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बालेन्दु शर्मा दाधीच: पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव नतीजों ने द्रमुक नेता एम करुणानिधि को छोड़कर शायद ही किसी को चौंकाया हो। वे चुनावी हार झेलने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं दिखते थे। भ्रष्टाचार और भाई.भतीजावाद के आरोपों से घिरे इस वयोवृद्ध नेता को चुनावी जीत की सबसे ज्यादा जरूरत थी तो शायद आज जब कानून का शिकंजा उनके परिवार तक आ पहुंचा है। मतदाताओं को लुभाने के लिए हर किस्म के वायदे करने और चुनाव प्रचार में अपनी सारी ताकत झोंकने के बावजूद द्रमुक न सिर्फ पराजित हो गई बल्कि अपनी पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक की तुलना में एक चौथाई से भी कम सीटों पर आ गिरी। देश के सर्वाधिक अनुभवी और जनाधार वाले नेताओं में से एक करुणानिधि के सक्रिय राजनैतिक जीवन का संभवत: यह अंतिम विधानसभा चुनाव था, जिसने उन्हें एक कटु कालखंड की दिशा में धकेल दिया है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव नतीजों ने दो महिलाओं के नेतृत्व में दो बड़ी राजनैतिक क्रांतियों को अंजाम दिया है। दो ऐसे दिग्गजों को हाशिये से परे धकेल दिया गया, जिन्हें चुनौती देना कल तक असंभव सा था। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों का लगभग वही हश्र हुआ जैसा तमिलनाडु में द्रमुक का। अपने कैडर के दम पर लगभग तीन दशकों से राज्य की सत्ता में वाम मोर्चे को हरा पाना ममता बनर्जी जैसी जीवट की नेता के ही बस का था, जिन्होंने माकपा को उसी की भाषा में जवाब देने की हिम्मत दिखाई और इतने लंबे अरसे तक अपने संघर्ष को जिंदा रखने में कामयाब रहीं। अपनी समृद्ध प्राकृतिक और खनिज संपदा के बावजूद पश्चिम बंगाल की गिनती पिछड़े राज्यों में होती रही है। व्यापक गरीबी और माकपा कैडर के आतंक के बावजूद हर चुनाव में वाम मोर्चा जीत कर आता रहा तो दो कारणों से। पहला, मतदाता के सामने ऐसा कोई दमदार विकल्प मौजूद नहीं था जो राज्य के सर्वशक्तिमान वाम मोर्चे के लिए मजबूत चुनौती खड़ी कर सके। दूसरा, दौरान माकपा कैडर के हिंसक तौरतरीकों ने नियमित रूप से मतदान प्रक्रिया और चुनाव परिणामों को प्रभावित किया। इस बार स्थितियां अलग थीं और ममता बनर्जी का परिवर्तन का नारा जन.आकांक्षाओं से मेल खाता था। सिंगुर और नंदीग्राम की घटनाओं के बाद तृणमूल कांग्रेस ने सिद्ध किया कि वह एक मजबूत ताकत है जो राजनीति और स्थानीय स्तर पर वाम कैडर को उसी के अंदाज में जवाब देने में सक्षम है। इस प्रक्रिया में उन्होंने माओवादियों को साथ लेने जैसा अलोकप्रिय कदम भी उठाया लेकिन पिछले चार.पांच साल में ममता बनर्जी की लगभग हर रणनीति अनुकूल सिद्ध हुई। स्थानीय निकायों के चुनावों से ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में आसन्न बदलाव का संकेत मिल गया था। यह ममता की बड़ी कामयाबी है कि केंद्र में रेल मंत्री का पद संभालने के बावजूद वे पश्चिम बंगाल में ही टिकी रहीं और राज्य सरकार के प्रति उपजे असंतोष को ठंडा नहीं पड़ने दिया। रही सही कसर चुनाव आयोग ने पूरी कर दी जिसने शांतिपूण्र और अनुशासित मतदान सुनिश्चित कर चुनावी हिंसा और धांधली की गुंजाइश खत्म कर दी। इस बार राज्य में रिकॉर्ड मतदान हुआ, जिसका तृणमूल.कांग्रेस गठजोड़ को स्पष्ट लाभ पहुंचा। असम में कांग्रेस का लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना बड़ी घटना है। छोटे राज्यों का मतदाता आम तौर पर हर चुनाव में सरकार बदल देता है। लेकिन धीरे.