Monday, May 21, 2012

शाहरूख पर पाबंदी में इंसाफ जीता या अहँ

बेहतर होता कि वानखेड़े स्टेडियम का विवाद शाहरूख खान, एमसीए अधिकारियों और बीसीसीआई के स्तर पर ही सुलझ जाता। शाहरूख ने अच्छा नहीं किया, लेकिन निजी अहं के इस झगड़े में समस्या की तह तक जाए बिना फैसला करने और दूसरे पक्ष को अपनी बात कहने का मौका न देकर एमसीए ने भी कोई अच्छी मिसाल कायम नहीं की है।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

अगर कोई आपके बच्चों के साथ बदतमीजी, छेड़छाड़ या हमला करे तो आप क्या करेंगे? क्या आप कोई भी प्रतिक्रिया किए बिना उनके विरुद्ध शिकायत करने की औपचारिकता पूरी करेंगे या फिर पहले मौके पर अपने विरोध का इजहार करेंगे? मुझे लगता है कि भले ही आप कितने भी शालीन और गरिमापूर्ण क्यों न हों, अगर बात आपके बच्चों की सुरक्षा या उनकी गरिमा की रक्षा से जुड़ी होगी तो आपका पहला कदम उन्हें बचाने और हमलावरों से निपटने का ही होगा। शिकायत बाद में आती है। शाहरूख खान, जिन पर नशे की हालत में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम के स्टाफ और मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों से उलझने का आरोप है, को निशाना बनाने के लिए यही दलील दी जा रही है कि उन्होंने मौके पर मौजूद लोगों से बदसलूकी करने की बजाए शिकायत क्यों नहीं दर्ज की। केंद्रीय मंत्री तथा मुंबई क्रिकेट एशोसिएशन के प्रमुख विलास राव देशमुख तथा शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के विचार शायद ही किसी और मुद्दे पर इतने मिलते हों। लेकिन दोनों से यह प्रश्न पूछने को जरूर मन करता है कि ईश्वर न करे उनके साथ कोई शख्स हमलावर बर्ताव करता है तो क्या वे मौके पर प्रतिक्रिया करने की बजाए औपचारिक शिकायत तक का इंतजार करेंगे। शिवसेना प्रमुख के अनुयायी तो 'मौके पर इंसाफ' करने के लिए विख्यात हैं।

सोलह मई की रात को कोलकाता नाइटराइडर्स और मुंबई इंडियन्स के बीच मैच के बाद शाहरूख अपने बच्चों को स्टेडियम से घर लाने गए थे। उसी मौके पर पहले वानखेड़े स्टेडियम के सुरक्षा गार्डों से और फिर एमसीए अधिकारियों के साथ उनकी झड़प हुई। इस दौरान शाहरूख ने जैसा बर्ताव किया, उसे मीडिया में जमकर नकारात्मक पब्लिसिटी मिली है। जिन्होंने सिर्फ शाहरूख की प्रतिक्रिया देखी उनके मन में यह भावना आना स्वाभाविक है कि ये बॉलीवुड के अभिनेता अपने आपको समझते क्या हैं? क्या उन्हें आम नागरिकों के साथ बदसलूकी करने और अपना रुआब दिखाने का लाइसेंस हासिल है? शाहरूख का बर्ताव सचमुच ही अच्छा नहीं था। वे बहुत आक्रामक थे लेकिन यह आक्रामकता बेवजह तो नहीं हो सकती? जब तक दूसरे लोगों को इस आक्रामकता के पीछे की घटना का पता न हो तब तक उनके द्वारा निकाला गया कोई भी निष्कर्ष न्यायोचित नहीं हो सकता। यह ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति मुझे गाली दे लेकिन कैमरों पर सिर्फ वही दृश्य रिकॉर्ड हो जब मैं उसका जवाब दे रहा होऊँ। शाहरूख के मामले में वही हुआ है जो फिल्मी सेलिब्रिटीज से जुड़े मामलों में हमेशा होता आया है। उन्हें अपनी बात कहने का मौका दिए बिना कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। अधूरी तसवीर के आधार पर फैसले सुनाए जा रहे हैं। माना कि सेलिब्रिटीज आम आदमी से ऊपर नहीं हैं, लेकिन वे आम आदमी से कम भी तो नहीं हैं। उन्हें अपने स्वाभाविक अधिकार से वंचित करना और महज आक्रामक भावनात्मकता के आधार पर दोषी ठहराना इस न्यायसंगत समाज की भावना के अनुरूप नहीं है।

ममता बनर्जी ने ठीक कहा है कि यह उतना बड़ा मामला नहीं है जितनी बड़ी सजा शाहरूख को दी जा रही है। क्या अपने बच्चों की हिफाजत करते हुए माता-पिता के साथ ऐसे झगड़े होना आम बात नहीं है? शाहरूख खान ने अगर अपने बच्चों के साथ बदसलूकी का विरोध किया होगा तो इस मुद्दे पर उनके झगड़े की शुरूआत एक या दो सुरक्षा गार्डों के साथ हुई होगी। बात आगे बढ़ी तो केकेआर के कुछ खिलाड़ी शाहरूख के साथ आए और कई सुरक्षा गार्ड, स्टे़डियम के कर्मचारी और एमसीए अधिकारी दूसरी तरफ जुट गए। अगर आप दोनों पक्षों के बीच हुए गाली-गलौज और बहस का ब्यौरा देखें तो इसमें शाहरूख अकेले दोषी दिखाई नहीं देते। हर झगड़े के दौरान ऐसा ही होता है। इस घटना में किसी शख्स को चोट नहीं आई, स्टेडियम की संपत्ति का नुकसान नहीं हुआ और दंगे जैसी घटना नहीं हुई। यह एक झगड़ा था और अंत में दोनों पक्षों के बीच सुलह भी हो गई थी, जैसा कि एमसीए के एक अधिकारी और शाहरूख खान के एक-दूसरे को गले लगाने की फोटो से जाहिर है। शाहरूख ने अगर पुलिस में या एमसीए से शिकायत नहीं की तो यह उनको दोषी सिद्ध नहीं करता। ज्यादातर लोग आपसी झगड़ों की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को पुलिस तक नहीं ले जाना चाहते, क्योंकि वे बात और आगे नहीं बढ़ाना चाहते। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे दोषी हैं।

'अपराध' कितना गंभीर?

मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन ने इस मामले को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। उसने इसे शाहरूख की तुलना में ज्यादा गंभीरता से लिया और उनके विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। वहाँ तक बात ठीक थी लेकिन उसने एकतरफा कार्रवाई कर बॉलीवुड अभिनेता तथा आईपीएल फ्रेंचाइजी के मालिक के पाँच साल तक वानखेड़े स्टेडियम में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाकर अति कर दी है। जिस तरह से यह प्रक्रिया पूरी की गई, उस पर कई सवाल खड़े होते हैं। पहली बात, दो पक्षों के बीच हुआ झगड़ा उनका व्यक्तिगत झगड़ा था, इसे संस्थागत रूप क्यों दिया गया। गार्डों और शाहरूख खान के झगड़े को एमसीए और शाहरूख खान का झगड़ा कैसे बना दिया गया? शाहरूख के विरुद्ध फैसला करते समय एमसीए ने अपने संस्थागत अधिकारों का इस्तेमाल किया है, जबकि मामला कुछ व्यक्तियों (इन्डीविजुअल्स) के बीच का था। उसे उन्हीं के स्तर पर सुलझाया जाना चाहिए था या फिर अधिक से अधिक पुलिस या अदालत के स्तर पर। यह फैसला भी एकतरफा ढंग से किया गया। विलासराव देशमुख का कहना है कि वे स्टेडियम के कर्मचारियों और गार्डों के बयानों पर विश्वास करते हैं। इंसाफ इस तरह नहीं होता। श्री देशमुख को उन पर कितना विश्वास है, वह उनका निजी मामला है। न्याय किसी के निजी विश्वास पर आधारित नहीं होता। वह समानता के सिद्धांत पर चलता है। शाहरूख खान का पक्ष सुने बिना उन पर प्रतिबंध लगाना एकतरफा, अनैतिक और मनमाना ही कहा जाएगा।

यह फैसला उसी तरह का बेतुका फैसला है जैसे शाहरूख खान कोलकाता नाइट राइडर्स की तरफ से एकतरफा फैसला करते हुए एमसीए के अधिकारियों को अपनी टीम के मैच देखने से प्रतिबंधित कर दें। शाहरूख एक बॉलीवुड सेलिब्रिटी ही नहीं बल्कि आईपीएल के फ्रेंचाइजी के मालिक भी हैं। जब उनके जैसे व्यक्ति तक का पक्ष नहीं सुना गया तो ऐसी संस्थाएँ आम लोगों के साथ क्या करेंगी। एमसीए ने अपना फैसला करते समय बहुत सी बातों को नजरंदाज किया है। एक फ्रेंचाइजी मालिक होने के नाते शाहरूख को किसी भी स्टेडियम में होने वाले अपनी टीम के मैच को देखने, उसकी निगरानी तथा समीक्षा करने का हक है। कई बार उसे मौके पर जरूरी फैसला करने या रणनीति तैयार करने की जरूरत पड़ सकती है। आईपीएल के दौरान एक आईपीएल फ्रेंचाइजी को अपनी टीम का मैच देखने से कैसे रोका जा सकता है, सिर्फ इसलिए कि कुछ दिन पहले उसका वहाँ के सुरक्षा गार्डों के साथ झगड़ा हुआ था। एमसीए अधिकारियों ने कहा है कि शाहरूख स्टेडियम में प्रवेश के लिए अधिमान्यता प्राप्त नहीं हैं। शाहरूख कोई सामान्य दर्शक नहीं हैं, वे आईपीएल फ्रेंचाइजी के मालिक हैं और आधिकारिक रूप से बीसीसीआई से जुड़े हुए हैं। बीसीसीआई को साफ करना चाहिए कि क्या उन्हें अपनी टीम के मैच के दौरान स्टेडियम में जाने के लिए किसी और अधिमान्यता की जरूरत है?

दायरे से बाहर जाने की कोशिश

शाहरूख ने यकीनन बहुत आक्रामक ढंग से प्रतिक्रिया की लेकिन इस तथ्य को भी नजरंदाज नहीं करना चाहिए कि उनके खिलाफ एमसीए के गार्डों, कर्मचारियों और अधिकारियों का भारी झुंड था। खुद विलासराव देशमुख ने माना है कि घटना के वक्त एमसीए के 50 फीसदी पदाधिकारी मौजूद थे। झगड़े के समय की बातचीत का ब्यौरा बताता है कि अगर यह अभिनेता अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहा था तो दूसरी तरफ से बहुत सारे लोग उनके खिलाफ तरह-तरह की बातें कह रहे थे। दस-बीस लोगों के साथ किसी अकेले इंसान का वाक् युद्ध चल रहा हो तो उसकी प्रतिक्रिया का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। वाक् युद्ध के ब्यौरे में एक जगह पर शाहरूख कह रहे हैं कि "प्लीज सर.. दीज आर चिल्ड्रेन.. " यह स्पष्ट करता है कि वे अपने बच्चों को किसी की प्रतिक्रिया से सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। एक जगह वे यह भी कह रहे हैं कि "आई एम एन इंडियन एंड आई कैन गो टू एनी स्टेडियम।" उन्हें यह बात क्यों देनी पड़ी होगी, आप खुद ही सोचिए। कहा जाता है कि किसी ने उनकी भारतीयता पर सवाल उठाया था। कौन होगा जो ऐसा सुनकर आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं करेगा? लेकिन यह समझ में नहीं आता कि वह अकेला व्यक्ति इतने सारे लोगों को प्रताड़ित करने का दोषी कैसे माना जा सकता है! ज्यादा से ज्यादा आप उस पर बदतमीजी का आरोप लगा सकते हैं। इस बात को भी काफी तूल दिया जा रहा है कि शाहरूख शराब पिए हुए थे। अगर ऐसा है तो नशे की हालत में होने वाले झगड़े को लेकर इतना बवाल क्यों मचाया जाए? शायद इसलिए क्योंकि शाहरूख एक अभिनेता और आईपीएल फ्रेंचाइजी के मालिक हैं, जिनकी हर छोटी-बड़ी हरकत एक मसालेदार खबर बनने की गुंजाइश रखती है। लेकिन क्या वह किसी को पाँच साल के लिए प्रतिबंधित करने का आधार बन सकता है?

शाहरूख को सबक सिखाते समय मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन को शायद इस बात का भी ख्याल नहीं रहा कि वह अपने दायरे से भी बाहर जा रहा है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने उसके फैसले की पुष्टि नहीं की है। उसका कहना है कि एमसीए अपने स्तर पर ऐसा फैसला नहीं कर सकता, ज्यादा से ज्यादा वह इसकी सिफारिश कर सकता है। कारण? वानखेड़े स्टेडियम एमसीए की नहीं बल्कि बीसीसीआई संपत्ति है। स्टेडियम पर चल रहे आईपीएल के मैचों का आयोजक भी बीसीसीआई ही है। एमसीए सिर्फ स्टेडियम का प्रशासक है और किसी दूसरे की संपत्ति पर किसी को प्रतिबंधित करने का हक उसे नहीं है। बेहतर होता कि यह विवाद शाहरूख, एमसीए अधिकारियों और बीसीसीआई के स्तर पर ही सुलझ जाता। शाहरूख ने अच्छा नहीं किया, लेकिन निजी अहं के इस झगड़े में समस्या की तह तक जाए बिना फैसला करने और दूसरे पक्ष को अपनी बात कहने का मौका न देकर एमसीए ने भी कोई अच्छी मिसाल कायम नहीं की है।

Saturday, April 21, 2012

चीनी चुनौती तक ही क्यों रुके हमारी अग्निरेखा?

