर के कारण पिछले कुछ वर्षों में वे समय-समय पर एपल से दूर रहे किंतु जब भी जरूरत पड़ी किसी जुझारू सैनिक की तरह मोर्चे पर लौट आए। अलबत्ता, पिछली 24 अगस्त को उन्होंने एपल के सीईओ के पद से इस्तीफा दे दिया था और अपने निधन तक कुछ समय के लिए कंपनी के चेयरमैन रहे।

स्टीव जानते थे कि उनके इलाज की अपनी सीमाएं हैं और तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें जाना होगा। किंतु उन्होंने अंतिम समय तक हार नहीं मानी और न ही अपने काम तथा उद्देश्यों से डिगे। पिछली दो मार्च को जब आईपैड-2 को लांच किया जाना था, तब स्टीव अपनी बीमारी के इलाज के लिए छुट्टी पर थे। लेकिन सबको चौंकाते हुए वे आईपैड-2 को लांच करने के लिए अवतरित हुए। इस हद तक थी अपन काम में उनकी प्रतिबद्धता। छह साल पहले एक समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था- 'इस बात का अहसास कि जल्दी ही मेरा निधन हो जाएगा, मेरे जीवन का सबसे बड़ा साधन है जो मुझे अपन जीवन में बड़े निर्णय करने के लिए प्रेरित करता है। इस अहसास ने कि तुम जल्दी ही विदा हो जाओगे, मुझे किसी भी चीज को खोने की आशंकाओं के जंजाल से मुक्त कर दिया है। तुम्हारा समय सीमित है, इसलिए इसे किसी और का जीवन जीकर व्यर्थ मत करो। सिर्फ अपनी आत्मा की आवाज पर चलो।'

यही आध्यात्मिक और आत्मिक गहराई स्टीव जॉब्स को वह ऊंचाई देती है, जिसका पर्याय उनका आदर्श जीवन बना। स्टीवन पॉल जॉब्स, अपनी कल्पनाओं, हौंसलों प्रेरणाओं और लक्ष्यों में हम आपका अक्स देख सकते हैं। कम लोग होते हैं जो दुनिया पर वैसी अमिट छाप छोड़कर जाते हैं, जैसी आपने छोड़ी।
इतिहास के एक अहम कालखंड से गुजर रही है भारतीय राजनीति। ऐसे कालखंड से, जब हम कई सामान्य राजनेताओं को स्टेट्समैन बनते हुए देखेंगे। ऐसे कालखंड में जब कई स्वनामधन्य महाभाग स्वयं को धूल-धूसरित अवस्था में इतिहास के कूड़ेदान में पड़ा पाएंगे। भारत की शक्ल-सूरत, छवि, ताकत, दर्जे और भविष्य को तय करने वाला वर्तमान है यह। माना कि राजनीति पर लिखना काजर की कोठरी में घुसने के समान है, लेकिन चुप्पी तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है। बोलोगे नहीं तो बात कैसे बनेगी बंधु, क्योंकि दिल्ली तो वैसे ही ऊंचा सुनती है।

बालेन्दु शर्मा दाधीचः नई दिल्ली से संचालित लोकप्रिय हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक। नए मीडिया में खास दिलचस्पी। हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी को करीब लाने के प्रयासों में भी थोड़ी सी भूमिका। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन से पुरस्कृत। अक्षरम आईटी अवार्ड और हिंदी अकादमी का 'ज्ञान प्रौद्योगिकी पुरस्कार' प्राप्त। माइक्रोसॉफ्ट एमवीपी एलुमिनी।
- मेरा होमपेज http://www.balendu.com
- प्रभासाक्षी.कॉमः हिंदी समाचार पोर्टल
- वाहमीडिया मीडिया ब्लॉग
- लोकलाइजेशन लैब्सहिंदी में सूचना प्रौद्योगिकीय विकास
- माध्यमः निःशुल्क हिंदी वर्ड प्रोसेसर
- संशोधकः विकृत यूनिकोड संशोधक
- मतान्तरः राजनैतिक ब्लॉग
- आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, 2007, न्यूयॉर्क

ईमेलः baalendu@yahoo.com