धीरे हमारी राजनीति में यह ट्रेंड बदल रहा है जो कई भाजपा शासित राज्य और कुछ कांग्रेस शासित राज्य पहले भी सिद्ध कर चुके हैं। लोग विकास और ज्वलंत मुद्दों पर ठंडे दिमाग से सोचकर फैसले करने लगे हैं। राज्य में विपक्ष की स्थिति बहुत कमजोर है। भारतीय जनता पार्टी का आधार सीमित है और असम गण परिषद अपने राजनैतिक अंतरविरोधों से बाहर निकलने और अपना पुराना आधार फिर से अर्जित करने में नाकाम रही है। असम की जनता के लिए मौजूदा हालात में अलगाववाद का मुद्दा भाजपा के बांग्लादेशी नागरिकों के मुद्दे से ज्यादा महत्वपूण्र है। उल्फा, बोडो और दूसरे उग्रवादियों के हाथों हजारों निर्दोष नागरिकों को खोने वाले असम को अब हिंसा और अस्थिरता से मुक्ति चाहिए। कई साल की नाकामियों के बाद तरुण गोगोई सरकार उग्रवादी गतिविधियों को नियंत्रित करने में सफल हुई है। उल्फा के साथ सुलह के संदभ्र में हाल के महीनों में कुछ बड़ी कामयाबियां हासिल हुई हैं जिन्होंने इस समस्या के स्थायी समाधान की उम्मीद जगाई है। वहां बिखरे हुए विपक्ष और उग्रवाद विरोधी कामयाबियों ने मतदाता के फैसले को प्रभावित किया है। कांग्रेस के लिए मिश्रित नतीजेपांडिचेरी आम तौर पर तमिलनाडु के चुनावी ट्रेंड्स के अनुकूल प्रदर्शन करता है। वहां इस बार भी कमोबेश वही सूरत दिखाई दे रही है। और हर चुनाव में पत्ते बदलने वाला केरल भी अपनी परंपरा पर कायम रहा। हालांकि वहां कांग्रेस की जीत का अंतर बहुत कम रहा। एमएस अच्युतानंदन की निजी छवि ने नतीजों को प्रभावित किया। कांग्रेस को अपने महासचिव राहुल गांधी की सक्रियता से लाभ मिला अन्यथा वहां हालात कुछ और भी हो सकते थे। बहरहाल, अपने प्रभाव वाले तीन में से दो राज्यों की सत्ता गंवा देना माकपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए शुभ संकेत लेकर नहीं आया है। प्रकाश करात के महासचिव बनने के बाद पार्टी के लिए शुरू हुआ गिरावट का सिलसिला अपनी परिणति पर पहुंच गया है। लोकसभा में पहले ही रसातल पर जा पहुंची यह पार्टी सिर्फ त्रिपुरा में सत्ता में रह गई है। पश्चिम बंगाल में सत्ता से बेदखल होना उसके भविष्य के लिए अशुभ संकेत देता है क्योंकि पार्टी को उसकी राजनैतिक, आर्िथक और वैचारिक शक्ति वहीं से मिलती है। वहां जनाधार खोने के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर अप्रासंगिक होने की ओर बढ़ रही है। आने वाले दिनों में यह पार्टी के आंतरिक संगठन को भी प्रभावित करेगा। कांग्रेस के लिए चुनाव नतीजे मिश्रित उपलब्धियों वाले रहे। पार्टी को उम्मीद थी कि पांचों राज्यों में चुनाव नतीजे उसके अनुकूल रहेंगे। लेकिन अंतत: संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को तीन राज्यों की जनता से ही मंजूरी मिली। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को पछतावा हो रहा होगा कि उसने न सिर्फ कुछ महीने पहले तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ गठजोड़ का मौका खो दिया बल्कि पार्टी के शीर्ष नेताओं ने द्रमुक के साथ चुनाव सभाओं में हिस्सा लेकर निकट भविष्य में भी अन्नाद्रमुक को साथ लेने की संभावना खत्म कर दी। द्रमुक की गिरती छवि, पार्टी के आंतरिक संघर्ष और बढ़ती अलोकिप्रयता के बावजूद सोनिया गांधी और डॉ॰ मनमोहन सिंह ने तमिलनाडु में चुनाव प्रचार किया और द्रमुक नेताओं के साथ मंच साझा किया। वह न सिर्फ मतदाता का मानस पढ़ने में नाकामयाब रहा बल्कि उसने इस तथ्य को भी नजरंदाज कर दिया कि पिछली बार को छोड़कर तमिलनाडु में प्राय: हर चुनाव में सत्ताधारी बदल जाते हैं। जिस तरह 2जी स्पेक्ट्रम में कानून के हाथ स्वयं करुणानिधि के परिवार तक जा पहुंचे हैं और पूवर् केंद्रीय मंत्री ए राजा जेल की सलाखों के पीछे हैं, उस स्थिति में मतदाता से समर्थन की उम्मीद लगाना अव्यावहारिक होता। आने वाले दिनों के संकेत