अग्नि एक निरंतर चलने वाला मिसाइल कार्यक्रम है इसलिए सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी सुरक्षा तैयारियों को चीन की चुनौती खारिज करने तक सीमित रखे या हमें उससे आगे भी बढ़ना है। -बालेन्दु शर्मा दाधीच जनवरी 2007 में चीन ने धरती से साढ़े आठ सौ किलोमीटर दूर अपने एक पुराने और बेकार उपग्रह को मिसाइल के जरिए नष्ट कर दुनिया को थर्रा दिया था। यह जमीनी जंग को आसमान तक ले जाने की चीन की क्षमता का प्रदर्शन था। अमेरिका और रूस ने अपनी-अपनी 'स्टार वार्स' परियोजनाओं को बंद करके अंतरिक्ष को हथियारों की होड़ से मुक्त करने का जो संकल्प लिया था, उसे चीनी कार्रवाई ने एक विकराल धमाके के साथ भंग कर दिया था। यह विज्ञान को इस्तेमाल कर की गई फौजी कार्रवाई थी जिसके लक्ष्य राजनैतिक थे। चीन महाशक्ति घोषित कर दिए जाने की जल्दी में था। काल का पहिया एक बार फिर घूमा है। अंतर महाद्वीपीय अग्नि-5 मिसाइल के सफल परीक्षण ने भारत के लिए भी अंतरिक्ष-युद्ध की नई शक्ति बनने का रास्ता खोल दिया है। धरती के वातावरण से ऊपर करीब छह सौ किलोमीटर की ऊंचाई तक जाने वाली अग्नि ने आठ सौ किलोमीटर के उस लक्ष्य को हमारी पहुँच में ला दिया है, जो अपनी रक्षा जरूरतों के लिए उपग्रहों का इस्तेमाल करने और दूसरों के उपग्रहों को निशाना बनाने की बुनियादी जरूरत समझा जाता है। अग्नि-5 के परीक्षण से भारत लगभग आधी दुनिया को अपने सुरक्षा दायरे में लाने की स्थिति में आ रहा है। लेकिन अग्नि एक निरंतर चलने वाला मिसाइल कार्यक्रम है इसलिए सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी सुरक्षा तैयारियों को चीन की चुनौती खारिज करने तक सीमित रखे या हमें उससे आगे भी बढ़ना है। चीन ने अग्नि-5 के परीक्षण पर किस्म-किस्म की प्रतिक्रियाओं के बीच इस मिसाइल के पीछे छिपी संभावनाओं को बिल्कुल ठीक महसूस किया है। उसने अमेरिका, रूस तथा यूरोप से आग्रह किया है कि वे भारत के मिसाइल कार्यक्रम को रुकवाने के लिए अपने असर का इस्तेमाल करें और संभव हो तो इसके लिए जरूरी कल-पुर्जों तथा तकनीक की सप्लाई का रास्ता रोकें। अहम बात यह है कि अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 में मूल रूप से भारत में ही विकसित टेक्नॉलॉजी का प्रयोग किया गया है। हो सकता है कि लंबी दूरी की मिसाइलों के युग में जाने के लिए भारत को विदेशी तकनीकों की जरूरत पड़े, लेकिन हमारे वैज्ञानिकों तथा तकनीशियनों ने सिद्ध कर दिया है कि ऐसा न भी हुआ तो वे अपने रास्ते पर खुद चलने में सक्षम हैं। हो सकता है कि प्रक्रिया थोड़ी और लंबी तथा समय-साध्य हो जाए। जब हम चांद पर उपग्रह भेज सकते हैं तो लंबी दूरी की मिसाइल भी तैयार कर सकते हैं और चाहें तो एंटी सैटेलाइट वेपन (एसैट) के क्षेत्र में भी कदम रख सकते हैं। सवाल उठता है कि क्या हमें ऐसा करना चाहिए? राजनैतिक और आर्थिक लिहाज से यह एक नाजुक सवाल है, जिसका सकारात्मक या नकारात्मक दोनों ही जवाब विश्व के राजनीतिक तथा सुरक्षा मानचित्र पर भारत का दर्जा परिभाषित करेंगे। परमाणु हथियारों के संदर्भ में हम कई दशकों तक इसी तरह की पसोपेश का सामना करते रहे हैं। भारत के बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु विस्फोट कर स्थिति को उलझा दिया लेकिन आज विश्व राजनीति में भारत का दर्जा तीसरी दुनिया के किसी आम-फहम देश जैसा नहीं रह गया है। वह एक उभरती हुई विश्व शक्ति माना जा रहा है। अमेरिका तथा दूसरे देशों के साथ हुए परमाणु समझौतों ने प्रतिबंधों और यथास्थिति की बची-खुची दीवारों को भी तोड़ दिया है। अगर भारत अपने मिसाइल कार्यक्रम को आक्रामक रफ्तार से आगे बढ़ाना चाहता है तो संभवतः यह उसके लिए सर्वाधिक अनुकूल समय है। अमेरिका, रूस और यूरोप से हमारे संबंध बहुत अच्छे हैं। पूरब में हमने रिश्ते सुधारे हैं। यहाँ तक कि ईरान, म्यांमार जैसे जिन देशों से अमेरिका को समस्या रही है, उनके साथ भी हमारे रिश्तों में कोई अड़चन नहीं है। अग्नि-5 के परीक्षण पर दुनिया भर में हुई प्रतिक्रिया ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि चीन और पाकिस्तान के अलावा हमने कोई नए दुश्मन नहीं बनाए हैं। यहाँ तक कि भारत के नौसैनिक, परमाणु तथा अन्य सुरक्षा कार्यक्रमों पर तपाक से बयान जारी करने वाले ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भी इस बार कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं की। क्या यह चीन के बरक्स उभरती हुई एक नई शक्ति के प्रति विश्व समुदाय की मौन स्वीकृति नहीं? नए दौर की चुनौतियाँ भारतीय मिसाइल कार्यक्रम के शिखऱ पुरुष वीके सारस्वत ने ठीक कहा है कि नए युग में सुरक्षा चुनौतियाँ भी नए किस्म की हैं। भले ही भारत का सुरक्षा कार्यक्रम चीन और पाकिस्तान के हमलों की स्थिति में आत्म-रक्षात्मक कवच को मजबूत करने पर आधारित है, लेकिन हम उपग्रहों का सैन्य इस्तेमाल किए जाने, हमारे उपग्रहों को मिसाइलों से नष्ट कर दिए जाने, अपनी मिसाइलों को मार्ग में ही ध्वस्त किए जाने (चीन के पास मिसाइलरोधी मिसाइल है) जैसी आशंकाओं को नजरंदाज नहीं कर सकते। परमाणु हथियारों और उन्हें ले जाने के लिए लंबी दूरी के भरोसेमंद डिलीवरी सिस्टम्स की मौजूदगी हमें डिटरेंट (हमलावर को हतोत्साहित करना) की क्षमता तो देती है, लेकिन दूसरी किस्म के आक्रमणों की आशंका से मुक्त नहीं करती। जैसे हमारे संचार तंत्र को नष्ट कर दिए जाने की आशंका। ऐसी स्थितियों में अग्नि की छोटी दूरी के अस्थायी उपग्रहों को स्थापित करने की क्षमता बहुमूल्य सिद्ध हो सकती है। थोड़ा फेरबदल करके उसे आक्रामक मिसाइलों को नष्ट करने वाली मिसाइल में भी बदला जा सकता है। लेकिन बड़ी बात यह है कि हम स्वयं भी हमलावर राष्ट्र के सैन्य उपग्रहों को निशाना बनाने की स्थिति में आ सकते हैं और यहाँ तक कि अपने उपग्रहों पर भी परमाणु-सम्पन्न मिसाइलें तैनात कर सकते हैं। युद्ध कला में आक्रमण को ही बचाव की सर्वश्रेष्ठ रणनीति माना जाता है। भारत को यदि अपनी सुरक्षा तैयारियों को डिटरेंट के स्तर तक ही सीमित रखना है तब भी उसे अंतरिक्षीय चुनौतियों को परास्त करने के लिए एक भरोसेमंद प्रणाली का विकास करना ही होगा। लंबी दूरी की अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें, जिनकी रेंज आठ हजार किलोमीटर से ज्यादा है, भी अब हमारी रेंज में दिखती है। चीन के कुछ हल्कों में तो यह आशंका ही जताई गई है कि अग्नि-5 की असल रेंज आठ हजार किलोमीटर ही है। चीनियों की मंशा यूरोपीय देशों को आशंकित करने की है, जिन्होंने अग्नि के प्रक्षेपण पर कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। वह भारत को यूरोपीय देशों के लिए संभावित चुनौती के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। शायद इससे उसके राजनैतिक हित सधते हों। सवाल यह नहीं है कि अग्नि-5 की रेंज साढ़े पाँच हजार किलोमीटर ही है या आठ हजार किलोमीटर। सवाल यह है कि क्या हमें आठ हजार या उससे भी ज्यादा दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों की जरूरत है? सैन्य लिहाज से तो शायद हमें इसकी कोई व्यावहारिक जरूरत कभी न पड़े, लेकिन राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में इस तरह का कदम बेकार नहीं जाएगा। वह हमें विश्व के सर्वाधिक शक्ति-सम्पन्न देशों की कतार में खड़ा कर सकता है। उस कतार में, जहाँ अभी इंग्लैंड और फ्रांस जैसे सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों की भी उपस्थिति नहीं है, यानी अमेरिका, रूस और चीन की श्रेणी में। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा करने के दूरगामी राजनैतिक, राजनयिक, सैन्य निहितार्थ होंगे। अग्नि 5 में छिपी संभावनाएँ दिखाती हैं कि हमें चीनी खतरे से आगे बढ़कर सोचना चाहिए। मनोवैज्ञानिक बढ़त की ओर लंबी दूरी की मिसाइलों के विकास या उपग्रहरोधी मिसाइल तंत्र की स्थापना का अर्थ यह नहीं है कि भारत किसी दूरस्थ देश के विरुद्ध उनका उपयोग करेगा ही। लेकिन जब आप शक्तिशाली होते हैं तो आपकी आवाज सुनी जाती है। आखिरकार अमेरिका, चीन और रूस ने परमाणु हथियारों का इतना जबरदस्त जखीरा क्यों खड़ा किया? स्टार वार्स कार्यक्रमों के जरिए अपनी ताकत क्यों दिखाई। आज भी अमेरिका के पास 8500 और रूस के पास 10,000 परमाणु हथियार मौजूद हैं, जबकि विश्व इतिहास में परमाणु बम के इस्तेमाल की सिर्फ एक ही मिसाल मिलती है। भविष्य में भी यदि किनाहीं राष्ट्रों के बीच परमाणु युद्ध हुआ तो उसमें दो-तीन से अधिक परमाणु हथियार शायद ही इस्तेमाल हों। फिर भी इन देशों ने हजारों परमाणु हथियार क्यों बनाए? अपने प्रतिद्वंद्वी पर मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने के लिए इस संख्या का प्रतीकात्मक महत्व है। ऐसे में, सुरक्षात्मक तथा शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही सही, भारत को अपने सुरक्षा तथा अंतरिक्ष कार्यक्रमों का विस्तार करना चाहिए। अग्नि के सफल प्रक्षेपण से भारत का न्यूक्लियर ट्रायड का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है। इस समय सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन इस श्रेणी में आते हैं। ट्रायड से तात्पर्य किसी राष्ट्र द्वारा परमाणु हमले का शिकार होने की स्थिति में दूसरे माध्यमों से जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता से है। इसके लिए तीन तरह की क्षमताएँ होना जरूरी है- एक टन से अधिक का परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (अग्नि-5), दूर तक परमाणु बम ले जाने मं सक्षम लड़ाकू विमान (मिराज और सुखोई) और पनडुब्बी से परमाणु हथियार दागने की क्षमता (आईएनएस चक्र)। इस परीक्षण से हमारे सुरक्षा इतिहास में यकीनन एक ऐसी अग्निरेखा खिंच गई है, जिसकी उपेक्षा करना किसी के लिए संभव नहीं होगा।

Friday, March 16, 2012

इस 'खुदकुशी' ने दिनेश त्रिवेदी को नेता बना दिया

दुर्भाग्य से हाल के वर्षों में हमारे रेल मंत्री रेलवे की आर्थिक सेहत और ढांचागत विकास की बजाए लोकलुभावन घोषणाओं के लिए ज्यादा बेताब रहे हैं। दिनेश त्रिवेदी ने इस ढर्रे से आगे बढ़ने की कोशिश की है। उनके इस दावे को स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं बनता कि उन्होंने अपने पद की तुलना में भारतीय रेल के हितों को तरजीह दी है। अफसोस कि गठबंधन राजनीति, स्वार्थी राजनैतिक दलों और अहंवादी राजनेताओं के युग में संतुलित और भविष्योन्मुखी बजट पेश करने का अंत श्री त्रिवेदी जैसा दुखद होता है।

-बालेन्दु शर्मा दाधीच

दिनेश त्रिवेदी ने अपने रेल बजट भाषण की शुरूआत में अपने पूर्ववर्तियों को, जिनमें लाल बहादुर शास्त्री भी शामिल थे, याद किया था। इस तुलना को देखकर विपक्षी सांसदों के चेहरों पर मुस्कुराहट थी लेकिन त्रिवेदी अडिग थे। जैसा कि बाद में दिन भर घटी घटनाओं से साफ हो गया, श्री त्रिवेदी 'शहीदी अंदाज' में अपने राजनैतिक जीवन का सबसे बड़ा कदम उठाने जा रहे थे। उन्होंने संयत अंदाज में पेश किए गए अपने लंबे बजट भाषण के दौरान बहुत से नए प्रशंसक बनाए होंगे, जिसके दर्जनों प्रावधान न सिर्फ उनके पूर्ववर्तियों- ममता बनर्जी और लालू प्रसाद यादव की बनाई लीक से हटकर थे बल्कि भारतीय रेलवे की समस्याओं, जरूरतों और भविष्य की तैयारी के प्रति उनकी अच्छी समझबूझ को भी जाहिर कर रहे थे। ऐसे समय पर, जबकि परिवहन के क्षेत्र में बाकी सभी सेवाओं के शुल्क तेजी से बढ़े हैं, रेलवे को बरस.दर.बरस किसी भी तरह की शुल्क वृद्धि से मुक्त रखना न तो व्यावहारिक हो सकता है और न ही सेहतमंद, खासकर तब जब वह लगातार भारी घाटा उठा रही हो। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे रेल मंत्री पारंपरिक रूप से रेलवे की आर्थिक सेहत या विकास की बजाए लोकलुभावन घोषणाओं के लिए ज्यादा बेताब रहे हैं। दिनेश त्रिवेदी के इस दावे को स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं बनता कि उन्होंने अपने पद की तुलना में भारतीय रेल के हितों को तरजीह दी है। अफसोस कि गठबंधन राजनीति, स्वार्थी राजनैतिक दलों और अहंवादी राजनेताओं के युग में संतुलित और भविष्योन्मुखी बजट पेश करने का अंत श्री त्रिवेदी जैसा दुखद होता है।

कुछ दिन पहले तक दिनेश त्रिवेदी की छवि एक नामालूम से केंद्रीय मंत्री की थी जो बार-बार अपनी पार्टी अध्यक्ष द्वारा उपेक्षित किया जा रहा था। खबर थी कि दिल्ली से कोलकाता की एक फ्लाइट में ममता बनर्जी ने उन्हें पीछे की सीट पर भेज दिया था और मुकुल राय को अपने साथ बैठने को कहा था। कहा जाता है कि श्री त्रिवेदी की कुछ गतिविधियों से ममता बनर्जी खफा थीं। ये गतिविधियां क्या थीं? वे पिछले कुछ महीनों से राज्यों के दौरे कर वहां के मुख्यमंत्रियों से मुलाकात कर रहे थे और उनके राज्य की जरूरतों को समझने की कोशिश कर रहे थे। कोई केंद्रीय मंत्री अगर राज्य सरकारों के साथ समझबूझ कायम करने की कोशिश करता है तो शायद हर कोई इसे सराहेगा। लेकिन ममता बनर्जी नहीं, जो दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों की तरह किसी भी नेता को 'ढील' नहीं देना चाहतीं। हालांकि श्री त्रिवेदी की छवि किसी तेज-तर्रार मंत्री की नहीं रही, लेकिन ऐसा लगता है कि वे रेल मंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारी को काफी संजीदगी से ले रहे थे। शायद ममता बनर्जी की तुलना में कुछ ज्यादा ही, जिन्होंने लालू प्रसाद यादव के कायर्काल के दौरान भारी लाभ में चल रही रेलवे को घाटे, दूरंतो और कुछ लोकलुभावन वादों के सिवा ज्यादा कुछ नहीं दिया। दिनेश त्रिवेदी का बजट भाषण भी ममता बनर्जी की तुलना में बेहतर, संतुलित और संयमित था, जिसमें गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की पंक्तियों से लेकर कई शेरों और कविताओं को शामिल कर उन्होंने भाषा तथा अभिव्यक्ति पर ममता बनर्जी से बेहतर पकड़ का परिचय दिया। लेकिन जिस एक बात को शायद तृणमूल कांग्रेस पचा नहीं सकी, वह यह थी कि यह बजट भी ममता बनर्जी के पारंपरिक बजटों से कहीं बेहतर, ज्यादा व्यावहारिक और भविष्योन्मुखी था।

ममता बनर्जी की मांग पर जिन्हें रेल मंत्री बनना है, उन मुकुल राय से बहुत ज्यादा उम्मीद मत लगाइए। ये वही मुकुल राय है जिन्होंने एक ट्रेन हादसे के बाद प्रधानमंत्री द्वारा घटनास्थल पर पहुंचने का निदेर्श मिलने पर टका सा जवाब दिया था कि घटनास्थल को साफ किया जा चुका है और वहां जायजा लेने जैसी कोई जरूरत नहीं है। अलबत्ता, क्षेत्रीय क्षत्रपों की अल्पदृष्टि आधारित, 'सुरक्षित' राजनीति में ऐसे मंत्री ज्यादा अनुकूल समझे जाते हैं। याद कीजिए सुरेश प्रभु को, जिन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के जमाने में शिव सेना ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटवा दिया था जबकि नदियों को जोड़ने की परियोजना जैसे मामलों में उनकी भूमिका उत्कृष्ट रही थी। छोटे दलों के नेताओं को जरूरत से ज्यादा कायर्कुशलता दिखाना भारी पड़ जाता है। आपको दयानिधि मारन भी याद होंगे जिन्हें द्रमुक ने यूपीए.1 के दौरान केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटवाया था।

रेलवे को पटरी पर लाने की कोशिश

दिनेश त्रिवेदी के रेल बजट में नई रेलगाङ़ियों, नई रेलवे लाइनें बिछाने, दोहरीकरण और विद्युतीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने, ज्यादा माल ढुलाई और ज्यादा यात्रियों के लक्ष्य जैसे पारंपरिक फीचर तो हैं ही, लालू प्रसाद यादव की तरह बहुत नई जमीन न तोड़ते हुए भी कई किस्म की साहसिक और नई पहल की गई है। लालू प्रसाद यादव के कायर्काल को छोड़ दें तो भारतीय रेल अपना काम चलाने के लिए वित्त मंत्रालय की मेहरबानी पर ही निभ्रर रही है। ममता बनर्जी के कायर्काल में वह फिर से अपनी दयनीय स्थिति में लौट आई थी। लेकिन अब देश जिस किस्म की आर्िथक नीतियों पर चल रहा है, उनकी सफलता के लिए जरूरी है कि हर मंत्रालय आत्मनिभ्रर हो। वह न सिर्फ अपना खर्च खुद उठा सके, नए इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास कर सके बल्कि केंद्र सरकार को भी आर्िथक योगदान दे सके। उस लिहाज से लालू यादव के जमाने में रेलवे ने सही दिशा पकड़ी थी। दिनेश त्रिवेदी ने उसी दिशा को फिर से पकड़कर रेलवे को पटरी पर लाने का प्रयास किया है, हालांकि उनकी शैली लालू प्रसाद से अलग है।

रेल किराये बढ़ाने के मुद्दे पर ममता बनर्जी के पारंपरिक रुख से अवगत होते हुए भी उन्होंने सिर्फ धनी लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली श्रेणियों में ही नहीं बल्कि आम लोगों से जुड़ी श्रेणियों (जनरल डिब्बे और स्लीपर क्लास) के किरायों में भी मामूली बढ़ोत्तरी की है। मिसाल के तौर पर दिल्ली से पटना के बीच जनरल क्लास के किराए में कुल बीस रुपए की वृद्धि। किलोमीटर के लिहाज से जनरल डिब्बे में दो पैसे प्रति किलोमीटर और स्लीपर क्लास में पांच पैसे प्रति किलोमीटर की वृद्धि हुई है जिससे हम रेलयात्रियों को शायद कोई विशेष समस्या न हो लेकिन ममता बनर्जी को तकलीफ है जो खुद को गरीबों की मसीहा मानती हैं। बहरहाल, पार्टी में पीङ़ित और उपेक्षित श्री त्रिवेदी ने शायद अपनी 'राजनैतिक शहादत' से पहले लोकलुभावन कदमों की बजाए आर्थिक हालात के लिहाज से फैसले करना जरूरी समझा क्योंकि, उन्हीं के शब्दों में 'रेलवे को एअर इंडिया की दिशा में नहीं जाने दिया जाना चाहिए।'

रेल सुरक्षा और आधुनिकीकरण पर फोकस

श्री त्रिवेदी के रेल बजट में किराए बढ़ाकर करीब सात हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व जुटाने की व्यवस्था की है। इस समय किरायों के मद पर रेलवे को करीब बीस हजार करोड़ रुपए का सालाना नुकसान हो रहा है। रेल मंत्रालय ने केंद्रीय बजट में 45 हजार करोड़ रुपए की मांग की थी लेकिन उसे 24 हजार करोड़ रुपए ही आवंटित किए गए हैं। ऐसे में उसे नए स्रोतों की तलाश, सरकारी और निजी भागीदारी और रेलवे की परिसंपित्तयों के व्यावसायिक दोहन के जरिए एक मजबूत वित्तीय मॉडल तैयार करने की जरूरत है। खासकर तब जब आप सचमुच रेलवे का आधुनिकीकरण करना चाहते हों। श्री त्रिवेदी ने डॉ॰ अनिल काकोदकर और सैम पित्रोदा समितियों द्वारा रेलवे के आधुनिकीकरण और सुरक्षा संबंधी सिफारिशों पर अमल की बात कही है। भारतीय रेलवे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के लिए यह जरूरी है, लेकिन इन पर अमल का मतलब है अगले पांच साल में करीब दस लाख करोड़ रुपए का निवेश। सिर्फ वित्त मंत्री की उदारता पर निभ्रर रहकर इस किस्म का कायाकल्प संभव नहीं है। श्री त्रिवेदी को अहसास है कि रेलवे के कायाकल्प के लिए जिस किस्म के संसाधनों की जरूरत है, वे निजी क्षेत्र को साथ लिए बिना नहीं जुटाए जा सकते। इसी लिहाज से उन्होंने निजी क्षेत्र के साथ मिलकर रेलवे स्टेशनों के विकास और आधुनिकीकरण के लिए स्टेशन डेवलपमेंट कारपोरेशन की स्थापना का प्रावधान किया है, जिसका उद्योग जगत ने स्वागत किया है। इसके तहत अगले पांच साल में सौ प्रमुख रेलवे स्टेशनों का नए सिरे से विकास किया जाएगा।

रेल दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारण रेलयात्री अपनी सुरक्षा को लेकर लंबे अरसे से आशंकित रहे हैं। सन 2002 से 2001 के बीच कुल मिलाकर 1406 रेल हादसे हो चुके हैं जिनमें एक हजार से ज्यादा लोगों की जान गई है। रेल हादसों की रोकथाम के लिए आधुनिक संचार प्रणालियों और उपकरणों की खरीद पर चर्चा तो कम से कम दो दशकों से हो रही है लेकिन जमीनी स्तर पर हालात बदलते नहीं दिखाई दे रहे। लेकिन इस बार किसी मंत्री ने इन हादसों को गंभीरता से लिया है। श्री त्रिवेदी ने सुरक्षा के लिहाज से ढांचागत सुधार के लिए आठ हजार करोड़ रुपए का आवटन किया है। अगले पांच साल के भीतर बिना फाटक वाले रेलवे क्रासिंग को खत्म करने, एक स्वतंत्र रेलवे सुरक्षा प्राधिकरण की स्थापना, रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम के आधुनिकीकरण और उपग्रह आधारित रियल टाइम ट्रेन सूचना प्रणाली शुरू करने जैसे प्रावधान किए गए हैं। तीन हजार किलोमीटर की दूरी में ट्रेनों की भिड़ंत रोकने के लिए हाई.टेक रेलवे प्रोटेक्शन और वार्निंग सिस्टम लगाया जाने वाला है। रेलों और प्लेटफॉर्मों को साफ.सुथरा बनाना भी भले ही छोटा सा काम प्रतीत हो लेकिन यात्रियों की सेहत के लिहाज उसकी अहमियत में कोई संदेह नहीं है। दिनेश त्रिवेदी से ऐसी उम्मीद नहीं थी। कुछ तो उनके राजनैतिक दल के कारण और कुछ उनकी निष्क्रिय सी छवि के कारण भी। लेकिन उन्होंने सबको चौंका दिया है। न सिर्फ रेलवे के बारे में अपनी समझ से, बल्कि अपने विभाग की खातिर राजनैतिक आत्महत्या के लिए तैयार होकर भी। उन्हें यकीनन याद किया जाएगा।