देश के मुख्य विपक्षी दल भाजपा के लिए इन चुनावों में कुछ विशेष नहीं था फिर भी नतीजों ने उसे निराश ही किया होगा। पार्टी असम के चुनाव प्रचार में जमकर ऊर्जा झोंकी थी और वहां मुख्य विपक्षी दल बनने को लेकर आश्वस्त थी। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि राज्य विधानसभा में उसकी सीटें पिछली बार की तुलना में आधी से भी कम हो गई हैं। पश्चिम बंगाल में जरूर वह अपना खाता खोलने में सफल रही लेकिन वोटों के प्रतिशत में गिरावट के साथ। पिछले कुछ वषर्ों से पार्टी केरल पर भी काफी उत्साह के साथ फोकस कर रही है लेकिन फिलहाल वहां का मतदाता पड़ोसी कर्नाटक की तरह भाजपा के प्रति सहज नहीं हो सका है। तमिलनाडु और पांडिचेरी में भी पार्टी की कोई भूमिका नहीं है। इन चुनावों ने यह प्रश्न एक बार फिर खड़ा कर दिया कि क्या मौजूदा हालात में पार्टी अगले लोकसभा चुनावों में सत्ता में लौटने की उम्मीद रख सकती है? केंद्र में सत्तारूढ़ संप्रग गठबंधन की लोकिप्रयता का क्षरण जरूर हो रहा है, भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे ने आम जनमानस को भी झकझोरा है लेकिन क्या भाजपा इस माहौल का राजनैतिक लाभ उठाने की स्थिति में है? पांच राज्यों के चुनावों में उसका नामो.निशान तक न होना स्पष्ट करता है कि वह देश के बड़े भूभाग में उसकी राजनैतिक भूमिका बहुत सीमित है। अन्नाद्रमुक अब उसके साथ नहीं है और चंद्रबाबू नायडू भी दूरी बना चुके हैं। उत्तर प्रदेश में पार्टी के लिए स्थितियां बहुत विकट हैं। और तो और पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश सहित विधानसभा चुनावों के अगले दौर में भी उसे नुकसान हो सकता है। इन हालात में 2014 के चुनावों से पहले राष्ट्रीय राजनीति में बनने वाला माहौल भाजपा के पक्ष में बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन के अनुकूल होगा या नहीं, कहना मुश्किल है।
एक बार फिर पश्चिम बंगाल की की चर्चा, जहां की राजनैतिक सूरत बदलने जा रही है। वहां ममता बनर्जी का सत्ता में आना जमीनी स्तर पर क्या बदलाव लाएगा, इस बारे में सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं। एक संघर्षवान राजनेता के रूप में ममता बनर्जी की क्षमता अद्वितीय रही है। आम लोगों के साथ जुड़ाव और जनसमस्याओं के प्रति उनकी समझ को लेकर भी कोई संदेह नहीं है। लेकिन एक मंत्री और प्रशासक के रूप में उनकी भूमिका कई सवाल खड़े करती है। हजारों करोड़ रुपए के कर्ज में दबे पश्चिम बंगाल की जनता को उनसे इतनी उम्मीद तो जरूर है कि वे राज्य में विकास की नई प्रक्रिया शुरू करेंगी और उसे हिंसा तथा अराजकता से मुक्त कराएंगी। सवाल यहीं खड़े होते हैं। सिंगुर में टाटा नैनो का कारखाना बंद करवाकर और भारतीय रेलवे को ढीले.ढाले ढंग से चलाकर उन्होंने बहुत अनुकूल संकेत नहीं दिए हैं। आज जबकि वे मुख्यमंत्री के रूप में पश्चिम बंगाल की कमान संभालने जा रही हैं, नई सरकार को लेकर कई ज्वलंत सवाल उपज रहे हैं। विकास के लिए ममता बनर्जी का मॉडल क्या होगा? क्या वे किसानों और उद्योगपतियों के हितों के बीच सामंजस्य पैदा कर पाएंगी? क्या उनके लोकलुभावन रेल बजटों की तरह राज्य में उनकी नीतियां और कायर्क्रम भी लोक.लुभावन ही होंगे या वे किसी विकास की किसी ठोस योजना पर आधारित होंगे? केंद्र सरकार के साथ उनके रिश्ते कैसे रहेंगे? राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन, दोनों के साथ गठबंधन के दिनों में वे अपनी मांगों पर कोई नरमी नहीं दिखाने वाली नेता के रूप में ही दिखी हैं। तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक मामलों में भी वे कठोर नेता के रूप में पेश आई हैं जिन्होंने दूसरी कतार के नेतृत्व को प्रोत्साहित नहीं किया है। नई मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें न सिर्फ इन सवालों के जवाब देने हैं, बल्कि पश्चिम बंगाल को पड़ोसी बिहार की तरह विकास की पटरी पर लाने के लिए दूरगामी विज़न, राजनैतिक लचीलापन और प्रशासनिक क्षमता भी दिखानी है।
बालेन्दु शर्मा दाधीचःग्यारह सितंबर 2001 को अलकायदा आतंकवादियों ने वर्ल्ड ट्रेड टावर्स को ध्वस्त करके दुनिया के सबसे ताकतवर देश के विरुद्ध आतंकवाद का मोर्चा खोलने का जनसंहारक ऐलान किया था। दो मई 2011 को अमेरिका ने अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतारकर आतंकवाद और शांति के बीच जारी जंग का एक अहम अध्याय लिख दिया है। पाकिस्तान के ऐबटाबाद में अलकायदा सरगना की मौत इस शताब्दी की सबसे बड़ी घटनाओं में गिनी जाएगी जिसने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि आतंकवादी और विध्वंसक ताकतें भले ही अपने छोटे.छोटे मंसूबों में कामयाब हो जाएं लेकिन उनका अंत इसी तरह होता है। ऐसा अंत, जिस पर दुनिया जश्न मना रही होती है। ओसामा बिन लादेन ने एक कारोबारी से आतंकवादी बनकर पिछले दो.ढाई दशक के अपने विक्षिप्त अभियान के दौरान कुल जमा क्या अर्जित किया? लाखों युवाओं को गुमराह कर जेहाद के रास्ते पर लाने, करोड़ों लोगों का जीवन असुरक्षित बनाने और लाखों बेकसूर लोगों की मौतों की पटकथा लिखने के बाद भी आखिर उसने क्या पाया? आज तुच्छ ढंग से मारे जाने के बाद वह उन लोगों को पहले से कहीं ज्यादा असुरक्षित और अलग.थलग करके गया है जिनके साथ वैश्विक स्तर पर हो रहे तथाकथित पक्षपात और नाइंसाफी की घुट्टी वह अपने अनुयािययों को पिलाया करता था। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की घटना के बाद अमेरिका ने दूसरी लोकतांत्रिक ताकतों के साथ मिलकर आतंकवाद के विरुद्ध जंग की जो प्रक्रिया शुरू की थी, वह ओसामा की मौत से खत्म होने वाली नहीं है। इस घटना के बाद आतंकवाद खत्म हो जाएगा, ऐसी खुशफहमी पालने का भी कोई कारण नहीं है। लेकिन लोकतांत्रिक ताकतों की यह प्रचंड विजय आतंकवादी शक्तियों की अब तक की सबसे बड़ी पराजय जरूर है। लगभग उतनी ही बड़ी, जितनी अफगानिस्तान से कट्टरपंथी तालिबान की हुकूमत की विदायी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित होने वाले आतंकवादी संगठन के नाते अलकायदा में नेतृत्व के कई स्तर मौजूद हैं। अयमान अल जवाहिरी और मुल्ला उमर जैसे अनेक लोग ओसामा की जगह लेने के लिए तैयार होंगे। लेकिन ओसामा के रूप में आतंकवादी दुनिया का सबसे बड़ा 'आइकन' मारा गया है। इसका बहुत बड़ा प्रतीकात्मक महत्व है। न सिर्फ आप.हम जैसे सामान्य लोगों के लिए, न सिर्फ आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में जुटे लोगों के लिए बल्कि खुद जेहादियों और दूसरी आतंकवादी ताकतों के लिए भी। यह एक ऐसा झटका है, जिससे उबरना आतंकवादियों के लिए आसान नहीं होगा। ओसामा की मौत के बाद दुनिया भर में जिस अंदाज में खुशी मनाई गई, वह उस बेताबी की ओर संकेत करती है जिसके साथ लोग इस खबर का इंतजार कर रहे थे। इस घटना ने दुनिया के शांतिप्रिय लोगों के मन में आतंकवाद से मुक्ति की उम्मीद जगा दी है। एहतियात की जरूरत हालांकि इस मामले में बहुत एहतियात बरते जाने की जरूरत है। खासकर अमेरिका, भारत, इजराइल और यूरोपीय देशों को। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के जनक की मौत की खबर इस तरह सन्नाटे में गुजर जाए, यह ओसामा के जेहादियों को शायद मंजूर नहीं होगा। अपनी हताशा, कुंठा और खीझ में वे कहीं भी, किसी भी तरह की जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं। सबको सतर्कता बरतने की जरूरत है। आतंकवादी ताकतें और उनसे सहानुभूति रखने वाले तत्व माहौल बिगाड़ने के लिए आतंकवादी हिंसा के साथ.साथ सांप्रदायिक हिंसा, अफवाहों, अपहरणों आदि का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं। ओसामा की मौत की खुशी और जोश में बहते हुए ऐसे तत्वों को किसी तरह का मौका नहीं देना चाहिए। आतंकवाद के विरुद्ध जंग के दिशानिर्देशक के रूप में अमेरिका की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है। अलकायदा ने हाल ही में धमकी दी थी कि ओसामा के मारे जाने पर वह चुप नहीं बैठेगा और अपने पास मौजूद परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करेगा, जो तथाकथित रूप से यूरोप में कहीं रखे गए हैं। वास्तविकता जो भी हो, दुनिया की लोकतांत्रिक शक्तियों को पहले से अधिक सतर्क होने की जरूरत है। 'ओसामा की मौत' की खबरें अतीत में पहले भी आती रही हैं. कभी किसी हमले में तो कभी बीमारी की वजह से। लेकिन इस बार यह खबर सच है। ओसामा का शव पाकिस्तान में हमलावर कार्रवाई करने वाले अमेरिकी सैनिकों के कब्जे में है। अफगानिस्तान में अमेरिकी कार्रवाई के दिनों से ही सीआईए और अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां ओसामा, जवाहिरी और मुल्ला उमर जैसे शीर्ष आतंकवादियों पर नजर रखने में लगी हैं। कई साल पहले वह अफगानिस्तान की तोरा-बोरा पहाङ़ियों में भी सीआईए का शिकार होते.होते बचा था। उसके बाद वह निरंतर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच अपने ठिकाने बदलता रहा और अपने वीडियो तथा ऑडियो संदेशों के जरिए जेहादियों का हौसला बढ़ाता रहा। भले ही ओसामा की शख्सियत एक खतरनाक आतंकवादी की शख्सियत थी लेकिन कुछ मायनों में आपको उसका लोहा मानना पड़ेगा। पहला, उसने अलकायदा को दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों के प्रतिरोध के बावजूद पूरी दुनिया में फैला कर अपनी नेतृत्व क्षमता दिखाई। दूसरे, वह बड़ी संख्या में एक संप्रदाय के लोगों के बीच सहानुभूति अर्जित करने में सफल रहा। बड़े से बड़े जन.संपर्क अधिकारी इस मामले में उससे दो-चार सबक सीख सकते हैं। तीसरे, अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की समन्वित अभियानों के बावजूद वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान के दुष्कर इलाकों में इतने साल तक अपने आपको छिपाए रखने में कामयाब रहा। ओसामा ने अपनी तिकड़मों से आम लोगों के बीच यह भावना पैदा कर दी थी कि उसे शायद ही कभी पकड़ा या मारा जा सके। इंसाफ का लंबा इंतजार लेकिन अंतत: लादेन का हश्र उसी तरह का हुआ जैसा ऐसे तत्वों का होता है और होना चाहिए। पिछले कुछ दिनों की घटनाओं पर नजर डालें तो लगता है कि सीआईए कुछ महीनों से लादेन के काफी करीब पहुंच चुका था। हाल ही में उसने बड़ी प्रामाणिकता के साथ लादेन के पाकिस्तान में मौजूद होने की बात कही थी। जवाब में अल कायदा ने भी जिस तरह उसकी आसन्न मौत पर बदला लेने की धमकी दी उसने यह संकेत दिया कि दोनों ही पक्षों को आने वाले दिनों में होने वाली किसी 'बड़ी घटना' का अहसास था। ऐसा लगता है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान में दस साल से सक्रिय होने के कारण सीआईए ने अब अफगान.