(जागरण में प्रकाशित)

Tuesday, January 31, 2012

सुप्रीम कोर्ट में सेनाध्यक्ष

भले ही आप जनरल वीके सिंह के नजरिए से सहमत हों या नहीं, भारत के थलसेनाध्यक्ष होने के साथ.साथ वे एक सामान्य नागरिक भी हैं, जिसे अदालत की शरण में जाने का पूरा अधिकार प्राप्त है।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

अपनी आयु के विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाने के जनरल वीके सिंह के 'अप्रत्याशित' कदम ने सेना और सरकार दोनों को झकझोर दिया है। देश के शीर्ष जनरल होने के नाते जनरल सिंह इस बात से बेखबर नहीं होंगे कि उनके जैसे दजेर् के व्यक्ति द्वारा केंद्र सरकार को अदालत में खींचने के नतीजे दूरगामी होंगे. न सिर्फ सेना तथा सरकार के संबंधों के संदर्भ में, बल्कि उनके निजी कैरियर के लिहाज से भी। सुप्रीम कोर्ट में मामला सुनवाई के लिए आए इससे पहले जनरल सिंह को मीडिया तथा आम लोगों की स्क्रूटिनी का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें प्रतिष्ठान विरोधी दुस्साहस, सेना की गौरवशाली परंपरा को तोड़ने और निजी नैतिकता से विचलित होने का दोषी ठहराया जा रहा है। उन्हें इन कसौटियों पर कसते समय भी किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के थलसेनाध्यक्ष होने के साथ.साथ वे एक सामान्य नागरिक भी हैं, जिसे अदालत की शरण में जाने का पूरा अधिकार प्राप्त है। कुछ कनिष्ठ अधिकारी तो पहले भी अदालत जाते रहे हैं। अपने हक़ का इस्तेमाल करने के लिए उनकी सिर्फ इस आधार पर निंदा नहीं की जानी चाहिए कि पहले किसी जनरल ने ऐसा नहीं किया। परंपराएं आसमान से नहीं टपकतीं, बनाई जाती हैं।

जनरल सिंह का दावा है कि वे सेनाध्यक्ष के रूप में अपना कायर्काल एक और साल बढ़वाने के लिए यह सब नहीं कर रहे हैं। आयु का विवाद उनके लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल है जिसे सही अंजाम तक पहुंचाना वे जरूरी समझते हैं। हाल तक ज्यादातर लोगों के बीच यही धारणा थी कि सेना में सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद उनके मन में कोई और महत्वाकांक्षा बाकी नहीं रह जानी चाहिए तथा जो व्यक्ति शीर्ष पद तक पहुंच गया हो वह अपने साथ नाइंसाफी की शिकायत भला कैसे कर सकता है। जनरल सिंह के कैरियर ग्राफ को देखते हुए भी ऐसा नहीं लगता कि उन्हें केंद्र सरकार या रक्षा मंत्रालय के स्तर पर कोई पक्षपात झेलना पड़ा होगा। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सारे मामले में रक्षा मंत्री एके एंटनी का आचरण भी बहुत शालीन तथा गरिमापूर्ण रहा है। वे जनरल के विरुद्ध या इस विवाद पर सावर्जनिक रूप से ऐसी कोई भी टिप्पणी करने से बचे हैं, जो सेना या उसके प्रमुख की गरिमा को किसी तरह की ठेस पहुंचाती हो। किंतु यदि जनरल सिंह आयु संबंधी विवाद का समाधान पाने के लिए सर्वोच्च अदालत तक पहुंचे हैं तो इस 'छोटे से मुद्दे' पर उनकी गंभीरता तथा उनके दावे की मजबूती पर संदेह नहीं रह जाना चाहिए।

हालांकि सरकार, मीडिया या किसी और हल्के में जनरल सिंह की सत्यनिष्ठा पर उंगली नहीं उठाई गई है, लेकिन इस मुद्दे पर आम लोगों के बीच जानकारी का अभाव है। बहुत से लोग यह धारणा बनाकर चल रहे हैं कि शायद यह (जनरल सिंह द्वारा) दस्तावेजों में जन्म तिथि बदल दिए जाने संबंधी विवाद है। वास्तव में ऐसा नहीं है। जन्मतिथि में बदलाव जनरल सिंह के स्तर पर नहीं किया गया बल्कि वह प्रशासनिक स्तर पर हुई तकनीकी चूक का परिणाम है जिसका नतीजा उन्हें भोगना पड़ रहा है। आम तौर पर सेना सरकारी तंत्र के साथ होने वाले ऐसे किसी भी विवाद को सावर्जनिक रूप से उठाने से बचती आई है क्योंकि सरकार और ब्यूरोक्रेसी की बुनियादी रुचि यथास्थिति को बनाए रखने में ज्यादा होती है। जनरल सिंह से भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ाने की उम्मीद लगाई जा रही थी लेकिन शायद अपनी छवि को अप्रभावित रखने, अपनी सत्यनिष्ठा सिद्ध करने या फिर किसी और वजह से उन्होंने सरकार के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट की शरण लेने का फैसला किया जो अपने आप में एक नई नजीर कायम करेगा। जनरल सिंह ने अनेक बार कहा है कि उनके इस कदम को इस रूप में न देखा जाए कि वे सेनाध्यक्ष पद पर एक और साल बने रहने के लिए बेताब हैं। वैसे भी सरकार के साथ अविश्वास के संबंध पैदा होने के बाद वे देश के सेनाध्यक्ष के रूप में शायद ज्यादा लंबे समय तक न चल पाएं, भले ही आयु संबंधी विवाद पर अदालती फैसला उनके पक्ष में ही क्यों नहीं आता।

नैतिकता और बुनियादी मुद्दा

यदि जनरल सिंह खुद को 'प्रताङ़ित' महसूस कर रहे हैं तो सरकार भी उनके ताजा फैसले से कम आहत नहीं है। शायद इसीलिए उसने इस मामले में अपना पक्ष मजबूती के साथ रखने का फैसला किया और जनरल सिंह के साथ किसी किस्म की सुलह.सफाई में दिलचस्पी नहीं दिखाई। अच्छा होता कि हालात इस हद तक पहुंचते ही नहीं और सेना तथा अफसरशाही के स्तर पर ही इसका समाधान खोज लिया जाता। लेकिन अब बात सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है तो इस पर दोनों तरफ से दलीलें और प्रति-दलीलें दी जानी तय हैं। सरकारी पक्ष जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दे रहा है वह यह है कि जनरल सिंह ने पिछले तीन.चार साल के भीतर तीन बार लिखित रूप में इस बात का भरोसा दिलाया है कि वे 10 मई 1950 को ही अपनी जन्मतिथि के रूप में स्वीकार करने को तैयार हैं, जैसा कि सेना के दस्तावेजों में दर्ज है। उन्होंने अपनी पदोन्नतियों के समय ये लिखित वायदे किए थे, जिनमें सन 2008 में सैन्य कमांडर और 2010 में थलसेनाध्यक्ष के रूप में उनकी पदोन्नति का मौका शामिल है। सरकारी रुख नैतिकता पर आधारित है और यह उम्मीद करता है कि जनरल सिंह अपने वायदे पर कायम रहेंगे, और सेना के सर्वोच्च अधिकारी से इस किस्म की आशा लगाना अनुचित भी नहीं है। लेकिन दूसरी ओर, नैतिकता एक व्यक्ति.सापेक्ष अवधारणा है। वह किसी पर थोपी नहीं जा सकती।

ंसरकार का रुख भले ही नैतिकता की दृष्टि से कितना भी उचित हो, सुप्रीम कोर्ट में शायद ही टिक पाए क्योंकि अदालत को जनरल सिंह के वायदे पर फैसला नहीं देना बल्कि मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी करनी है। उसे बस इस तथ्य का फैसला करना है कि उनकी जन्मतिथि है क्या। वह प्रशासनिक मामलों में दखल शायद ही करना चाहे। जनरल सिंह के पास अपनी जन्मतिथि को कानूनी रूप से 10 मई 1951 सिद्ध करने के लिए पयरप्त शैक्षणिक तथा अन्य दस्तावेज मौजूद हैं। सरकार की दूसरी दलील यह है कि उसने इस मामले पर एटार्नी जनरल से राय ली थी जो जनरल सिंह के पक्ष में नहीं थी। बकौल सरकार, वह इस राय को मानने के लिए बाध्य है। हालांकि इस बीच सुप्रीम कोर्ट के चार पूवर् मुख्य न्यायाधीशों ने कहा है कि सरकार के सामने ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ऐसी किसी राय से प्रभावित होने वाला नहीं है लेकिन इससे जनरल सिंह का पक्ष मजबूत तो हुआ ही है। इन न्यायाधीशों ने एटार्नी जनरल द्वारा दिए गए मशविरे की मेरिट (गुण-दोष) पर भी सवाल उठाया है।

प्रशासनिक जटिलताएं

कुछ खबरों में इस मसले के इस तरह उठ खड़े होने को सेना की आंतरिक राजनीति का नतीजा भी बताया गया है। इशारा स्वाभाविक रूप से इस ओर है कि शायद सैन्य नेतृत्व का एक वर्ग जनरल सिंह के रिटायर होने पर कुछ खास अधिकारियों के शीर्ष स्थिति में आने की संभावना को लेकर सहज महसूस नहीं कर रहा है। दूसरी ओर रक्षा मंत्रालय पर उन जनरलों द्वारा दबाव पड़ रहा है, जिनकी पदोन्नति की संभावना जनरल सिंह के इस पद पर बने रहने से प्रभावित होने वाली है। अगर जनरल वीके सिंह की जन्मतिथि का वर्ष 1951 माना जाता है तो वे इस साल 31 मई के स्थान पर अगले साल 13 मार्च को रिटायर होंगे। इस बीच पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह, जिन्हें जनरल सिंह का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जा रहा है, रिटायर हो जाएंगे। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी जीवन भर जिस उपलब्धि का इंतजार करता है, उससे किसी तकनीकी कारण से वंचित हो जाए, यह कोई आदर्श स्थिति नहीं होगी। कई अन्य सेनाधिकारी भी इसी श्रेणी में होंगे। जाहिर है, मामला सिर्फ जनरल सिंह के कायर्काल का नहीं बल्कि कई अन्य जटिलताओं तथा प्रशासनिक गुत्थियों से जुड़ा है। सारे विवाद का एक संभावित हल यह हो सकता है कि जनरल सिंह को 'पदोन्नत कर' तीनों सेनाध्यक्षों की समिति का प्रमुख नियुक्त कर दिया जाए। सरकार ने शायद इस संभावना पर गौर भी किया था।

सारे घटनाक्रम का एक पहलू यह भी है कि सेना में बहुत से अधिकारी यह महसूस करते हैं कि नागरिक अफसरशाही द्वारा उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। उन्हें पयरप्त सम्मान व महत्व नहीं दिया जाता। उस लिहाज से बहुत से सैन्य अधिकारियों के लिए जनरल सिंह के अदालत जाने का प्रतीकात्मक महत्व भी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला जनरल सिंह के समर्थन में होता है तो वह एक तरह से इस वर्ग की निगाह में सेना के गौरव को पुनप्रर्तिष्ठित करेगा। यदि नागरिक अफसरशाही वाकई हमारे वीरोचित सेनाधिकारियों को 'कैजुअल' तरीके से लेती है तो वह दुभ्राग्यपूण्र है। जनरल सिंह के बारे में कहा जाता है कि न सिर्फ उनका कायर्काल गौरवशाली और निर्विवाद रहा है बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में वे बहुत कठोर रुख भी लेते रहे हैं। उनके सेनाध्यक्ष बनने पर हमारे सैन्य ढांचे को ज्यादा चुस्त-दुरुस्त बनाने, उसका आधुनिकीकरण किए जाने और भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने के बारे में उम्मीदें बंधी थीं। नए युग में भारत की बढ़ती भूमिका के मद्देनजर थल सेना पर क्या जिम्मेदारियां हैं और कैसे वह खुद को बदलते परिवेश के अनुरूप ढाल सकती है, इस बारे में वे न सिर्फ सजग हैं बल्कि प्रयास भी करते रहे हैं। दूसरी ओर एके एंटनी ने भी ऐसे रक्षा मंत्री के रूप में छाप छोड़ी है जो किसी विवाद में पड़े बिना, एकमेव संकल्प के साथ अपने दाियत्व निभाने में लगे हुए हैं। हमारे रक्षा प्रतिष्ठान के शीर्ष पर दो अच्छे तथा काबिल लोगों के साहचयर् का समापन ऐसे अिप्रय विवाद में हो, यह दुभ्राग्यपूण्र ही कहा जाएगा। बेहतर हो कि अब भी सरकार और थलसेनाध्यक्ष इस मामले का ऐसा हल निकाल लें जो न सिर्फ दोनों पक्षों को स्वीकायर् हो, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा के भी अनुकूल हो।

Saturday, December 3, 2011

लोकतंत्र इंतजार करो, संसद में हंगामा जारी है

एफडीआई पर हंगामे के शोर में लोकपाल का मुद्दा अखबारों की छोटी खबर बन गया है। सरकार को विधेयक पास न होने का एक अच्छा कारण मिल गया है। जब संसद सत्र ही नहीं हो पा रहा तो विधेयक पास कैसे कराया जाए?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

एक बार फिर संसद सत्र में हंगामे का बोलबाला है। बाईस नवंबर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र में हर दिन नियम से हंगामा होता है और दोनों सदनों की कार्यवाही टल जाती है, फिर से वही प्रक्रिया दोहराए जाने के लिए। कभी बांग्लादेश इसके लिए मशहूर हुआ करता था जहां विपक्षी दलों के बरसों लंबे बायकाट के कारण संसदीय साख में भारी गिरावट आई। संसदीय कायर्वाही में व्यवधान और स्थगन अब भारत में भी आश्चर्य का विषय नहीं रहा। बल्कि वह एक नज़ीर बनता जा रहा है। संसद सत्र पर हर घंटे खर्च होने वाली 25 लाख रुपए की रकम प्रासंगिक नहीं रह गई है। न ही जरूरी विधेयकों का पारित होना या न होना। ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष जोर.जोर से अपनी बात सुनाने के लिए संसद का इस्तेमाल कर रहे हैं। धरनों, प्रदर्शनों, बंद, हड़तालों, बहसों और चर्चाओं की तुलना में संसदीय हंगामा अपनी पसंद के मुद्दों की ओर ध्यान खींचने का आसान जरिया बन रहा है। नतीजे में संसदीय परंपराओं तथा गरिमाओं का क्षरण हो रहा है।

संसदीय कायर्वाही के आंकड़े निराशाजनक हैं। सन 2009 में शुरू हुई पंद्रहवीं लोकसभा में 200 प्रस्तावित विधेयकों में से अब तक सिर्फ 57 विधेयक पारित हो सके हैं। इनमें भी 17 फीसदी विधेयक ऐसे थे जिन पर पांच मिनट से भी कम समय के लिए चर्चा हुई। ऐसी चर्चाओं की सार्थकता का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इस बार के संसद के मौजूदा सत्र में 21 बैठकें होनी थीं मगर एक तिहाई सत्र का घटनाक्रम देखते हुए आगे बचे दिनों से भी विशेष उम्मीद नहीं पालनी चाहिए। इस बीच 31 विधेयकों के पारित होने और लोकपाल विधेयक समेत 23 बिलों को पेश किए जाने की संसदीय प्रक्रिया हालात संभलने का इंतजार कर रही है।

हंगामा जरूरी या चर्चा

संसद को चलने दिया जाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्र हित के मुद्दों को उठाने तथा उन पर सार्थक निर्णय करने और करवाने का वही मंच है। विधानसभाओं के सत्र तो वैसे ही राज्य सरकारों की राजनैतिक सुविधा-असुविधा पर आश्रित होकर निरंतर छोटे से छोटे होते जा रहे हैं। ले-देकर केंद्र में प्राय: समय पर संसदीय सत्रों का आयोजन होता है तो वह हंगामों की भेंट चढ़ जाता है। इससे वास्तव में किसी का नुकसान होता है तो हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का। सरकार तो अपने कार्यों को वैकल्पिक माध्यमों से भी पूरा कर लेती है। बेहतर यह हो कि भ्रष्टाचार, महंगाई, लोकपाल, नए राज्यों की स्थापना और ऐसे ही दूसरे महत्वपूण्र मुद्दों पर हंगामे की बजाए चर्चा हो। गतिरोध रास्ता रोकता है, उसे आगे नहीं बढ़ाता। किंतु पिछले तीन सत्रों के दौरान यदि संसद का सवरधिक समय किसी प्रक्रिया में व्यतीत हुआ तो वह थी. गतिरोध। इसके लिए किसी भी पक्ष को एकतरफा तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह हमारे राजनैतिक तंत्र की समस्या बन चुकी है।

आज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक और वामपंथी दलों ने जो रणनीति अपनाई है, वही राजग शासनकाल में कांग्रेस की रणनीति हुआ करती थी। पूवर् रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज के विरुद्ध लगे आरोपों को लेकर संसद में लंबे समय तक इसी तरह का गतिरोध पैदा किया गया। आज राजग ने पी चिदंबरम को संसद में न बोलने देने का निण्रय लिया है तो तब कांग्रेस जॉर्ज के साथ ऐसा ही करती थी। जब वे बोलने खड़े होते थे तो हंगामा होता था और कांग्रेसी सांसद सदन छोड़कर चले जाते थे। मुद्दे भी एक से हैं और परिस्थितियां भी एक सी। बस किरदार बदल गए हैं।

सरकार को राहत?