पाकिस्तान सीमा क्षेत्र के बारे में पयरप्त जानकारी जुटा ली है और अब यह दुष्कर इलाका उसके लिए उतना रहस्यमय नहीं रहा। उसने पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन (मानव रहित यान) हमलों के जरिए कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, जिनमें पाकिस्तान में अलकायदा के प्रमुख बैतुल्ला महसूद और उसके बाद हकीमुल्ला महसूद की मौत प्रमुख है। अमेरिकी वायुसैनिक हमले में इराक में अलकायदा प्रमुख अबू मुसाब अल जरकावी भी मारा गया था। बड़े आतंकवादियों के विरुद्ध असरदार ड्रोन हमलों ने एक युद्धक-मशीन के रूप में भी सीआईए की साख और विश्वसनीयता को बढ़ाया है। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के हमलों में मारे गए लोगों के परिवार वालों, अनाथों और विधवाओं को आखिरकार इंसाफ मिला। इस हमले का साजिशकर्ता अमेरिकी सैनिकों के हाथों बेमौत मारा गया। अमेरिका ने इस धारणा को सही सिद्ध कर दिया कि भले ही प्रक्रिया कितनी भी लंबी और समय साध्य हो, लेकिन अंत में इंसाफ होता है। इससे दुनिया भर में लोकतांत्रिक शक्तियों का आत्मविश्वास बढ़ा है और उनके बीच एकजुटता की भावना मजबूत होगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी बरकरार है। ओसामा बिन लादेन, उसके सहयोगियों और जेहादियों को जिन प्रभावशाली लोगों, संस्थानों, फौजों और सरकारों का समर्थन हासिल है, और जो ओसामा जैसे लोगों को पनाह देते आए हैं, वे न तो खत्म हुए हैं और न ही रातोंरात उनकी विचारधारा में बदलाव आने वाला है। ओसामा को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस, पाकिस्तानी फौज और अनेक कट्टरपंथी नेताओं के साथ-साथ अफगानिस्तान और पाकिस्तान के तालिबान का भी समर्थन हासिल रहा है। विडंबना है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में पाकिस्तान अमेरिका का तथाकथित पार्टनर है, जबकि खुद पाक फौज में मौजूद लोग अफगानिस्तान में आतंकवादी हरकतों को निर्देशित करते रहे हैं। मुंबई हमलों में उनकी भूमिका का तो पर्दाफाश हो ही चुका है। अमेरिका को आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई के इस सबसे अहम पहलू से भी निपटने की जरूरत है। खासकर तब, जब वह खुद पाकिस्तान को 'आतंकवादियों का प्रजनन क्षेत्र' मानता रहा है। (प्रभासाक्षी, आज समाज और कुछ अन्य प्रकाशनों में प्रकाशित)
- बालेन्दु शर्मा दाधीचशेख हसीना के ऐतिहासिक और बेहद सफल दौरे के बावजूद खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जैसी कटु प्रतिक्रिया आई है (कि शेख हसीना ने बांग्लादेश के हितों को भारत के हाथों बेच डाला), वह दुखद तो है ही, इस बात का परिचायक भी है कि भारत भले ही कितना भी आत्मीय, मैत्रीपूर्ण, उदार एवं सदाशयी हो जाए, उसे बांग्लादेश में सार्वत्रिक स्वीकायर्ता मिलनी मुश्किल है।बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत यात्रा के दौरान कोई चार दशक बाद दोनों देशों के संबंधों में वही गर्मजोशी और अपनापन दिखाई दिया जो बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय और उसके बाद था। ठीक अड़तीस साल पहले जनवरी 1972 में जब शेख मुजीबुर्रहमान जब पाकिस्तान से रिहाई के बाद बरास्ता लंदन स्वदेश वापसी के लिए भारत होते हुए गुजरे तो इस देश ने बंगबंधु का ऐतिहासिक स्वागत किया था। ऐसा स्वागत, जिसकी मिसालें भारतीय इतिहास में बहुत कम होंगी। हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी करने के लिए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, केंद्रीय मंत्रिमंडल के सभी सदस्य और तीनों सेनाओं के प्रमुख मौजूद थे। वह बांग्लादेश और भारत की साझा सफलता, आत्मीयता और मित्रता का उत्सव था। तब शेख मुजीब ने कहा था कि भारत के लोग बांग्लादेश के सवर्श्रेष्ठ मित्र हैं और मुक्ति संग्राम के दौरान भारत ने जो कुछ किया उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