कई बार लगता है कि विपक्ष जिस हंगामे को अपनी बात पर जोर डालने का जरिया मान रहा है, वह सत्तारूढ़ दल के लिए कहीं अधिक अनुकूल सिद्ध हो रहा है। संप्रग सरकार 2जी घोटाले, महंगाई, भ्रष्टाचार, लोकपाल विधेयक, तेलंगाना की स्थापना और उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांगें और मंदी की आशंका जैसे मुद्दों पर घिरी हुई है। यदि संसद चलती तो ऐसे मुद्दों पर विपक्ष के हमले अवश्यंभावी थे। अन्ना हजारे दोबारा दिल्ली में अनशन पर बैठने की घोषणा कर चुके हैं। अनशन की अवधि उतनी प्रासंगिक नहीं है जितना कि उसका प्रभाव। सुब्रह्मण्यम स्वामी दूरसंचार घोटाले से जुड़े विवादों में गृह मंत्री पी चिदंबरम की भूमिका का पर्दाफाश करने का 'प्रण' लेकर बैठे हैं। पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा के बयानों और सरकारी दस्तावेजों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने के अदालती आदेश ने उनका काम आसान कर दिया है। सरकार कई मुद्दों पर जवाब देने की स्थिति में नहीं है। संसद चलता तो उसकी स्थिति कोई बहुत सुविधाजनक नहीं होने वाली थी।

लेकिन भला हो खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संबंधी फैसले का, जिसने यह सुनिश्चित कर दिया कि संसद चलेगी ही नहीं। यहां हम इस फैसले के गुणदोष पर चर्चा नहीं कर रहे क्योंकि उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के इतने साल बाद यह फैसला तो स्वाभाविक ही था, लेकिन मुद्दा इसकी टाइमिंग का है। इसकी घोषणा ऐन संसद सत्र के मौके पर किया जाना सिर्फ विपक्षी एकता को मजबूत करने वाला कदम मात्र नहीं है। यह एक चतुराई भरा राजनैतिक फैसला भी है। यह निण्रय अनायास नहीं हुआ होगा कि संसद सत्र के दौरान इसकी घोषणा सदन से बाहर की जाए। सरकार को इस पर संभावित विपक्षी प्रतिक्रिया का भली भांति अहसास रहा होगा। अब भले ही अन्ना हजारे कहते रहें कि शीतकालीन सत्र में लोकपाल विधेयक पारित न होने पर वे राष्ट्रव्यापी आंदोलन में जुट जाएंगे। एफडीआई पर हंगामे के शोर में लोकपाल का मुद्दा अखबारों की छोटी खबर बन गया है। सरकार को विधेयक पास न होने का एक अच्छा कारण मिल गया है। जब संसद सत्र ही नहीं हो पा रहा तो विधेयक पास कैसे कराया जाए? न महंगाई, न भ्रष्टाचार और न काला धन। कम से कम उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों तक उसे इन आक्रामक मुद्दों से कन्नी काटने का मौका मिल गया है।

Saturday, November 5, 2011

पाकिस्तान से आया ताज़ा हवा का झोंका

पिछले कुछ हफ्तों में भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों में कई सकारात्मक बदलाव आए हैं। संयुक्त राष्ट्र से लेकर राष्ट्रमंडल और पाक.अमेरिका टकराव से लेकर एमएफएन के दर्जे तक कुछ सकारात्मक घटित हो रहा है।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

भारत और पाकिस्तान के संबंध इसी तरह से आगे बढ़ने चाहिए। दोनों देशों के बीच छह दशकों से जिस तरह के कटु और आक्रामक रिश्ते चले आए हैं, उन्हें देखते हुए पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं पर ताज्जुब होता है। अचानक ऐसा क्या हुआ कि पाकिस्तान के रुख में बदलाव, वह भी सकारात्मक, आ रहा है? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के मुद्दे पर भारत ने पाकिस्तान के हक में वोट डाला। राष्ट्रमंडल के भारतीय महासचिव कमलेश शर्मा के कायर्काल को चार साल के लिए आगे बढ़ाने के मुद्दे पर पाकिस्तान ने भारत के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। कुछ दिन पहले भारतीय थलसेना का एक हेलीकॉप्टर गलती से पाक अधिकृत कश्मीर में चला गया और वहां के सुरक्षा अधिकारियों ने कोई भी नुकसान पहुंचाए बिना उसे लौटने की इजाजत दे दी जबकि अतीत में ऐसी घटनाओं में कई सैनिकों और असैनिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। फिर 15 साल लंबे अनिश्चय के बाद पाकिस्तान ने आखिरकार भारत को सबसे तरजीही देश (एमएफएन) का दर्जा देने का फैसला किया और अब खबर है कि 26 नवंबर 2008 के मुंबई विस्फोटों की जांच के सिलसिले में बनाया गया पाकिस्तानी आयोग तफ्तीश के लिए भारत आने वाला है। पता नहीं यह सिलसिला कितने कम या ज्यादा दिनों तक चलेगा, मगर इस उपमहाद्वीप में अमन और तरक्की चाहने वाला हर इंसान यही चाहेगा कि सद्भावना और सौहार्द का यह दौर यूं ही चलता रहे।

भौगोलिक सच्चाइयों, साझी विरासत और साझे इतिहास के जरिए दोनों देश एक दूसरे से कुछ यूं जुड़े हुए हैं कि उन्हें अलग करना नामुमकिन है। लेकिन पड़ोसी होते हुए भी हम एक.दूसरे से कितने दूर हैं! बड़ा अज़ीब रिश्ता है यह। पाकिस्तानी नागरिकों से पूछिए कि वे किससे सवरधिक नफरत करते हैं तो उनका जवाब होगा- भारत। यही सवाल भारत में पूछिए तो जवाब मिलेगा- पाकिस्तान। अब हालात को जरा पलटकर देखिए। जब भी माहौल सकारात्मक रहा है, पाकिस्तानियों ने भारतीयों के लिए और हमने पाकिस्तानियों के लिए इतना प्यार दिखाया है कि समझ ही नहीं आता कि इतनी भावनात्मक निकटता के बावजूद हमारे बीच नफरतों की दीवारें भला क्यों आ खड़ी होती हैं? तेरा साथ सह न पाऊं और तेरे बिना रह न पाऊं। अच्छी बात है कि आपसी संबंधों का रोलर-कास्टर एक बार फिर अच्छे दौर से गुजर रहा है। अब भले ही एमएफएन के मुद्दे पर पाकिस्तान में अस्थायी ऊहापोह, अंतरविरोधों और घबराहट का आभास हो रहा हो, यह एक सच्चाई है जो आज नहीं तो कल अमल में आ ही जाएगी।

भारत ने कितने मौकों पर पाकिस्तान की तरफ सौहार्द, सद्भावना और दोस्ती का हाथ बढ़ाया! रक्तहीन क्रांति के जरिए सत्ता हथियाने के बाद जब जनरल परवेज मुशर्रफ को पूरी दुनिया ने दुत्कार दिया था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी सत्ता को मान्यता दी और विश्व राजनीति में उपेक्षित, राष्ट्रमंडल से निष्कासित पाकिस्तान धीरे.धीरे मुख्यधारा में लौटा। क्रिकेट की दुनिया में जब कोई देश पाकिस्तान का दौरा करने को तैयार नहीं था तब भारतीय क्रिकेट टीम ने वहां जाकर यह धारणा दूर करने का प्रयास किया कि पाकिस्तान में आतंकवाद के हालात इतने बिगड़े हुए हैं कि वहां कोई विदेशी टीम जा ही नहीं सकती। सन 1996 में डब्लूटीओ के प्रावधानों के तहत भारत ने पाकिस्तान को सबसे तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिया। लेकिन जो घटना लोगों की निगाह में ज्यादा नहीं आई वह थी ताजा अमेरिका.पाक टकराव के दौर में भारत की ओर से जारी किया गया वह आधिकारिक बयान जिसकी उम्मीद पाकिस्तान को कभी नहीं रही होगी। जब पाकिस्तान पर अमेरिकी हमले की संभावनाओं की चर्चा हो रही थी, तब भारत ने अवसरवादिता की बजाए सद्भाव दिखाया और आधिकारिक चेतावनी दी कि दक्षिण एशिया में किसी भी आक्रामक कार्रवाई का इस इलाके में शांति, स्थिरता और विकास पर गभीर असर पड़ेगा। इससे भारत भी प्रभावित होगा। इस बयान ने पाकिस्तान को कितनी राहत दी होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। संभव है, इसके बाद ही भारत के प्रति उसका नजरिया बदला हो।

एमएफएन का दर्जा

अमेरिका ने कहा है कि पाकिस्तान द्वारा भारत को एमएफएन का दर्जा दिया जाना उनके आपसी संबंधों को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए सबसे महत्वपूण्र कदमों में से एक है। उद्योग और व्यापार जगत के दिग्गजों का मानना है कि इससे दोनों ही देशों को लाभ होगा और उनका आपसी व्यापार 2॰6 अरब डालर सालाना से बढ़कर नौ अरब डालर तक पहुंच जाएगा। यह खुलेपन का दौर है, जिसमें हर देश अपनी अर्थव्यवस्था को खोल रहा है। वैश्वीकरण के युग में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता अप्रासंगिक होती जा रही है। पाकिस्तान के इंजीनियरिंग और दवा उद्योग में भारतीय उत्पादों से मिलने वाली चुनौती को लेकर चिंता जरूर है, लेकिन टेक्सटाइल्स, सीमेंट, कृषि उत्पादों, सर्जिकल उपकरणों जैसी दर्जनों चीजें भारत को निर्यात कर वहां के उद्यमी भी लाभान्वित होने वाले हैं। भारत ने संकेत दिया है कि अगर पाकिस्तान एमएफएन के मुद्दे पर ठोस कदम उठाता है तो वह पाकिस्तानी कपड़ा उद्योगों को तरजीही रियायतें दे सकता है। टेक्सटाइल्स के क्षेत्र में में पाकिस्तान एक अहम निर्यातक है। इन सबके अलावा, उसे हर साल करीब दो अरब अमेरिकी डालर की मदद उन भारतीय सामानों के सीधे आयात के कारण होगी जो फिलहाल पाक पाबंदियों के चलते दुबई के रास्ते वहां भेजे जाते हैं। भारतीय नियरतकों से मिलने वाले कर अलग हैं। इन सबसे अहम, यह कदम दोनों देशों के कारोबारी संबंधों से तनाव और संदेह के वातावरण से आजाद कर सौहार्द की ओर ले जाएगा। कारोबारियों के लिए वीजा नियमों का सरलीकरण और उदारीकरण भी होने जा रहा है। अब दोनों देशों के कारोबारी न सिर्फ ज्यादा आसानी से सीमा के इधर-उधर आ जा सकेंगे बल्कि दूसरी तरफ की कंपनियों से रिश्ते भी कायम करेंगे। वे एक दूसरे के बाजार और उद्यमिता से काफी कुछ पाएंगे। कारोबारी क्षेत्र का सौहार्द राजनीति और समाज के स्तर पर भी कुछ न कुछ असर जरूर डालेगा। वैसे ही, जैसे नागरिकों से नागरिकों के रिश्ते डालते हैं।

पाकिस्तान सरकार ने देर से ही सही एक सही, बुद्धिमत्तापूर्ण और साहसिक कदम उठाया है। उसे दुष्प्रचार अभियान चलाने वालों और मामले को भावनात्मक मुद्दों से जोड़ने वालों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। भारत के साथ कारोबारी संबंध मजबूत बनाकर श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल ने काफी लाभ उठाया है। ऐसा करने से पाकिस्तान का भी कोई नुकसान होने वाला नहीं है। जिस विशाल भारतीय बाजार पर दुनिया भर के व्यापारियों की नजर है, उस तक आसान, तरजीही पहुंच उसके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकती है, बशर्ते वह इन नए अवसरों का फायदा उठा सके। आर्थिक रूप से असमान रूप से विकसित देशों के बीच व्यापार में असंतुलन की गुंजाइश हमेशा रहती है, जैसा भारत और चीन के बीच है। अगर पाकिस्तान को व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका है तो वह जायज टैरिफ के जरिए उसे अनुशासित करने के लिए स्वतंत्र है ही।

क्या थी झिझक

भारत में जहां एमएफएन के मुद्दे को एक कारोबारी मुद्दा माना जाता है, वहीं पाकिस्तान में इसे आपसी राजनैतिक विवादों के साथ जोड़कर देखा जाता है, खासकर कश्मीर के साथ। एक के बाद एक पाकिस्तानी सरकारों ने यही रुख अपनाया कि जब तक कश्मीर समस्या हल नहीं होती, भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा नहीं दिया जाएगा, भले ही डब्लूटीओ के तहत यह अपेक्षा की जाती है कि उसका हर सदस्य राष्ट्र एक-दूसरे को एमएफएन का दर्जा देगा। वहां ऐसा माना जाता था कि आपसी संबंध सामान्य हुए तो कश्मीर का सवाल उपेक्षित हो जाएगा जिसे बड़ी कोशिशों के बाद एक भावनात्मक मुद्दे के रूप में आम पाकिस्तानी नागरिकों के मन में जिंदा रखा गया है। पाकिस्तान सरकार के फैसले के बाद आने वाली नकारात्मक प्रतिक्रियाओं में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठा है। इसे पाकिस्तान की कश्मीर नीति में नरमी के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान सरकार की इस घोषणा के बाद कि यह फैसला सेना और आईएसआई की सहमति से किया गया है, वहां के लोगों को इस तरह का असुरक्षा बोध नहीं होना चाहिए।

कुछ पाकिस्तानी उद्योग संगठनों ने कहा है कि भारत की ओर से पंद्रह साल पहले मिले एमएफएन के दर्जे का उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ है क्योंकि भारत ने बहुत सी पाकिस्तानी चीजों के आयात पर नॉन-टैरिफ बैरियर लगाए हुए हैं। इस सिलसिले में कपड़े और सीमेंट की मिसालें दी जाती हैं। हालांकि यह आरोप पूरी तरह गलत नहीं है लेकिन इसे पाकिस्तानी नजरिए के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। कोई भी देश यह नहीं चाहेगा कि दूसरा देश स्वयं उसे ऐसी सुविधा दिए बिना उसके बाजार का एकतरफा तौर पर फायदा उठाता रहे। अब जबकि पाकिस्तान ने हमें एमएफएन का दर्जा देने का फैसला कर लिया है, भारत की तरफ से खड़ी की गई रुकावटें भी धीरे-धीरे खत्म हो जानी चाहिए। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने पाकिस्तानी कपड़ा निर्यातकों को नई रियायतें देने का संकेत दिया है, जो सीमा के इस पार आसन्न मैत्रीपूण्र बदलावों की ओर संकेत करता है। कुछ हम बढ़ें, कुछ आप बढ़ो॰॰ वैश्वीकरण के दौर में दूरियां ऐसे ही खत्म होती चली जाएंगी।

Friday, October 7, 2011

अन्वेषक, आविष्कारक, उद्यमी, स्वप्नदृष्टाः अद्वितीय स्टीव जॉब्स

स्टीव जॉब्स सिर्फ सपने देखने वाले ही नहीं थे, वे सपनों को सच करके दिखाने वाले ऐसे अद्वितीय इंसान थे जिन्होंने अपनी तकनीकों, उत्पादों और विचारों के जरिए विश्व में क्रांतिकारी बदलावों को जन्म दिया।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

दुनिया की शीर्ष आईटी कंपनी एपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने कई साल तक कैंसर से लड़ने के बाद पांच अक्तूबर को इस दुनिया से विदा ले ली। महज 56 साल की उम्र में स्टीव जॉब्स का चला जाना न सिर्फ सूचना प्रौद्योगिकी जगत बल्कि पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा आघात है। वे सिर्फ सपने देखने वाले ही नहीं थे, वे सपनों को सच करके दिखाने वाले ऐसे अद्वितीय इंसान थे जिन्होंने अपनी तकनीकों, उत्पादों और विचारों के जरिए विश्व में क्रांतिकारी बदलावों को जन्म दिया। स्टीव जॉब्स सामान्य वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और तकनीशियनों से अलग थे। वे एक अन्वेषक, शोधकर्ता और आविष्कारक थे। आईटी की दुनिया में तकनीक का सृजन करने वाले तो बहुत हैं लेकिन उसे सामान्य लोगों के अनुरूप ढालने और तकनीक को खूबसूरत, प्रेजेन्टेबल रूप देने वाले बहुत कम। स्टीव जॉब्स एक बहुमुखी प्रतिभा, एक पूर्णतावादी, करिश्माई तकनीकविद् और अद्वितीय 'रचनाकर्मी' थे, तकनीक के संदर्भ में उन्हें एक पूर्ण पुरुष कहना गलत नहीं होगा।

उनके देखे 56 वसंतों के दौरान अगर यह विश्व क्रांतिकारी ढंग से बदल गया है तो इसमें खुद स्टीव जॉब्स की भूमिका कम नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहे गए ये शब्द कितने सटीक हैं कि 'स्टीव की सफलता के प्रति इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या होगी कि विश्व के एक बड़े हिस्से को उनके निधन की जानकारी उन्हीं के द्वारा आविष्कृत किसी न किसी यंत्र के जरिए मिली।' स्टीव जॉब्स, दुनिया भर में फैले हुए आपके आविष्कारों के हम करोड़ों उपयोक्ता और आपकी उद्यमिता तथा अद्वितीय मेधा के अरबों प्रशंसक आपको कभी भुला नहीं पाएंगे।

स्टीव जॉब्स का जीवन अनगिनत पहलुओं, किंवदंतियों और प्रेरक कथाओं का अद्भुत संकलन रहा है। हर मामले में वे दूसरों से अलग किंतु शीर्ष पर दिखाई दिए। चाहे वह एपल से निकलने के बाद का जीवन संघर्ष हो या फिर लंबी जद्दोजहद के बाद उसी एपल में वापसी और फिर उसे आईटी की महानतम कंपनी बनाने की उनकी सफलता। माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स के साथ उनकी लंबी प्रतिद्वंद्विता के भी दर्जनों किस्से रहे हैं। दोनों किसी समय मित्र थे किंतु बाद में अलग-अलग रास्तों पर चले गए। न सिर्फ व्यवसाय की दृष्टि से बल्कि तकनीकी दृष्टि से भी उन्होंने आईटी की दुनिया में दो अलग-अलग धुर स्थापित किए। दोनों बहुत सफल, बहुत सक्षम, विस्तीर्ण किंतु परस्पर विरोधाभास लिए हुए। कभी बिल तो कभी गेट्स, सकारात्मक प्रतिद्वंद्विता की इस प्रेरक दंतकथा के उतार-चढ़ाव तकनीकी विश्व के बाकी दिग्गजों के लिए सीखने के नए अध्याय बनते चले गए। किंतु अंततः स्टीव एक विजेता के रूप में विदा हुए। कोई डेढ़ साल पहले एपल ने माइक्रोसॉफ्ट को पछाड़कर दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनी बनने का गौरव प्राप्त किया। और इसके पीछे यदि किसी एक व्यक्ति की प्रेरणा, जिजीविषा, लगन, प्रतिभा और उद्यमिता थी, तो वे थे स्टीव जॉब्स।

स्टीव के योगदान को बिल गेट्स से बेहतर कौन आंक सकता है, जिन्होंने उनके निधन पर कहा कि 'दुनिया में किसी एक व्यक्ति द्वारा इतना जबरदस्त प्रभाव डाले जाने की मिसालें दुर्लभ ही होती हैं, जैसा कि स्टीव जॉब्स ने डाला। उनके योगदान का प्रभाव आने वाली कई पीढ़ियां भी महसूस करेंगी।'

भविष्यदृष्टा स्टीव

विलक्षण थे स्टीव जॉब्स। वे सामान्य वैज्ञानिकों, तकनीक विशषज्ञों, शोधकर्ताओं, विद्वानों, अन्वेषकों, आविष्कारकों, उद्यमियों में नहीं गिने जा सकते। वे तो यह सब कुछ थे, बल्कि उससे भी कहीं अधिक एक भविष्यदृष्टा। हर कोई उनके काम और जीवन से कितना कुछ सीख सकता है। तकनीक में वे शीर्ष पर पहुंचे, डिजाइन में उनका कोई सानी नहीं था, मार्केटिंग तथा ब्रांडिंग के दिग्गज भी उनकी रणनीतियों का विश्लेषण करने में लगे रहते थे, मैन्यूफैक्चरिंग में उनका कोई जवाब नहीं था, उत्पादों की यूजेबिलिटी पर उन्हें चुनौती देना मुश्किल था। वे आगे चलने वाले व्यक्ति थे, बाकी लोग बस उनका अनुगमन करते थे- येन महाजनो गतः सः पंथा। स्टीव इस सहस्त्राब्दि की प्रतिभाओं में गिने जाएंगे जैसे लियोनार्दो द विंची, टामस एल्वा एडीसन, डार्विन, आइंस्टीन, न्यूटन आदि हैं। खासतौर पर वे लियोनार्दो द विंची के बहुत करीब खड़े दिखते हैं, जिन्होंने विज्ञान और तकनीक ही नहीं, और भी एकाधिक क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा की चिरंजीवी छाप छोड़ी।

स्टीव ने हमेशा बड़े सपने देखे, बड़ी कल्पनाएं कीं। जब कंप्यूटिंग की दुनिया काली स्क्रीनों से जद्दोजहद करती रहती थी, वे मैकिन्टोश कंप्यूटरों के माध्यम से ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस (कंप्यूटर की चित्रात्मक मॉनीटर स्क्रीन) ले आए। जब इस मशीन के साथ हमारा संवाद कीबोर्ड तक सिमटा हुआ था तब उन्होंने माउस को लोकप्रिय बनाकर कंप्यूटिंग को काफी आसान और दोस्ताना बना दिया। कंप्यूटर के सीपीयू टावर का झंझट खत्म कर उसे मॉनीटर के भीतर ही समाहित कर दिया तो सिंगल इलेक्ट्रिक वायर कंप्यूटिंग डिवाइस पेश कर हमें तारों के जंजाल में उलझने से बचाया। वह स्टीव जॉब्स के कॅरियर का पहला दौर था। उसके बाद उन्होंने बुरे दिन भी देखे और एपल से निकाले भी गए। लेकिन जब कुछ साल बाद वे उसी कंपनी में लौटे तो नई ऊर्जा, नए जोश और नए हौंसलौं के साथ लौटे। कहीं कोई शत्रुभाव नहीं, सिर्फ सकारात्मक ऊर्जा, बड़े लक्ष्य, और कुछ क्रांतिकारी परिकल्पनाएँ जो पहले आई-पॉड (2001) और फिर आई-फोन (2007) तथा आई-पैड (2010) की अपरिमित सफलता के रूप में हमारे सामने आई। जब दुनिया कीबोर्ड और मोबाइल कीपैड से जूझ रही थी, उन्होंने हमें टच-स्क्रीन से परिचित कराया और इस असंभव सी लगने वाली टेक्नॉलॉजी को इतनी सरल, संभव और व्यावहारिक बना दिया कि हैरत हुई कि पहले किसी ने ऐसा क्यों नहीं सोचा।

एपल के उत्पाद स्टेटस सिंबल तो सदा से रहे हैं, अपने दूसरे चरण में वे लोकप्रियता का जो जबरदस्त पैमाना स्टीव जॉब्स के उत्पादों ने छुआ, वह बड़े-बड़े मार्केटिंग दिग्गजों को भी चकित करने वाला था। हर उत्पाद करोड़ों की संख्या में बिका और हर तकनीक-जागरूक, संचार-प्रेमी, मनोरंजनोत्सुक युवा का सपना बन गया। एपल से अनुपस्थिति के वर्षों में भी उन्होंने एक बहुत बड़ी एनीमेशन ग्राफिक्स कंपनी को जन्म दिया, जिसका नाम था- पिक्सर एनीमेशन। यह एक अलग ही क्षेत्र था- एनीमेशन फिल्मों का, जिसमें उनकी सफलता ने डिज्नी जैसे महारथी को भी चिंतित कर दिया था।

कभी हार नहीं मानी

स्टीव जॉब्स थे ही ऐसे। अनूठे, अलग, मनमौजी, किंतु परिणाम देने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले। भारत से उनका गहरा रिश्ता रहा। बिल गेट्स अगर स्कूल की पढ़ाई अधूरी छोड़ आए थे तो स्टीव कॉलेज की। दोनों दिग्गजों की आपसी समानताएं कई बार चौंका देती हैं। बहरहाल, स्टीव ने भारत में घूम-घूमकर मानसिक शांति की तलाश का जो उपक्रम किया, बिल के व्यक्तित्व में आध्यात्म का वह अंश मिसिंग है। इसी आध्यात्मिक गहराई ने स्टीव के व्यक्तित्व और प्रतिभा को वह गहनता दी होगी, जिसके बल पर उन्होंने न सिर्फ तकनीकी विश्व के दिग्गजों के साथ प्रतिद्वंद्विता में कभी हार नहीं मानी, बल्कि कैंसर जैसे अपराजेय प्रतिद्वंद्वी के सामने भी प्रबल आत्मबल का परिचय दिया। कैंसर के कारण पिछले कुछ वर्षों में वे समय-समय पर एपल से दूर रहे किंतु जब भी जरूरत पड़ी किसी जुझारू सैनिक की तरह मोर्चे पर लौट आए। अलबत्ता, पिछली 24 अगस्त को उन्होंने एपल के सीईओ के पद से इस्तीफा दे दिया था और अपने निधन तक कुछ समय के लिए कंपनी के चेयरमैन रहे।

स्टीव जानते थे कि उनके इलाज की अपनी सीमाएं हैं और तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें जाना होगा। किंतु उन्होंने अंतिम समय तक हार नहीं मानी और न ही अपने काम तथा उद्देश्यों से डिगे। पिछली दो मार्च को जब आईपैड-2 को लांच किया जाना था, तब स्टीव अपनी बीमारी के इलाज के लिए छुट्टी पर थे। लेकिन सबको चौंकाते हुए वे आईपैड-2 को लांच करने के लिए अवतरित हुए। इस हद तक थी अपन काम में उनकी प्रतिबद्धता। छह साल पहले एक समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था- 'इस बात का अहसास कि जल्दी ही मेरा निधन हो जाएगा, मेरे जीवन का सबसे बड़ा साधन है जो मुझे अपन जीवन में बड़े निर्णय करने के लिए प्रेरित करता है। इस अहसास ने कि तुम जल्दी ही विदा हो जाओगे, मुझे किसी भी चीज को खोने की आशंकाओं के जंजाल से मुक्त कर दिया है। तुम्हारा समय सीमित है, इसलिए इसे किसी और का जीवन जीकर व्यर्थ मत करो। सिर्फ अपनी आत्मा की आवाज पर चलो।'

यही आध्यात्मिक और आत्मिक गहराई स्टीव जॉब्स को वह ऊंचाई देती है, जिसका पर्याय उनका आदर्श जीवन बना। स्टीवन पॉल जॉब्स, अपनी कल्पनाओं, हौंसलों प्रेरणाओं और लक्ष्यों में हम आपका अक्स देख सकते हैं। कम लोग होते हैं जो दुनिया पर वैसी अमिट छाप छोड़कर जाते हैं, जैसी आपने छोड़ी।

Saturday, October 1, 2011

छोटे से टैबलेट ने मारा बड़ा मैदान!

स्वागत कीजिए भारतीय उद्यमिता और मेधा का जिसने एक राष्ट्रीय संकल्प को संभव कर दिखाया। पांच सौ न सही, 1700 रुपए में ही सही, हमने दुनिया का सबसे सस्ता टैबलेट कंप्यूटर बना डाला है।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कुछ महीने पहले जब दुनिया का सबसे सस्ता टैबलेट कंप्यूटर विकसित किए जाने की घोषणा की थी तो बाकी दुनिया की तो छोङ़िए, खुद भारत में भी इस खबर को सही भावना से नहीं लिया गया था। क्या मीडिया, क्या तकनीक विशेषज्ञ और क्या आम लोग, किसी को यकीन नहीं हुआ था कि महज एक 500 रुपए में कोई लैपटॉप विकसित कर बेचा जा सकता है, और वह भी भारत में! हम सबने सरकार की नासमझी पर अफसोस जताया, संभावित टैबलेट की क्षमताओं पर गंभीर सवाल उठाए और ऐसी धारणा पैदा की जैसे सरकार कंप्यूटर के नाम पर लॉलीपॉप थमाने जा रही है। आखिरकार सामान्य समझ के हिसाब से यह संभव ही कहां है? पश्चिमी देशों में 100 डॉलर के बजट में बच्चों को लैपटॉप मुहैया कराने वाली 'एक लैपटॉप प्रति बालक' परियोजना के लिए यूएनडीपी और दूसरे संगठनों ने दिल खोलकर आर्थिक मदद दी है। लेकिन फिर भी उसके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। तब भारत जैसा देश, किसी बड़ी आर्थिक मदद के बिना, सिर्फ पांच सौ रुपए (करीब दस डॉलर) में ऐसा कारनामा कर दिखाए, उस पर यकीन कर पाना असंभव ही तो था। लेकिन स्वागत कीजिए भारतीय उद्यमिता और मेधा का जिसने ऐसा संभव कर दिखाया। पांच सौ न सही, 1700 रुपए में ही सही, हमने दुनिया का सबसे सस्ता टैबलेट कंप्यूटर बना डाला है और पिछले दिनों श्री सिब्बल ने उसका सावर्जनिक रूप से प्रदर्शन भी किया है। कौन जाने आज नहीं तो कल, बड़े पैमाने पर उत्पादन होने की स्थिति में इसके दाम पांच सौ रुपए पर ही आ जाएं!

हम दुनिया में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी माने जाते हैं, लेकिन दो दशक लंबे फर्राटे के बावजूद हमने इस क्षेत्र की अथाह संभावनाओं का छोटा सा रास्ता तय किया है। अगर हमें अपनी तकनीकी मेधा के बल पर देश के सुखद आर्थिक भविष्य की इमारत खड़ी करनी है तो देश के कोने.कोने में सूचना प्रौद्योगिकी के हक में एक रचनात्मक, शैक्षिक आंदोलन शुरू करने की जरूरत है। गांव-गांव, कस्बे-कस्बे, शहर-शहर में आईटी का प्रसार करना है, कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स आदि तकनीकों से लैस युवकों की विशाल जनसंख्या खड़ी करनी है। आज के हालात में यह संभव नहीं है क्योंकि भले ही हम हर साल 78 अरब डालर की आईटी सेवाओं का नियरत करते हों, देश में कंप्यूटर साक्षरता का स्तर बेहद कम है। शायद 'दिया तले अंधेरा' इसी का नाम है। भारत सरकार की तरफ से लांच किया जाने वाला यह छोटा सा टैबलेट (ऐसा गैजेट जिसमें स्क्रीन आधारित कीबोर्ड इस्तेमाल होता है) उस लिहाज से बड़ी उम्मीद जगाता है। सत्रह सौ का यह टैबलेट बुनियादी रूप से शिक्षा के क्षेत्र में इस्तेमाल होगा और हमारे बच्चों को तकनीकी अवधारणाओं के करीब लाएगा। देश में प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा 40 हजार रुपए से ऊपर पहुंच चुका है सो सामान्य नागरिक इतना खर्चा उठाने में सक्षम माना जा सकता है। यदि वह भी संभव न हो तो सरकार 50 फीसदी सब्सिडी भी दे रही है। सोने में सुहागा।

पिछले सात साल से इस परियोजना पर काम चल रहा था। एक दशक पहले हमारे यहां एक और देसी कंप्यूटर 'सिम्प्यूटर' के चर्चे हुआ करते थे। वह भी एक महत्वाकांक्षी परियोजना थी, हालांकि तब फोकस शिक्षा पर उतना नहीं था। आम लोगों के हाथ में एक सस्ती, सीधी-सादी कंप्यूटिंग डिवाइस सौंपना उसका मकसद था। नाम भी उसी के अनुकूल था- सिम्प्यूटर, यानी सिम्पल कंप्यूटर। बहुत सालों के अनुसंधान और विकास के बाद आखिरकार 2004 में सिम्प्यूटर देखने को मिला तो सबको निराशा हुई। यह किसी गेमिंग गैजेट जैसे चार बटनों वाली हैंडहेल्ड डिवाइस थी, जिसे एक स्टाइलस (स्टिक) के साथ पेश किया गया था। शायद सिम्प्यूटर के निर्माताओं को आर्थिक सहयोग मिला होता तो वे सात साल की इस अवधि में उसे काफी आगे बढ़ा चुके होते। हालात और कारण जो भी रहे हों, करोड़ों हिंदुस्तानियों की तकनीकी उम्मीदें धूमिल करते हुए 'सिम्प्यूटर' न जाने कहां खो गया। बहरहाल, फख़्र की बात है कि एक दूसरे जरिए से ही सही, सरकारी तथा निजी भागीदारी में तैयार हुआ भारत का अपना टैबलेट कंप्यूटर तैयार है। इसमें अहम भूमिका निभाई है इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी और इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ साइंस ने।

सुखद आश्चर्य

जहां तक कन्फीगरेशन का सवाल है, यह आश्चयर्जनक रूप से ठीकठाक दिखाई देता है। दो गीगाबाइट रैम, 32 जीबी हार्ड डिस्क, वाई.फाई, यूएसबी पोर्ट, ऑन स्क्रीन कीबोर्ड, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा, मल्टीमीडिया क्षमताओं और इंटरनेट कनेक्टिविटी से लैस यह डिवाइस महज दिखावटी चीज नहीं है। हार्ड डिस्क की क्षमता को यूएसबी पोर्ट के जरिए अलग से बड़ी हार्ड डिस्क लगाकर बढ़ाया जा सकता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग एक अहम फीचर है जो बच्चों को सामूहिक रूप से इंटरनेट के जरिए शिक्षा देना संभव बनाएगा। हालांकि यह गूगल के एन्ड्रोइड ऑपरेटिंग सिस्टम पर आधारित है फिर भी इतने कम दामों में इतनी सारी चीजें समाहित करना कोई आसान काम नहीं है। अगर इस परियोजना के संचालक देश भर से उभरने वाली अथाह मांग को पूरा कर पाते हैं और यह परियोजना जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू की जाती है तो आने वाले वर्षों में कंप्यूटर शिक्षा और साक्षरता दोनों ही मोर्चों पर बड़ी उपलब्धियां अर्जित की जा सकती हैं। हमने एक बड़ी चुनौती फतेह जो कर ली है।

बहरहाल, खुशी के इस माहौल में यह गलतफहमी नहीं पाली जानी चाहिए कि कंप्यूटर-साक्षरता और शैक्षणिक-साक्षरता की चुनौतियां अब खात्मे के करीब हैं। इन मोर्चों पर हमारी समस्याएं और भी हैं। गांवों में बिजली और इंटरनेट ब्राडबैंड कनेक्टिविटी के प्रसार की चुनौती बरकरार है। नया टैबलेट सौर ऊर्जा से भी चलाया जा सकता है, जो एक बड़ी राहत की बात है। लेकिन वह एक अस्थायी राहत ही है, कम से कम शैक्षणिक संस्थानों को निर्बाध बिजली सप्लाई सुनिश्चित करने पर ही स्थायी हल निकलेगा। जहां तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी का सवाल है, वह आज भी सिर्फ 6॰9 फीसदी भारतीयों (2010 का आंकड़ा) तक पहुंची है। हां, तीन साल में देश की हर ग्राम पंचायत को इंटरनेट से जोड़ने की केंद्रीय परियोजना के लागू होने से हालात जरूर बेहतर होंगे। कंप्यूटर को भारतीय भाषाओं से लैस करना और बच्चों को अपनी मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा देना भी कंप्यूटर साक्षरता के मिशन को सफल बनाने में अहम योगदान दे सकता है। लेकिन दुर्भाग्य से वह सरकार की प्राथमिकताओं में दिखाई नहीं देता। लेकिन इन चुनौतियों का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया का सबसे सस्ता टैबलेट कंप्यूटर बनाने की हमारी उपलब्धि का महत्व किसी भी लिहाज से कम है।

हमने भी दिखाई क्षमता

इस संदर्भ में एक और कोण पर चर्चा करनी जरूरी है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की बढ़त सॉफ्टवेयरों और सेवाओं के मामले में है, हार्डवेयर के मामले में हम पिछड़े हुए हैं। एचसीएल और विप्रो को छोड़कर बहुत कम भारतीय कंपनियों ने हार्डवेयर निर्माण में कोई छाप छोड़ी है। लेकिन मैन्यूफैक्चरिंग में दबदबा बनाए बिना हम कभी भी समग्र सूचना प्रौद्योगिकी में बड़ी वैश्विक ताकत नहीं बन सकते। मौजूदा हालात में हम सॉफ्टवेयर, सेवाओं और मानव संसाधन संबंधी ताकत ही बने रहेंगे, जिसमें हमें चीन तथा ब्राजील से लेकर रूस, फिलीपींस, इंडोनेशिया और पाकिस्तान तक से चुनौती मिल रही है। अपनी लीडरशिप को स्थायी बनाने के लिए हमें हार्डवेयर मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में कदम बढ़ाने होंगे। अमेरिका, जापान, चीन और ताईवान जैसे देश हार्डवेयर के क्षेत्र में वैश्विक मांग पूरी करने में जुटे हैं। उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर इसका प्रभाव साफ दिखाई देता है। इस संदर्भ में माइक्रोसॉफ्ट और एपल का उदाहरण काबिले गौर है। माइक्रोसॉफ्ट सॉफ्टवेयर क्षेत्र की शक्ति है और लंबे समय से सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की नंबर वन कंपनी बनी रही है। लेकिन अपने हार्डवेयर उत्पादों- आईपॉड, आईफोन और आईपैड की अपार सफलता के बाद एपल ने उसे पछाड़ दिया है। कारण? सॉफ्टवेयर के मामले में आम आदमी की जरूरत सीमित है, जबकि हार्डवेयर का बाजार ज्यादा बड़ा है।

इस लिहाज से स्वदेशी टैबलेट कंप्यूटर का निर्माण बहुत महत्वपूर्ण है। यह हमारी क्षमताओं की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। इस कामयाबी के बाद हमें आईटी मैन्यूफैक्चरिंग को असंभव क्षेत्र समझने की जरूरत नहीं है। कम से कम अब सरकार को चाहिए कि वह देसी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर से लैस पूर्ण उत्पादों के विकास और निर्माण को प्रोत्साहित करे। आखिरकार हमारे पास टैबलेट कंप्यूटर के रूप में एक कामयाब उत्पाद मौजूद है। इसने भारतीय नवाचार (इनोवेशन), तकनीकी मेधा और व्यावसायिक प्रतिभा को एक बार फिर दुनिया की नजरों में ला दिया है। आइए अपने उन सुयोग्य इंजीनियरों, विशेषज्ञों और तकनीशियनों का अभिनंदन करें जिन्होंने इस देश को एक और महत्वपूर्ण मोर्चे पर सफल बनाया है। यह हमारे राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक है।

Saturday, September 24, 2011

'दोस्त' ही यदि ऐसा हो तो दुश्मनों की क्या जरूरत!