लेकिन दुर्भाग्य से बांग्लादेश सिर्फ शेख मुजीब या फिर उनकी अवामी लीग का देश ही नहीं था। शेख मुजीब की हत्या के बाद धीरे.धीरे वहां भारत को सवर्श्रेष्ठ मित्र तो क्या मित्र मानने की भावना भी क्षीण होती चली गई और कालांतर में बांग्लादेश स्वयं को नुकसान पहुंचाने की हद तक जाकर भी भारत विरोध पर आमादा हो गया। लगभग वैसा ही, जैसा लोकतंत्र की स्थापना के बाद माओवादी सरकार के शासन में नेपाल हो गया था। कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस बांग्लादेश की स्वतंत्रता के संग्राम में भारत ने अपने नागरिकों और सैनिकों को खोया, उसे खलनायक मानने वाले दलों और व्यक्तियों का वहां की राजनीति के 40 में से तीस साल तक प्रभुत्व रहा। भारत की मित्र समझी जाने वाली अवामी लीग का कायर्काल तो कुल जमा एक दशक का रहा है और उसमें वह अनेक राजनैतिक एवं प्राकृतिक समस्याओं से जूझती रही है।
शेख हसीना के ऐतिहासिक और बेहद सफल दौरे के बावजूद खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जैसी कटु प्रतिक्रिया आई है (कि शेख हसीना ने बांग्लादेश के हितों को भारत के हाथों बेच डाला), वह दुखद तो है ही, इस बात का परिचायक भी है कि भारत भले ही कितना भी आत्मीय, मैत्रीपूर्ण, उदार एवं सदाशयी हो जाए, उसे बांग्लादेश में सार्वत्रिक स्वीकायर्ता मिलनी मुश्किल है। वहां कितने दलों की राजनीति की तो बुनियाद ही भारत के अनवरत विरोध पर निर्भर है। ये दल ऐसा आभास पैदा करने में लगे रहते हैं जैसे भारतीय राजनेताओं का ज्यादातर समय बांग्लादेश के विरुद्ध साजिशें बनाने में ही गुजरता है। असलियत यह है कि भारतीय नेताओं और जनता की प्राथमिकताओं में बांग्लादेश का स्थान बहुत नीचे है और वहां क्या होता है, क्या नहीं, इससे हमारा सरोकार निरंतर कम होता चला गया है।
साझा विरासत के सहगामी
अलबत्ता, बांग्लादेश के पिछले चुनाव नतीजों ने जरूर भारत में दिलचस्पी और खुशी पैदा की जिनमें अवामी लीग को भारी समर्थन हासिल हुआ। दूसरी ओर भारत में भी केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन मजबूत हुआ है। दोतरफा स्थायित्व और अनुकूल शक्तियों के सत्ता में होने से भारत और बांग्लादेश को अपने संबंधों में नई ताजगी तथा आत्मीयता पैदा करने और आपसी संदेह दूर कर विश्वास का माहौल बनाने का ऐतिहासिक मौका मिला है। शेख हसीना की भारत यात्रा के दौरान हुए पांच समझौते, भारत की ओर से किसी भी देश को दिया गया अब तक का सबसे बड़ा ऋण और बांग्लादेशी प्रधानमंत्री को मिला हमारे सर्वोच्च अलंकरणों में से एक इंदिरा गांधी शांति एवं विकास पुरस्कार इस बात की निशानदेही करता है कि भारत अपने इस पूर्वी पड़ोसी के साथ आत्मीय संबंध बनाने के लिए कितना आतुर है। आप चाहें तो इसे हमारे पड़ोसियों के साथ गर्मजोशी बढ़ाने के चीनी प्रयासों की पृष्ठभूमि में देख सकते हैं लेकिन वास्तविकता यही है कि हमारे रुख में यह उत्कटता अनायास पैदा नहीं हुई है।
चीन और बांग्लादेश उस किस्म की साझा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक विरासत के सहगामी नहीं हैं जो भारत और बांग्लादेश के बीच है। ॰॰आखिरकार आजादी से पहले बांग्लादेश भारत का ही हिस्सा था और सुहरावर्दी और शेख मुजीब भारत के स्वाधीनता सेनानियों में भी गिने जाते हैं! ॰॰आखिरकार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, जो कि दो देशों के राष्ट्रगान के लिखने वाले विश्व के एकमात्र कवि हैं, ने भारत के साथ.साथ बांग्लादेश का ही राष्ट्रगान लिखा है। ॰॰आखिरकार बांग्लादेश वही भाषा बोलता है जो पश्चिम बंगाल। चीन और बांग्लादेश के संबंधों में क्या इस तरह की कोई कड़ी खोजी जा सकती है?