अफगानिस्तान में अपने दूतावास और नाटो मुख्यालय पर हुए हमले के बाद अमेरिका को अहसास हो रहा है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में उसका प्रमुख 'सहयोगी' ही उसकी सबसे बड़ी समस्या है।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

-पिछले दिनों अफगानिस्तान में नाटो मुख्यालय और फिर अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस ने कुख्यात हक्कानी नेटवर्क को प्रेरित किया और इन्हें अंजाम देने में उसकी मदद की।

-काबुल में अमेरिकी दूतावास पर हमला करने वाला हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का परोक्ष नेटवर्क है।

-हिंसक अतिवाद (परोक्षत: आतंकवाद) को नीतिगत माध्यम के रूप में इस्तेमाल करके पाकिस्तान सरकार, खासकर पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई, अमेरिका के साथ अपने सामरिक संबंधों को तो नुकसान पहुंचा ही रही हैं, असरदार क्षेत्रीय प्रभाव वाले सम्मानित राष्ट्र के रूप में देखे जाने का अवसर भी खो रही हैं।

अगर ऊपरी बयानों में अमेरिकी दूतावास की जगह पर भारतीय दूतावास और अमेरिका के स्थान पर भारत करके पढ़ा जाए तो ये पूरी तरह भारतीय नेताओं, अधिकारियों और राजनयिकों के बयान प्रतीत होंगे। लेकिन ये अमेरिकी सरकार के दिग्गजों के बयान हैं। पहला बयान जहां अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान के अधिकारियों का है, वहीं बाकी दो बयान अमेरिकी संयुक्त सेना प्रमुख एडमिरल माइक मुलेन के हैं। लगे हाथ अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के बयान पर भी नजर डाली जा सकती है जिन्होंने कहा है कि अमेरिका आतंकवाद के सामने झुकने वाला नहीं है और अफगानिस्तान में उसकी मुहिम जारी रहेगी।

इसी महीने हुई आतंकवादी घटनाओं के सिलसिले में अमेरिकी सरजमीन से लगभग वैसे ही बयान आ रहे हैं जैसे आतंकवाद से पारंपरिक रूप से पीङ़ित भारत पिछले कई वषर्ों से देता आ रहा है। माइक मुलेन के बयान ने तीन साल पहले काबुल में ही भारतीय दूतावास पर हुए आतंकवादी हमले की याद ताजा कर दी है जब भारत ने ठीक इसी तरह का आरोप लगाया था। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान भी भारत ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका को बताया था कि हमले के पल.पल की खबर पाकिस्तानी फौजी और खुफिया अधिकारियों को थी और उसकी निगरानी आईएसआई से जुड़े हैंडलर्स ने की थी। भारत आतंकवाद के जिस दंश को दशकों से झेलता आया है, उसकी चपेट में अमेरिका हाल ही में आने लगा है। भारत के जिन आरोपों को उसने लगभग नजरंदाज करते हुए पाकिस्तानी गतिविधियों की ओर आंख मूंदे रखी उन्हें आज वह खुद ही दोहराने को मजबूर है। सच है, जाके पांव ने फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई।

सरकारी नीति बना आतंकवाद

जिस अमेरिकी बयान को सबसे महत्वपूण्र माना जाएगा, वह है नीतिगत उपकरण के रूप में हिंसक अतिवाद का प्रयोग। लेकिन इस अहसास तक पहुंचने में अमेरिका को पूरे ग्यारह साल लग गए हैं। याद कीजिए, पूवर् प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सितंबर 2000 की अमेरिका यात्रा जब अमेरिकी कांग्रेस की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था. 'भारत और अमेरिका को आतंकवाद की त्रासदी से निपटने के प्रयास द्विगुणित कर देने चाहिए क्योंकि पाकिस्तान आतंकवाद का इस्तेमाल सरकारी नीति को लागू करने के उपकरण के रूप में कर रहा है।' उन्होंने पिछले दो दशकों के भारत के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा था कि पाकिस्तान धार्मिक जेहाद को राष्ट्रीय नीति का माध्यम बना रहा है। लेकिन वह जमाना और था। तब तक अमेरिका ने दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी हमले का सामना नहीं किया था, वह तो श्री वाजपेयी के भाषण के एक साल बाद ग्यारह सितंबर 2001 को हुआ, जिसमें दुनिया ने सबसे बड़ी शक्ति को आंतकवादी विध्वंस की गंभीरता का अहसास कराया।

श्री वाजपेयी ही क्यों, उनसे पहले और उनके बाद की हर सरकार ने पिछले तीन दशकों के दौरान अमेरिका की हर सरकार का ध्यान इस बात की ओर खींचा है कि भारत में आतंकवादी गतिविधियों में लगे तत्वों को पाकिस्तान का नैतिक, आर्िथक, सामरिक, खुफिया और हथियार संबंधी समर्थन हासिल है। हमारे विरुद्ध होने वाले कितने ही हमलों की भूमिका खुद आईएसआई बनाती आई है और कश्मीर में 'प्रच्छन्न युद्ध' की पाकिस्तानी नीति तो जनरल जिया उल हक के जमाने से ही उसकी सामरिक नीति का एक महत्वपूण्र हिस्सा है, जिन्होंने फिलस्तीन की तर्ज पर भारत को सबक सिखाने के लिए यह रास्ता चुना था। तब पाकिस्तान अमेरिका के ज्यादा करीब था और एक लोकतांत्रिक शक्ति होते हुए भी भारत अमेरिका को रास नहीं आता था। ग्यारह सितंबर को अगर अमेरिका ने आतंकवाद का सामना न किया होता तो आज भी भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और आसपास के इलाकों के घटनाक्रम पर अमेरिकी
कार्रवाइयां महज विदेश मंत्रालय के बयानों तक ही सीमित रहतीं।

एक के बाद एक रहस्योद्घाटन

ग्यारह सितंबर के हमले के तुरंत बाद जब भारत को लगा कि अमेरिका वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई करने के प्रति गंभीर है तो उसने अलकायदा, तालिबान और दूसरे आतंकवादियों के बारे में महत्वपूण्र खुफिया जानकारियां उसे सौंपी थीं। इन जानकारियों में पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्रों का ब्यौरा भी था और अफगानिस्तान के दूर.दराज क्षेत्रों की आतंकवादी गतिविधियों की जानकारी भी। लेकिन अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने सामरिक समीकरणों के चलते आतंकवाद के उद्भव तथा आश्रय स्थल के रूप में पाकिस्तान की भूमिका को पूरी तरह नजरंदाज कर दिया। ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तानी सरजमीन पर, पाकिस्तानी फौज की नाक के नीचे, मारे जाने और डेविड कोलमैन हैडली तथा फैसल शहजाद की पृष्ठभूमि साफ होने, और अब अफगानिस्तान के हमलों के बाद अमेरिका को स्पष्ट हुआ है कि दुनिया भर में चलने वाला आतंकवाद के चक्र की धुरी तो खुद पाकिस्तान में ही है। ओसामा की मौत, तालिबान के शीर्ष नेतृत्व की पाकिस्तानी सरजमीन पर मौजूद होने की पुष्टि और अब ओसामा के नायब अयमान अल जवाहिरी की मौजूदगी का खुलासा हो ही चुका है। दोस्त अगर ऐसा हो तो दुश्मनों की क्या जरूरत!

लेकिन लगता है कि अमेरिका को देर से ही सही, अब अहसास हो रहा है कि भारत सही था, पाकिस्तान और खुद अमेरिका गलत। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में उसका प्रमुख 'सहयोगी' ही उसकी सबसे बड़ी समस्या है। अफगानिस्तान में पहले तालिबान और अब हक्कानी नेटवर्क को पनपाने में उसकी जो भूमिका है, ठीक वही भूमिका भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों. लश्करे तैयबा, हिज्बुल मुजाहिदीन और जैशे मोहम्मद को पल्लवित करने में रही है। ये सभी आतंकवादी संगठन जिन तीन देशों को अपने सबसे बड़े दुश्मन मानते हैं उनमें अमेरिका, भारत और इजराइल सबसे ऊपर हैं। याद कीजिए कुछ समय पहले पाकिस्तानी तालिबान की तरफ से आया वह बयान जिसमें उसने कहा था कि अगर भारत पाकिस्तान के विरुद्ध कार्रवाई करता है तो तालिबान आतंकवादी पाकिस्तानी फौजों के साथ कदम से कदम मिलाकर भारत पर हमला करेंगे। जनरल मुशर्रफ के जमाने में कारगिल पर हुई कार्रवाई में आतंकवादियों और पाकिस्तानी फौजियों ने एक टीम के रूप में मिलकर काम किया था, इसे अब दूसरे तो क्या खुद पाकिस्तान भी स्वीकार करता है।

यह सब जानने के बाद भी यदि अमेरिका आतंकवाद से लड़ाई के मामले में भारत के साथ दूरी बरतने और पाकिस्तान के साथ दोस्ती बनाए रखने की गलती करता है तो इसमें सिर्फ हमारा नुकसान नहीं है। अब उसे अहसास हो जाना चाहिए कि आतंकवाद के विरुद्ध सभ्य विश्व की लड़ाई में भारत और अमेरिका अलग.अलग छोर पर खड़े नहीं रह सकते। दक्षिण एशिया से संबंधित उसकी रणनीति और समीकरणों में भारत का स्थान अहम होना चाहिए। दोनों को एक.दूसरे के अनुभव, शक्ति और रणनीतिक सहयोग की जरूरत है।

Saturday, September 17, 2011

क्या ब्याज दरें बढ़ाने के सिवा महंगाई का कोई इलाज नहीं है?

मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। भले ही आर्थिक तरक्की का लाभ आम नागरिकों तक किसी न किसी रूप में पहुंच रहा हो, आर्थिक आघात झेलने की उनकी क्षमता का आखिर कोई तो अंत है!

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

रिजर्व बैंक से आई ब्याज दरें बढ़ाने की खबर पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने जिस अंदाज में टिप्पणी की, वह आम आदमी की चिंताओं के प्रति सरकारी प्रतिष्ठान के उपेक्षाभाव को ही प्रकट नहीं करती, यह भी दिखाती है कि हमारा सत्ता तंत्र जमीनी हकीकतों से किस कदर कट गया है। श्री अहलुवालिया ने रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में की गई बढ़ोत्तरी को 'गुड न्यूज़' करार दिया था। बढ़ती ब्याज दरों और महंगाई का दंश झेल रहे गरीब और मध्यवर्गीय समुदाय के लिए इससे बड़ा मजाक और कोई नहीं हो सकता। मान ा कि रिजर्व बैंक की पहली चिंता मुद्रास्फीति है, माना कि रिजर्व बैंक के गवर्नर दुव्वुरी सुब्बाराव की एक निर्मम अर्थशास्त्री तथा कुशल प्रशासक की छवि है और इसीलिए पिछले दिनों उन्हें एक्सटेंशन भी मिला है, लेकिन पिछले अठारह महीनों में बारहवीं बार जनता को कड़वी घुट्टी पिलाने से पहले उन्हें थोड़ा संवेदनशील होकर सोचने की जरूरत थी। मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। दूसरे, भले ही आर्थिक तरक्की का लाभ आम नागरिकों तक किसी न किसी रूप में पहुंच रहा हो, इस तरह के प्रत्यक्ष आर्थिक आघात झेलने की उनकी क्षमता का आखिर कोई तो अंत है! दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था सिर्फ 25 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोत्तरी से हिल जाती है और यहां प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 129वें नंबर पर आने वाले हम भारतीय पिछले डेढ़ साल में साढ़े तीन फीसदी बढ़ोत्तरी झेल चुके हैं। अब तो बस कीजिए!

जिसे श्री अहलुवालिया ने 'गुड न्यूज़' करार दिया, वह हर कर्जदार व्यक्ति को व्याकुल करने वाली खबर है। कर्जदार ही क्यों, परोक्ष रूप से किसी न किसी रूप में हर व्यक्ति को प्रभावित करेगी क्योंकि इसका सबसे बड़ा असर आर्थिक, व्यावसाियक, कारोबारी तथा औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ेगा। हालांकि अब आम आदमी यह मानकर चलने लगा है कि रिजर्व बैंक जब भी मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा, उसके लिए एक 'गुड न्यूज़' जरूर पेश करेगा, लेकिन इस बार की 'गुड न्यूज़' ने कुछ ज्यादा ही झटका दिया है क्योंकि यह मौजूदा आर्थिक धारणा (सेन्टीमेंट) के अनुकूल नहीं है। रैपो रेट को सवा आठ और रिवर्स रैपो को सवा सात फीसदी पर ले जाने की रिजर्व बैंक की घोषणा पर उद्योग तथा व्यापारिक संगठनों ने जिस तरह निराशाजनक प्रतिक्रिया की है, वैसा हमारी उदारीकृत, पूंजीवाद.उन्मुख, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में अरसे बाद देखने को मिला है। कारण, क्या उद्योगपति, क्या सेवा प्रदाता, क्या व्यापारी, क्या जमीन.जायदाद कारोबारी, क्या वाहन कंपनियां, क्या उपभोक्ता सामग्री निर्माता और क्या उन सबका उपभोक्ता॰॰॰ रिजर्व बैंक के पिछले फैसले पहले ही सबकी कमर तोड़ चुके हैं। निराशा की यह देशव्यापी धारणा सरकार से पूरी तरह छिपी नहीं रह सकती। मौद्रिक समीक्षा से ठीक पहले वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का यह कथन कि शायद अब और ब्याज दरें बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी तथा हम मुद्रास्फीति को दूसरे तरीकों से काबू करने की कोशिश करेंगे, उसकी ओर इशारा करता है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि भई अंतिम फैसला तो रिजर्व बैंक को ही करना है। सरकार बड़ी सफाई से दोष रिजर्व बैंक के सिर मढ़कर बच निकलती है। लेकिन क्या रिजर्व बैंक ये सभी कदम एकतरफा तौर पर उठा रहा है?

यह करें तो उलझन, वह करें तो समस्या

सरकार की उलझनें समझ में आती हैं। रिजर्व बैंक हर बार ब्याज दर बढ़ाने की घोषणा करते हुए इन चिंताओं को दोहराता भी है। उसकी सबसे बड़ी चिंता है मुद्रास्फीति। यह महज एक आर्थिक समस्या ही नहीं है, राजनैतिक और सामाजिक भी है। महंगाई के कारण लोगों में धीरे.धीरे सरकार विरोधी भावना पैदा हो रही है। समस्या यह है कि महंगाई रोकने के लिए मौद्रिक कदम उठाए जाएं तो आवासीय तथा वाहन ऋण लेने वाले लोग, कारोबारी तथा उद्यमी उबल पड़ते हैं और ब्याज दरें स्थिर रखी जाएं या घटा दी जाएं तो महंगाई सिर उठाने लगती है जिससे आम आदमी का गुस्सा आसमान छूने लगता है। विपक्ष की भारी आलोचना और जन आक्रोश के बावजूद अगर सरकार ब्याज दरें बढ़ाती जा रही है तो इसलिए कि वह महंगाई के भूत को किसी भी तरह काबू कर लेना चाहती है। यहां तक कि राजनैतिक जोखिम उठाकर भी। मगर यह भूत है कि काबू में आता ही नहीं। मुद्रास्फीति से सरकार कितनी भयभीत है, यह उसकी इस नीति से स्पष्ट है कि अगर रिजर्व बैंक के कदमों से आर्थिक विकास (जीडीपी) की वृद्धि दर थोड़ी.बहुत घटती भी है तो देखा जाएगा लेकिन सबसे पहले महंगाई पर लगाम लगाना जरूरी है। इसे सरकार का दुभ्राग्य कहें या फिर 'अल्पदृष्टि' पर आधारित उपायों की सीमा, कि एक के बाद एक कठोर कदम उठाने के बावजूद मुद्रास्फीति नौ फीसदी के आसपास बरकरार है। वह खतरे के निशान से नीचे आने का नाम नहीं ले रही। दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था में धीमापन आना शुरू हो गया है।

ऐसे में रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय, और कारोबार, सेवा, उद्योग, परिवहन, आयात.नियरत, वाणिज्य, कर, पेट्रोलियम आदि का जिम्मा संभालने वाले दूसरे मंत्रालय और विभाग वैकल्पिक रास्तों की तलाश में क्यों नहीं जुटते? डेढ़ साल से अर्थव्यवस्था को बढ़ी ब्याज दरों का इन्जेक्शन लगाने के बावजूद यदि बीमार की हालत ठीक नहीं हो रही तो शायद उसे होम्योपैथी या आयुवेर्द की जरूरत हो? क्या 'ब्याज दर' कोई संजीवनी बूटी है जिसके अतिरिक्त और कोई उपाय किया ही नहीं जा सकता? ऐसा नहीं है। महंगाई को प्रभावित करने वाले पहलू और भी हैं, जिन पर या तो सरकार का ध्यान जाता नहीं या फिर उसके पास इन्हें अनुशासित करने की इच्छाशक्ति नहीं है।

विकल्पों को भी देखिए

मुद्रास्फीति की समस्या को सिर्फ रिजर्व बैंक के हवाले कर देने की बजाए अगर उसमें केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों की भी भूमिका हो तो विकल्प और भी कई निकल सकते हैं। आवासीय क्षेत्र में मांग घटानी है तो परियोजनाओं की संख्या सीमित की जा सकती है। दैनिक उपयोग की चीजों की कीमतें बढ़ने के पीछे काफी हद तक पेट्रोलियम पदाथर्ों की बढ़ी हुई कीमतें जिम्मेदार हैं। अगर सरकार कुछ और समय तक पेट्रोलियम क्षेत्र में सब्सिडी के संदभ्र में नरमी बरतती रहे तो महंगाई प्रभावित हो सकती है। लेकिन सरकार ने तो ब्याज दरों के साथ.साथ पेट्रोलियम पदाथर्ों की कीमतें भी बढ़ाई हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की नीतिगत मजबूरी समझ में आती है, पेट्रोलियम सप्लाई कंपनियों को होने वाले घाटे संबंधी चिंताएं भी जायज हैं, लेकिन अगर महंगाई पर काबू पाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है तो पेट्रोलियम के भावों और सब्सिडी के मुद्दे पर 'गो स्लो' की नीति अपनाई जा सकती है। मजबूरी में ही सही। अस्थायी रूप से ही सही।

भारत में यकायक पैदा हुई महंगाई को कई अर्थशास्त्री वायदा कारोबार के प्रतिफल के रूप में भी देखते हैं। गेहूं, चावल, दालों आदि के वायदा भावों में तेजी राष्ट्रीय स्तर पर इन पदाथर्ों के भावों को प्रभावित करने लगी है। सोने.चांदी की भी यही स्थिति है। आप भले ही ब्याज दरें बढ़ाते रहिए, वायदा कारोबारी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए जरूरी चीजों के भावों को बढ़ाने में लगे रहेंगे तो ब्याज दरें भला क्या करेंगी। वायदा कारोबार के प्रभावी नियमन की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए। बहुत जल्द, रिटेल बाजार में विदेशी कंपनियों का आगमन भी भावों को प्रभावित कर सकता है। आशंका है कि वे बड़े पैमाने पर सामग्री खरीदेंगी और बाजार में कृत्रिम तेजी पैदा करेंगी। बाजार का खुलना, नए क्षेत्रों में अवसरों का सामने आना, वैश्वीकरण आदि सब कुछ ठीक है, लेकिन सीमा के भीतर ही। भारत की प्रति व्यक्ति आय आज भी चालीस हजार रुपए के आसपास है। यह अमेरिका या यूरोप नहीं है, जहां ब्रांडिंग, पैकेजिंग, प्रचार और ग्लैमर भावों से ज्यादा महत्वपूण्र हो जाते हैं। हमसे चालीस गुना प्रति व्यक्ति आय से लैस वहां का उपभोक्ता बढ़ी.चढ़ी कीमतों का असर झेल सकता है, इसलिए वहां ये फार्मूले चल सकते हैं, यहां नहीं।

देश में सब्जियों, फलों आदि की सप्लाई.चेन व्यवस्था को बेहतर बनाए जाने की जरूरत है। देश के एक हिस्से में कोई खास अनाज, फल या सब्जी बहुत सस्ती होती है और दूसरे हिस्से में बहुत महंगी। समस्या त्वरित परिवहन और भंडारण से जुड़ी हो सकती है। जमाखोरी और कालाबाजारी महंगाई को बढ़ाने वाले पारंपरिक कारक हैं। इमरजेंसी के दौरान महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए इन्हें खास तौर पर निशाना बनाया गया था और इसके नतीजे भी निकले थे। ऐसा फिर क्यों नहीं किया जा सकता? भारत में सावर्जनिक वितरण प्रणाली एक तरह का वरदान है। गांव.गांव में फैला हुए इसके नेटवर्क को मजबूत, परिणामोन्मुख और भ्रष्टाचार.कालाबाजारी से मुक्त बनाया जा सके तो क्या कुछ नहीं हो सकता। लेकिन यह सब रिजर्व बैंक के उठाए पारंपरिक कदमों से नहीं होने वाला। कमान केंद्र सरकार को ही संभालनी होगी।

Saturday, September 10, 2011

आडवाणी वही कर रहे हैं जो विपक्ष को करना चाहिए

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संसद में हंगामा करने और कुछेक प्रदर्शनों के अलावा भाजपा जमीनी स्तर पर बड़ी राष्ट्रीय मुहिम छेड़ने में कामयाब नहीं रही है। श्री आडवाणी की रथयात्रा उस खोए हुए मौके को वापस लाने का एक बेताब प्रयास मानी जा सकती है, बशतेर् इसे एक व्यक्तिगत यात्रा के रूप में नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी की यात्रा के रूप में पेश किया जाए।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा संबंधी घोषणा को लेकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भले ही भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी समीकरणों के लिहाज से उनकी यात्रा का समय अनुकूल प्रतीत न हो, विपक्ष के लिहाज से देखा जाए तो उन्होंने सही समय पर सही फैसला किया है। पिछले एक साल से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी और दूसरे विपक्षी दल संसद के भीतर.बाहर सरकार पर दबाव बनाने में जुटे हुए हैं। संसद के पिछले दो सत्र भारी हंगामे की भेंट चढ़े, विधायी कायर् का भारी नुकसान हुआ, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों में करीब.करीब किनारे कर दिया गया विपक्ष कुछ हद तक अपने अस्तित्व का अहसास कराने में सफल रहा। सरकार पर तब से शुरू हुआ दबाव अभी बरकरार है, खासकर 2जी कांड की जांच में सुप्रीम कोर्ट की पहल और फिर अन्ना हजारे तथा बाबा रामदेव द्वारा चलाए गए आंदोलनों की बदौलत। लोकतंत्र में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका सरकार पर दबाव बनाए रखने और उसे सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करते रहने की ही होती है। इसके अपने राजनैतिक लाभ भी हैं, खासकर तब जब कुछ प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हों। स्वाभाविक ही है कि केंद्र और अनेक राज्यों में कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी के रूप में भारतीय जनता पार्टी मौजूदा हालात का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाना चाहेगी। श्री आडवाणी की रथ यात्रा उस लिहाज से बहुत अस्वाभाविक नहीं है।

हालांकि यह रथ यात्रा सिर्फ सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के लिए ही समस्याएं पैदा नहीं करेगी। प्रभावित होने वाले पक्ष और भी हैं और उनका नजरिया भी असाानी से समझा जा सकता है। जन लोकपाल विधेयक, 2जी घोटाले, राष्ट्रमंडल खेल घोटाले और काले धन के मुद्दों पर रक्षात्मक स्थिति में आई केंद्र सरकार को फिलहाल किसी तरह की राहत नहीं मिलने वाली। श्री आडवाणी की यात्रा उसके विरुद्ध लोगों की भावनाओं को और प्रबल बनाएगी। लेकिन इस यात्रा से सबसे ज्यादा चिंता खुद भारतीय जनता पार्टी के भीतर हो रही है जिसने अपने इस वरिष्ठ नेता को करीब.करीब चुका हुआ ही मान लिया था। अपने नेतृत्व में पिछले आम चुनाव में हुई भारी पराजय और उससे पहल भारत.अमेरिका परमाणु संधि के मुद्दे पर संसद में हुए अविश्वास प्रस्ताव में मनमोहन सरकार की जीत ने श्री आडवाणी को राजनैतिक रूप से काफी कमजोर बना दिया था। लेकिन लगभग छह दशक के राजनैतिक अनुभव वाले व्यक्ति को, और वह भी ऐसा व्यक्ति जिसने भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में सत्तारूढ़ करने में संभवत: सबसे अहम योगदान दिया, आप आसानी से खारिज नहीं मान सकते। अनुभव का अपना महत्व है और सिर्फ इस आधार पर किसी अनुभवी राजनीतिज्ञ को किनारे नहीं किया जा सकता कि आज की राजनीति में युवाओं को आगे लाए जाने की जरूरत है। युवाओं को आगे लाते हुए भी बुजुर्ग राजनीतिज्ञों को पार्टी की अगली कतार में रखा जा सकता है, यदि उनमें राजनैतिक क्षमताएं बाकी हैं।

श्री आडवाणी के बारे में ऐसा कोई नहीं कहेगा कि वे सक्रिय नहीं रहे। न सिर्फ वे स्वास्थ्य के मामले में पूरी तरह फिट हैं बल्कि आज भी भाजपा के रणनीतिक फैसलों में असरदार भूमिका निभा रहे हैं। आज भी पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर उनके जितनी स्वीकायर्ता, लोकिप्रयता और सांगठनिक पृष्ठभूमि रखता हो। नरेंद्र मोदी बहुत लोकिप्रय मुख्यमंत्री और भाजपा नेता हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकायर्ता असंदिग्ध नहीं है। गुजरात के दंगों संबंधी आरोपों की पृष्ठभूमि और राज्य में भ्रष्टाचार संबंधी आरोप उन्हें परेशान करेंगे। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सवर्मान्य नेता बनने के लिहाज से उन्हें अभी काफी सफर तय करना है।

स्वीकायर्ता का सवाल

अगर प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकायर्ता का सवाल आता है तो भाजपा के मौजूदा युवा नेतृत्व में भी ऐसा कोई सवर्मान्य नेता दिखाई नहीं देता। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी महाराष्ट्र में भले ही लोकप्रिय हों, उनकी बहुत बड़ी राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्रीय राजनीति में विशेष पृष्ठभूमि नहीं है। अरुण जेटली राजनैतिक रणनीतियों के माहिर, प्रबल वक्ता और अच्छी छवि के काबिल राजनेता हैं लेकिन जनाधार का न होना उनकी कमजोरी है। सुषमा स्वराज अच्छी वक्ता और प्रबल छवि की स्वामी अवश्य हैं लेकिन राष्ट्रीय जनाधार के मामले में वे श्री आडवाणी से होड़ नहीं ले सकतीं। वे पारंपरिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी हुई नहीं रही हैं और दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने कोई विशेष छाप नहीं छोड़ी थी। लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में भी वे मुखर भले ही हों, वजनदार नहीं दिखतीं। राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष पद पर रहते हुए काफी सक्रिय थे लेकिन पद से हटने के बाद वे उत्तर प्रदेश तक सीमित रह गए हैं। नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रबल समर्थन है और बताया जाता है कि पिछले दिनों संघ की शीर्ष बैठक में उन्हें अगले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किए जाने का फैसला हो चुका है। लेकिन गठबंधन राजनीति के जमाने में, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अन्य दलों की स्वीकायर्ता जरूरी है। राजग के कई दल, खासकर उसका सबसे प्रमुख सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर मोदी के साथ आने को तैयार नहीं है। हालांकि फिलहाल श्री आडवाणी की यात्रा के प्रति पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी का समर्थन होने की बात कही जा रही है तथा दूसरे युवा नेताओं ने भी खुले आम इस पर कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन यह देखने की बात है कि यात्रा के सफल होने की स्थिति में जब राष्ट्रीय नेतृत्व में स्वाभाविक हलचल होगी, क्या तब भी वे अपने इस वयोवृद्ध नेता के प्रति 'सम्मानजनक मौन' धारण किए रहेंगे।

श्री आडवाणी की रथयात्रा 'सिविल सोसायटी' के उन नेताओं को भी नागवार गुजरेगी जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपार राष्ट्रीय समर्थन जुटाने में कामयाब रहे हैं। अन्ना हजारे इस मुद्दे पर राष्ट्रीय लड़ाई के प्रतीक बनकर उभरे हैं और भले ही उनके आंदोलन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का परोक्ष समर्थन रहा हो, सिविल सोसायटी के नेता यह नहीं चाहेंगे कि कोई राजनैतिक दल या नेता उनके आंदोलन की उपजाऊ जमीन पर अपनी फसल उगा ले। समर्थन लेना अलग बात है और अपना आधार ही थमा देना अलग। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लालकृष्ण आडवाणी को अपनी यात्रा के दौरान अन्ना हजारे समर्थकों की नाराजगी का सामना करना पड़े। यह आरोप तो लगने ही लगा है कि वे भ्रष्टाचार विरोधी स्वत:स्फूर्त राष्ट्रीय आंदोलन को अपने तथा अपने दल की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए 'हाईजैक' करने की कोशिश कर रहे हैं।

अति-महत्वाकांक्षा या जरूरी पहल?

प्रश्न उठता है कि क्या प्रमुख विपक्षी दल के रूप में भाजपा को मौजूदा हालात के अनुरूप कदम नहीं उठाना चाहिए? जब पार्टी के स्तर पर कोई बड़ी पहल नहीं हो रही है तो एक अनुभवी नेता जो आप मानें या न मानें पर पार्टी समर्थकों के बीच एक राष्ट्रीय आइकन और संरक्षक के रूप में देखा जाता रहा है, अपने स्तर पर ऐसी पहल करना चाहता है। इसमें गलत क्या है? क्या यह सच नहीं है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संसद में हंगामा करने और कुछेक प्रदर्शनों के अलावा भाजपा जमीनी स्तर पर बड़ी राष्ट्रीय मुहिम छेड़ने में कामयाब नहीं रही है? क्या यह धारणा आम नहीं है कि अन्ना हजारे इस समय वह काम कर रहे हैं जो स्वाभाविक रूप से विपक्षी दलों को करना चाहिए था? भाजपा ने अन्ना हजारे के आंदोलन को समर्थन देकर रणनीतिक रूप से एक अच्छा कदम उठाया लेकिन वह और भी बहुत कुछ कर सकती थी, जैसे कि लोकपाल के मुद्दे पर अपने अलग विधेयक का मसौदा पेश करना। सरकार के विधेयक के विकल्प के रूप में यदि पार्टी ने एक दमदार विधेयक का प्रारूप तैयार किया होता तो वह एक परिपक्व और प्रभावी कदम होता। लेकिन हालत यह थी कि अंतिम समय तक पार्टी जन लोकपाल और सरकारी लोकपाल विधयेक के ज्यादातर प्रावधानों पर अपना रुख ही तय नहीं कर पाई थी। उसके नेताओं के बयानों में भी विरोधाभास झलकता था और इसी संदभ्र में यशवंत सिन्हा तथा शत्रुघ्न सिन्हा ने इस्तीफे तक की धमकियां दी थीं। श्री आडवाणी की रथयात्रा उस खोए हुए मौके को वापस लाने का एक बेताब प्रयास भी मानी जा सकती है, बशतेर् इसे एक व्यक्तिगत यात्रा के रूप में नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी की यात्रा के रूप में पेश किया जाए और पार्टी के सभी प्रमुख नेता इसमें सक्रिय रूप से हिस्सा लें।

पिछले दिनों आए एक टेलीविजन चैनल के जनमत सवेर्क्षण में साफ हुआ था कि भ्रष्टाचार विरोधी माहौल ने भाजपा की खासी मदद की है और कांग्रेस की तुलना में जनमत उसकी तरफ मुड़ रहा है। कांग्रेस के पक्ष में बीस प्रतिशत तो भाजपा के पक्ष में 32 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपना समर्थन जाहिर किया। अलबत्ता आप कांग्रेस को यूं ही खारिज नहीं कर सकते क्योंकि गांवों में विकास और रोजगार के कायर्क्रमों के जरिए उसने अपने समर्थकों का आधार काफी बढ़ाया है। ये वे लोग हैं जो किसी भी टेलीविजन चैनल के सवेर्क्षणों में हिस्सा नहीं लेते लेकिन देश की राजनीतिक तसवीर यही तय करते हैं। जागरूक मतदाताओं के बीच हालांकि कांग्रेस विरोधी रुझान साफ नजर आ रहा है। लेकिन भारत में जनता का रुख बदलते देर नहीं लगती और अगले लोकसभा चुनाव अभी तीन साल दूर हैं। विपक्षी दलों के सामने यह एक बड़ी चुनौती है कि वे मौजूदा माहौल का असर तीन साल तक कायम रखें। यह कोई आसान चुनौती नहीं है और उस लिहाज से भी श्री आडवाणी की यात्रा अहम भूमिका निभा सकती है।

भले ही बहुत से लोग श्री आडवाणी को भाजपा के नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति से अलग हो जाने की सलाह दे रहे हों लेकिन कभी 'लौह पुरुष' कहा जाने वाला यह सक्रिय राजनैतिक दिग्गज इतनी आसानी से मैदान छोड़ने वाला नहीं है। पिछले चुनाव से पहले हमने उनकी सक्रियता देखी थी। भले ही नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं गए हों लेकिन श्री आडवाणी ने अपनी तरफ से तैयारियों, रणनीतियों और चुनाव अभियान में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। अब वे फिर अपनी भूमिका को केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे हैं जो कोई भी महत्वाकांक्षी राजनीतिज्ञ करेगा। लोकसभा में उनका यह कहना कि अगर 'वोट के बदले धन' वाले मुद्दे में आरोप लगाने वाले सांसदों को जेल भेजा जा रहा है तो उन्हें भी जेल भेजा जाना चाहिए क्योंकि इस बारे में स्टिंग आपरेशन उनकी सहमति से हुआ था। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार पर भाजपा के साथ भेदभाव का परोक्ष आरोप लगाते हुए उनकी चाय पार्टी से अलग रहने का फैसला भी किया और अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर रथ यात्रा की घोषणा कर सुर्खियों में लौट आए है। माना कि भाजपा के युवा नेताओं की आशाओं पर इससे तुषारापात होगा लेकिन 'फेयर प्ले' में सबको खेलने का मौका मिलता है। अब वे शून्य पर आउट होते हैं या शतक बनाते हैं, यह उनकी काबिलियत पर निभ्रर करेगा।

Saturday, August 27, 2011

लोकतंत्र और लचीलेपन से ही निकलेगा समाधान

हालांकि अन्ना का सशंकित रहना अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन सुलह-सफाई का रास्ता सिर्फ एक पक्ष के लचीलेपन से नहीं निकलने सकता। वह लोकतांत्रिक तरीके से ही निकलेगा, जिसमें दोनों पक्षों को एक दूसरे को स्पेस देने की जरूरत है।

बालेन्दु शर्मा दाधीच

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश में इतना जबरदस्त भावनात्मक उफान शायद ही कभी देखा गया हो। व्यवस्थागत असंगतियों के ढांचे में खुद को किसी तरह फिट कर चुपचाप, 'सुरक्षित' ढंग से अपने जीवन.संघषर्ों में लगे आम आदमी को अन्ना हजारे और उनके साथियों ने जैसे चौंकाकर जगा दिया है। जिस तरह चाय की दुकान से लेकर बस और मेट्रो में बैठे हुए आम लोग भ्रष्टाचार के बारे में सजग चर्चा कर रहे हैं वह हमारे सामाजिक नजरिए में एक नए और सुखद बदलाव का प्रतीक है। सरकार, संसद और मीडिया को लगभग पंद्रह दिन से सिर्फ एक ही मुद्दे पर केंद्रित कर देने वाला यह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन इतिहास के अहम पड़ाव के रूप में देखा जाएगा, भले ही इसकी परिणति कैसी भी हो। किस तरह एक सामान्य सा व्यक्ति गांधीवादी तौर तरीकों का इस्तेमाल करते हुए, सिर्फ अपनी सत्यनिष्ठा और संकल्प के बल पर पूरे राष्ट्र को जागृत एवं आंदोलित कर सकता है, वह बाकी दुनिया के लिए भले ही कौतूहल का विषय हो, भारतीय लोकतंत्र की अंतर.निहित शक्तियों को जाहिर करता है। साथ ही साथ वह इस तथ्य को भी रेखांकित करता है कि लोकतंत्र, उसके तौर.तरीके और परंपराएं जनांदोलनों को मजबूत बनाती हैं, उन्हें क्षति नहीं पहुंचाती। दोनों ही तरफ खड़े लोगों को तमाम आपसी मतभेदों के बावजूद उनमें आस्था नहीं छोड़नी चाहिए।

लोकपाल विधेयक संबंधी विचारों, विकल्पों और मसौदों की संख्या बढ़ती जा रही है। किसी भी पक्ष को इस विषय में असहज होने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह एक सकारात्मक घटनाक्रम है। जनलोकपाल विधेयक संबंधी आंदोलन के मंथन से निकल कर अलग.अलग पक्षों की तरफ से आने वाले सुझावों में परस्पर भिन्नताएं जरूर हैं लेकिन एक बुनियादी समानता है और वह यह कि ये सभी भ्रष्टाचार की समस्या का दमदार समाधान निकालना चाहते हैं। उनके नजरिये भले ही अलग.अलग हो सकते हैं। सभी मसौदों में कुछ बहुत अच्छे प्रावधान हैं और सभी की कुछ सीमाएं भी हैं। अन्ना हजारे और उनके साथियों द्वारा तैयार किया गया जन लोकपाल बिल इनमें सबसे सशक्त है और मौजूदा राजनीति में आए सकारात्मक उफान के लिए उन्हीं की पहल जिम्मेदार है जिसका पूरा श्रेय उन्हें मिलना ही चाहिए। उनके मसौदे को भारी जनसमर्थन भी प्राप्त है, भले ही इसके प्रावधानों के महीन बिंदुओं पर आम जनों के बीच कितनी जागरूकता है, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने के बारे में अन्ना हजारे के संकल्प पर संदेह की गुंजाइश नहीं है। जो व्यक्ति इस राष्ट्रीय बीमारी के उन्मूलन के लिए अपना जीवन खतरे में डालने को तैयार है, और प्रभावशाली लोकपाल की स्थापना से कम पर टस से मस होने के लिए तैयार नहीं है, उसके प्रति यह देश और समाज आभारी रहेगा। श्री हजारे न सिर्फ आम जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं बल्कि उन्होंने इस विधेयक पर चालीस साल से जमी हुई जंग साफ करने का रास्ता खोला है। अगर इतने प्रबल जनसमर्थन और उद्वेलित माहौल में, जब ज्यादातर राजनैतिक दल भी मजबूत लोकपाल की स्थाना पर सहमत हैं, यह विधेयक संसद में पारित नहीं होता तो आगे ऐसा कब हो पाएगा, कहना मुश्किल है। महिला आरक्षण विधेयक का उदाहरण सामने है, जो ज्यादातर दलों के समर्थन के बावजूद आज तक लटका पड़ा है।

पिछले दस.बारह दिनों में राजनैतिक घटनाक्रम नाटकीय रूप से बदला है। अन्ना हजारे और सरकार के बीच सहमति के बिंदु उभरे हैं, जबकि कुछ दिन पहले इसकी कल्पना भी नहीं की जा रही थी। अन्ना हजारे के संकल्प को स्वीकार करते हुए उनके अनशन के प्रति प्रधानमंत्री, सरकार और विपक्षी दलों ने गहरी चिंता प्रकट की है। बाबा रामदेव के उलट, अन्ना से अनशन समाप्त करने की अनेक अपीलें सरकार और कांग्रेस की ओर से की गई हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने संसद की ओर से अनशन तोड़ने का आग्रह किया है। हालांकि अन्ना का सशंकित रहना अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन सुलह.सफाई का रास्ता सिर्फ एक पक्ष के लचीलेपन से नहीं निकलने सकता। वह लोकतांत्रिक तरीके से ही निकलेगा और लोकतांत्रिक तरीका वही है जिसमें दोनों पक्ष एक.दूसरे की भावनाओं को समझें और जरूरी 'स्पेस' दें। सरकार, विपक्ष और संसद की अपीलों को एक झटके में नजरंदाज करने की बजाए अगर अन्ना हजारे और उनकी टीम इसे एक सकारात्मक घटनाक्रम के रूप में देखती, तो इससे उनके आंदोलन की सफलता पर कोई असर नहीं पड़ने वाला था। अन्ना का आंदोलन शीर्ष स्थिति में पहुंच चुका है और किसी भी तरह की वायदाखिलाफी इसे और मजबूत ही बनाएगी।

देरी से मुश्किलें ही बढ़ेंगी

अद्वितीय सामाजिक उद्वेलन और चौतरफा अपीलों के दौर में अन्ना द्वारा अनशन समाप्त किए जाने का यह उपयुक्त समय है। इसे और लंबा खींचना आंदोलन की छवि को प्रभावित करेगा और उनकी ऐसी छवि बनाएगा जो लोकतांत्रिक और समावेशी नहीं है। रामलीला मैदान और अलग.अलग शहरों में उमड़ने वाले आंदोलनकारी खुद भ्रष्टाचार की समस्या से त्रस्त रह चुके हैं और मौजूदा आंदोलन पर उनकी उम्मीदें टिकी हुई हैं। लेकिन मीडिया के पूरे समर्थन के बावजूद उनका उत्साह बहुत लंबे समय तक इसी तरह टिका रहे, यह आवश्यक नहीं है। खासकर उस परिस्थिति में जब आंदोलनकारी नेताओं के बीच मतभेद उभरने की बातें सामने आ रही हैं। किसी सुसंगठित राजनैतिक दल के समर्थन और सुस्पष्ट राष्ट्रीय सांगठनिक ढांचे के अभाव में बहुत लंबे समय तक आंदोलन जारी रखना और उसे लोकिप्रय बनाए रखना मुश्किल है। अन्ना हजारे के निजी स्वास्थ्य के अलावा उनके कैंप को इस बारे में भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

टीम अन्ना के बीच विभाजन रेखाएं खिंचने की शुरूआत अरुणा राय और उनके साथियों द्वारा अपना अलग मसौदा पेश करने के साथ हुई थी। मानना होगा कि इसमें दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य पैदा करने की संजीदा कोशिश की गई है। अन्ना हजारे के साथियों अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी पर आंदोलन को हाईजैक करने के आरोप लग रहे हैं और यह माना जा रहा है कि टीम अन्ना और सरकार के बीच समझौता नहीं होने के पीछे उनकी भूमिका है। धीरे.धीरे आंदोलन के परिदृश्य में उनकी प्रधान भूमिका कमजोर होती गई है। सरकार से बातचीत का जिम्मा अब या तो खुद अन्ना हजारे संभाल रहे हैं या फिर उनके दो दूसरे साथी. प्रशांत भूषण तथा मेधा पाटकर देख रहे हैं। स्वामी अग्निवेश और श्री श्री रविशंकर अनशन समाप्त करने के मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी के रुख से असमहत हैं। कर्नाटक के पूवर् लोकायुक्त और सुप्रीम कोर्ट के पूवर् न्यायाधीश संतोष हेगड़े संसद की सवर्ोच्चता को चुनौती दिए जाने से इतने व्यथित हैं कि आंदोलन से अलग होने पर विचार कर रहे हैं। अनशन जितना लंबा चलेगा, इस किस्म के रासायनिक परिवर्तन और गति पकड़ते रहेंगे। अन्ना हजारे को इस संदभ्र में एक रणनीतिक फैसला करने की जरूरत है।

सभी में कुछ अच्छा, कुछ बुरा

सरकार की ओर से पेश किया गया लोकपाल विधेयक उसके मंसूबों के बारे में यकीनन संदेह पैदा करता है। भ्रष्टाचार के दोषियों को सामान्य सी सजा देना, राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना को विधेयक से न जोड़ा जाना, विधेयक के दायरे में सिर्फ उच्च नौकरशाही को लाना और शिकायत गलत साबित होने पर शिकायतकर्ता को गंभीर सजा दिए जाने का प्रावधान उचित नहीं हैं। ऐसे प्रावधानों ने विधेयक के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को ही संदेह के दायरे में ला देते हैं। प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को विधेयक के दायरे से अलग रखे जाने जैसे मुद्दों पर लोगों के मन में संदेह पैदा हो रहे हैं तो उसके पीछे ऐसे प्रावधानों का भी हाथ है। लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली समिति द्वारा अन्ना हजारे और उनकी टीम के ज्यादातर सुझावों को स्वीकार कर लिए जाने के बावजूद अगर सरकार जनता के बीच विधेयक के प्रति विश्वसनीयता पैदा करने में नाकाम रही है तो इसके लिए किसी और को दोष नहीं दिया जा सकता।

जन लोकपाल विधेयक भी खामियों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। मिसाल के तौर पर गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) और उनके कर्मचारियों द्वारा हासिल की जाने वाली धनराशि पर उनकी नजर नहीं गई है, हालांकि सरकार के विधेयक में इन्हें शामिल किया गया है। इस संदभ्र में लेखिका और सामाजिक कायर्कर्ता अरूंधती राय की टिप्पणी काबिले गौर है, जिन्होंने कहा है कि अन्ना हजारे के आंदोलन का समर्थन कर कारपोरेट घराने, गैर.सरकारी संगठन और मीडिया बड़ी सफाई से लोकपाल विधेयक के दायरे में आने से बच निकले हैं। अन्ना हजारे की टीम अगर वाकई भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर विधेयक लाना चाहती है तो इन तीनों बड़े सेक्टरों को उससे अलग कैसे रखा जा सकता है? न्यायपालिका के मुद्दे पर अन्ना हजारे की टीम कुछ लचीलापन दिखाने को तैयार हुई है लेकिन उसे संसद तथा संविधान की सवर्ोच्चता जैसे मसलों को भी पयरप्त सम्मान देना चाहिए।

प्रधानमंत्री को बिल के दायरे में लाने के मुद्दे पर अरुणा राय समूह के प्रस्तावित प्रावधान एक मध्यमार्ग निकाल सकते हैं। लोकपाल समिति के सभी सदस्य अगर आम राय से प्रधानमंत्री को दोषी मानते हुए उनके विरुद्ध मुकदमा चलाना चाहें तो वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रख सकते हैं जो जरूरी आकलन के बाद अंतिम निण्रय दे सकता है। यह ऐसा प्रावधान है जिसे स्वीकार करने में सरकार को कोई आपित्त नहीं होनी चाहिए और यह जन लोकपाल विधेयक के प्रावधान को भी कुछ शर्तों के साथ पूरा करता है। अगर सभी पक्ष इस बारे में सहमत हो जाते हैं तो टकराव का एक बड़ा बिंदु दूर हो सकता है। न्यायपालिका से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले हल करने के लिए कठोर न्याियक जवाबदेही कानून लाने पर भी ज्यादातर पक्षों की सहमति बनने लगी है। इसी तरह एक.एक कर मतभेद के बिंदु समाप्त हो सकते हैं। हालांकि उच्च अफसरशाही और निम्न अफसरशाही के लिए अलग.अलग संस्थाएं बनाने की बात कुछ अव्यावहारिक है क्योंकि यह भ्रष्टाचार पर अंकुश की प्रक्रिया का कम्पार्टमेंटलाइजेशन (अलग.अलग टुकड़ों में बांटना) सुनिश्चित करेगा जिससे आम आदमी के लिए शिकायत करना और समाधान हासिल करना जटिल हो जाएगा।

Saturday, August 6, 2011

सबको चाहिए अपनी-अपनी सुविधा का लोकपाल

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाए जाने के मुद्दे पर विभिन्न राजनैतिक दल अपनी-अपनी सुविधा के लिहाज से नीतियां तय कर रहे हैं। इस मामले में हठधर्मिता नहीं बल्कि दूरदर्शिता से काम लेने की जरूरत है।

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने या न लाने के बारे में फटाफट किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है। एक, विश्व में कहीं भी किसी कायर्कारी प्रमुख को ऐसी संस्था के दायरे में नहीं लाया गया है। दो, ऐसा करने की पुरजोर मांग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के अपने मुख्यमंत्रियों ने या तो लोकायुक्तों की स्थापना ही नहीं की है या फिर उनके पद लोकायुक्त के दायरे से बाहर हैं। तीन, प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार निरोधक कानून के दायरे में आते हैं इसलिए वे आज भी कानूनी कार्यवाही से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। चार, लोकपाल संबंधी सरकारी विधेयक का मसौदा सिर्फ मौजूदा प्रधानमंत्री को लोकपाल की जांच के दायरे में लाने से रोकता है, पूवर् प्रधानमंत्रियों को नहीं। सत्ता छोड़ते ही हर प्रधानमंत्री खुद ब खुद इसके दायरे में आ जाएगा।

सरकार की तरफ से संसद में पेश किए गए लोकपाल विधेयक पर भारतीय जनता पार्टी को कुछ गंभीर आपत्तियां हैं। प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में न लाए जाने पर वह सर्वाधिक आक्रोश में है। विधेयक के कुछ प्रावधान यकीनन आपित्तजनक हैं लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा विधेयक पहले बनाए गए किसी भी मसौदे से ज्यादा व्यापक तथा शक्तिशाली है। स्थायी समिति में होने वाली चर्चाओं के दौरान जरूरी संशोधन करके तथा नए प्रावधानों को जोड़कर इसे और मजबूती दी जा सकती है। जहां तक प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाए जाने का प्रश्न है, विभिन्न राजनैतिक दल अपनी-अपनी सुविधा के लिहाज से नीतियां तय कर रहे हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासनकाल के दौरान सन 2002 में बनाए गए लोकपाल बिल के मसौदे में प्रधानमंत्री को शामिल किया गया था। लेकिन गठबंधन ने प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति द्वारा मसौदे को हरी झंडी दे दिए जाने के बाद भी दो साल तक इसे संसद में पारित नहीं करवाया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस मुद्दे पर पार्टी का वास्तविक रुख क्या था।

इस मुद्दे पर विभिन्न गठबंधनों के बीच विरोधाभास हैं। भाजपा और जनता दल (यू) के रुख के विपरीत अकाली दल प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने के विरुद्ध है। उधर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के शेष दलों के विपरीत द्रमुक उन्हें इसमें शामिल करवाना चाहती है। संप्रग के भीतर बदलते समीकरणों और रिश्तों के बीच द्रमुक के रुख को समझना असंभव नहीं है तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी बादल सरकार के नजरिए को भी। चुनावों की ओर बढ़ रहे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाना चाहती हैं तो बिहार की राजनीति में हाशिए पर चले गए लालू प्रसाद इसके सख्त खिलाफ हैं। केंद्र में सत्ता का ढांचा अगर अलग होता तो संभवत: इन सभी दलों के नजरिए कुछ और ही होते। लोकपाल पर नजरिया राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि राजनैतिक नफा-नुकसान के आधार पर तय हो रहा है। भ्रष्टाचार विरोधी महायुद्ध में लोकपाल की संस्था से जितनी प्रचंड उम्मीदें हैं, उन्हें देखते हुए यह सुविधाजनक, राजनैतिक समीकरण आधारित और हल्का-फुल्का रवैया कुछ नाइंसाफी जैसा लगता है।

आपित्तयां और दलीलें

भाजपा की इस दलील में दम है कि मंत्रियों को सरकारी खर्चे पर कानूनी सहायता देने और शिकायत गलत निकलने पर शिकायतकर्ता को सजा देने जैसे प्रावधान लोकपाल विधेयक की भावना को ही नष्ट कर रहे हैं। पार्टी को स्थायी समिति की बैठकों में ऐसे सभी मुद्दों पर पुरजोर आवाज उठाकर जरूरी संशोधनों के लिए विवश करना चाहिए। लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी पार्टी की जायज आपित्तयां हैं। लेकिन ये ऐसे मुद्दे नहीं हैं जिनका समाधान आपसी विचार-विमर्श से न हो सके। सबसे ज्यादा विवादित और प्रचारित मुद्दा प्रधानमंत्री का ही है जिसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने की बजाए व्यावहारिक ढंग से सुलझाए जाने की जरूरत है।

इस मुद्दे पर मौजूदा केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट है। मुझे नहीं लगता कि पार्टी मनमोहन सिंह को इसलिए इससे दूर रखना चाहती होगी कि वे 'भ्रष्ट' हैं। प्रधानमंत्री के धुर राजनैतिक विरोधी भी उन पर यह आरोप नहीं लगाते। रिमोट-संचालित, भ्रष्ट तत्वों से घिरे हुए, कमजोर, राजनैतिक जनाधार से विहीन आदि-आदि तमाम आरोप उन पर लगाए जाते रहे हैं लेकिन मनमोहन सिंह स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हों, ऐसा कोई नहीं कहता। खुद अन्ना हजारे और उनके साथी भी। जाहिर है, मुद्दा श्री सिंह को किसी 'आसन्न खतरे' से बचाने का नहीं है। फिर भी सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन अगर उन्हें लोकपाल के दायरे में न लाने पर अडिग हैं तो उसके रुख को समझने का प्रयास तो होना ही चाहिए। अगर प्रधानमंत्री के विरुद्ध शिकायतों का सिलसिला शुरू हो जाता है तो वह देश के कार्यकारी प्रमुख के रूप में उनकी स्थिति को कमजोर करेगा। भारत में जिस तरह बात-बात पर जनहित याचिकाएं दायर होती हैं, उसे देखते हुए यह आशंका निर्मूल नहीं है। उन्हें ऐसे मामलों से निपटने, विवादों को शांत करने, सफाई देने, सुनवाइयों में मौजूद होने आदि को समय और वरीयता देनी होगी।

बचाव की रणनीतियों में उलझाने की बजाए कम से कम एक व्यक्ति को तो चैन से काम करने ही दिया जाना चाहिए, खासकर तब जबकि सत्ता से हटते ही उन्हें जांच के दायरे में लाने की व्यवस्था मौजूद हो। परोक्ष रूप से इस मार्ग का इस्तेमाल राष्ट्र विरोधी तत्व, बड़े कारपोरेट घराने, शत्रु राष्ट्र आदि भी कर सकते हैं। हर छोटा-बड़ा निर्णय लेने से पहले उन्हें यह सोचना होगा कि इस पर लोकपाल का रुख क्या होगा। क्या सिर पर तलवार रखकर किसी से अच्छा काम करने की उम्मीद की जा सकती है? जो व्यक्ति चुनावी प्रक्रिया से गुजरकर आया है, उसे निर्बाध रूप से अपना काम करने का हक क्यों नहीं मिलना चाहिए? अगर कोई सरकार राष्ट्र विरोधी फैसले करती है या भ्रष्टाचार में लिप्त है तो हमारे लोकतंत्र में संसद के जरिए उसके विरुद्ध अविश्वास मत के जरिए कार्रवाई करने की व्यवस्था है। फिर कुछ समय बाद ही सही, लोकपाल का विकल्प तो मौजूद है ही। यहां यह तथ्य भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि जो संस्था किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है (संसद, न्यायपालिका और जनता के प्रति भी नहीं), वह लोकतांत्रिक पद्धति से पूरे देश द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री के हर फैसले को निष्प्रभावी करने की शक्ति रखेगी। किसी भी संस्था को इस तरह की असीमित शक्तियां देना दूरदर्िशता नहीं कही जाएगी।

हठधर्मिता किसलिए

यह बात समझ से परे है कि अन्ना हजारे और सिविल सोसायटी के अन्य लोग यह कैसे मानकर चल रहे हैं कि उन्होंने विधेयक का जो मसौदा बनाया है, उसका दर्जा किसी 'ईश्वरीय दस्तावेज' जैसा है? उसके बारे में कोई भी आपित्त, कोई भी बहस उन्हें स्वीकार नहीं है। उसका हर प्रावधान जैसे कुंदन की तरह आग में तपाकर निकाला गया है जो किसी भी विवाद या आपित्त से परे है! बताया जाता है कि सरकारी मसौदे में सिविल सोसायटी के तीन चौथाई प्रावधान समाहित कर लिए गए हैं। लेकिन वे सौ फीसदी से कम पर तैयार नहीं हैं। सरकार ने उन्हें समिति में लेकर अपना मसौदा पेश करने का मौका दिया। वैसा ही जैसा किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में होता है। लेकिन उस मसौदे का हर प्रावधान स्वीकार करने के लिए वह बाध्य नहीं है। उसे उनकी स्वतंत्र समीक्षा करने और उचित.अनुचित प्रावधानों को स्वीकार तथा रद्द करने का पूरा हक है। वैसे ही, जैसे सिविल सोसायटी ने सरकारी मसौदे के बहुत से प्रावधानों की निंदा की है और विधेयक की प्रतियां जलाकर अपना रुख जाहिर किया है।

यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें कुछ लोग खुद को हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ऊपर मानते हैं? ऐसे लोग किसी संस्था के प्रमुख बनते हैं, वह भी ऐसी संस्था जो किसी के भी प्रति किसी भी प्रकार की जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त है, तो वे किस अंदाज में आगे बढ़ेंगे इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। वे कपिल सिब्बल को मंत्रिमंडल में रहने के लायक नहीं मानते, वे कहते हैं कि अगर वे तीन दिन और अनशन करते तो सरकार गिर जाती। वे खुद को कायर्पालिका, न्यायपालिका और संसद, सभी से ऊपर मानते हैं, वे सीबीआई जैसी संस्थाओं को अपने अधीन लाना चाहते हैं। देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति पानी है लेकिन अपने लोकतंत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचाए बिना। फर्ज कीजिए कि सिविल सोसायटी की सभी शतेर्ं मान ली जाएं और इस तरह बनने वाला सवर्शक्तिमान लोकपाल बाद में निरंकुश तथा पथभ्रष्ट हो जाए तो इसके क्या परिणाम होंगे? वह स्वयं भ्रष्ट हो गया तो? खासकर तब, जब वह प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा करने का अधिकार रखता हो! उस समय विपक्ष और मीडिया का क्या रुख होगा, इसे समझना मुश्किल नहीं है। क्या यह सरकार की स्थिरता और उसके नतीजतन देश की स्थिरता को प्रभावित नहीं करेगा? इतनी महत्वपूर्ण संस्था की स्थापना से पहले सकारात्मक और नकारात्मक सभी पहलुओं पर गौर करना जरूरी है। सिविल सोसायटी, विपक्ष और सरकार तीनों को सुविधाजनक दृष्टिकोण अपनाने या हठधर्मिता छोड़कर स्वस्थ विचार-विमर्श का रास्ता अपनाना चाहिए। अराजकता से मुक्ति का उपकरण खुद अराजकता का जनक बन जाए तो वह राष्ट्रीय दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।
इतिहास के एक अहम कालखंड से गुजर रही है भारतीय राजनीति। ऐसे कालखंड से, जब हम कई सामान्य राजनेताओं को स्टेट्समैन बनते हुए देखेंगे। ऐसे कालखंड में जब कई स्वनामधन्य महाभाग स्वयं को धूल-धूसरित अवस्था में इतिहास के कूड़ेदान में पड़ा पाएंगे। भारत की शक्ल-सूरत, छवि, ताकत, दर्जे और भविष्य को तय करने वाला वर्तमान है यह। माना कि राजनीति पर लिखना काजर की कोठरी में घुसने के समान है, लेकिन चुप्पी तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है। बोलोगे नहीं तो बात कैसे बनेगी बंधु, क्योंकि दिल्ली तो वैसे ही ऊंचा सुनती है।

बालेन्दु शर्मा दाधीचः नई दिल्ली से संचालित लोकप्रिय हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक। नए मीडिया में खास दिलचस्पी। हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी को करीब लाने के प्रयासों में भी थोड़ी सी भूमिका। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन से पुरस्कृत। अक्षरम आईटी अवार्ड और हिंदी अकादमी का 'ज्ञान प्रौद्योगिकी पुरस्कार' प्राप्त। माइक्रोसॉफ्ट एमवीपी एलुमिनी।
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- वाहमीडिया मीडिया ब्लॉग
- लोकलाइजेशन लैब्सहिंदी में सूचना प्रौद्योगिकीय विकास
- माध्यमः निःशुल्क हिंदी वर्ड प्रोसेसर
- संशोधकः विकृत यूनिकोड संशोधक
- मतान्तरः राजनैतिक ब्लॉग
- आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, 2007, न्यूयॉर्क

ईमेलः baalendu@yahoo.com