बदलाव उधर भी है
खुशी की बात है कि बदलाव की बयार सिर्फ भारत की ओर से ही नहीं बह रही, वह बांग्लादेश की ओर से भी आई है। उल्फा सहित उत्तर पूर्वी भारत के जिन अलगाववादी और आतंकवादी संगठनों को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और फौजी शासकों के राज में प्रश्रय मिला, उन्हें लेकर वहां की मौजूदा सरकार का रुख एकदम स्पष्ट है। हाल ही में रहस्योद्घाटन हुआ है कि खालिदा जिया के शासनकाल में पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपनी बांग्लादेश यात्रा के समय उल्फा नेता अनूप चेतिया से मुलाकात की थी। यह अपनी तरह की अकेली मुलाकात नहीं रही होगी। लेकिन शेख हसीना आपसी संबंधों में नए और सकारात्मक युग की शुरूआत करने की इच्छुक दिखती हैं। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में मैंने एक बार शेख हसीना का इंटरव्यू किया था। तब भी उन्होंने भारत के प्रति अपनी साझा विरासत और मुक्ति संग्राम में हमारे योगदान को लेकर भावुकतापूर्ण टिप्पणियां की थीं। तब वहां सेनाध्यक्ष से राष्ट्रपति बने जनरल इरशाद का शासन था और उनकी भूमिका बेहद सीमित थी। किंतु उन्होंने कहा था कि वे सत्ता में आईं तो आपसी संबंधों में खड़ी की गई दीवार ढहाना उनकी प्राथमिकताओं में होगा।
बांग्लादेश से निर्बाध गतिविधियां संचालित कर रहे उल्फा के अरविंद राजखोवा जैसे वरिष्ठ नेताओं को भारत के हवाले कर उन्होंने उस विश्वसनीयता और सदाशयता का परिचय दिया है जिसकी उम्मीद भारत दशकों से कर रहा था। आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट रुख जताने और बांग्लादेश की सरजमीं पर भारत विरोधी गतिविधियों को बर्दाश्त न करने की उद्घोषणा कर उन्होंने भारतीयों का दिल जीत लिया। वे भारत को दो बांग्लादेशी बंदरगाहों तक पहुंच भी उपलब्ध कराने पर सहमत हो गई हैं। दूसरी ओर भारत ने लगभग पौने पांच हजार करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता देकर जाहिर कर दिया है कि यदि उसकी आर्थिक समृद्धि का लाभ पड़ोसियों तक पहुंचता है तो इसमें उसे आपत्ति नहीं है। बांग्लादेश से आयात की जा सकने वाली वस्तुओं की सूची को व्यापक बनाकर, तिपाईमुख बांध (जिसे लेकर बांग्लादेश में पर्यावरणीय विपदाओं की आशंका जताई जाती है) का निर्माण रोककर, स्वाधीनता प्राप्ति के समय से विवादित 17000 एकड़ भूमि को बांग्लादेश के हवाले करने का फैसला करके, बिजली सप्लाई का समझौता करके अपने नए दृष्टिकोण का सबूत दिया है।
श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल आदि की ही भांति बांग्लादेश में भी यह आम धारणा रही है कि भारत अपने सभी पड़ोसी राष्ट्रों पर प्रभुत्व कायम रखना चाहता है। शायद शेख हसीना की यात्रा से वह धारणा टूटे। कोशिश रहनी चाहिए कि गलतफहमियां दूर करने का यह सिलसिला सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित न रहे, दक्षिण एशिया के अन्य देशों तक भी पहुंचे क्योंकि भारत के हित अपने पड़ोसियों की शांति, सुरक्षा और तरक्की में ही निहित हैं।
- बालेन्दु शर्मा दाधीचहमारे क्षेत्रीय दल कुछ क्षेत्रीय नेताओं के पुनर्वास के लिए स्थापित निजी कंपनियों की तरह हैं जिनमें उनके संस्थापकों तथा उनके परिवारजनों का दर्जा किसी 'पोलित ब्यूरो' के जैसा ही है। उनका फलना.फूलना भारतीय राजनीति के क्षरण, हमारे मतदाताओं के बीच जागरूकता के अभाव और हमारे लोकतंत्र की खामियों का प्रतीक है। एक ओर कल्याण सिंह ने अपने पुत्र के साथ मिलकर एक नई पार्टी बनाई और दूसरी तरफ बयानों के शहंशाह अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी में एक परिवार के दबदबे का मुद्दा उठाते हुए उसके अहम पदों से इस्तीफा दे दिया। अमर सिंह को जिस बात का अहसास इतनी देर से हुआ उसे कमोबेश हर हिंदुस्तानी कई दशकों से जानता है। और वह है क्षेत्रीय दलों पर उनके संस्थापकों तथा उनके परिवारों का दबदबा, यहां तक कि उनकी निरंकुश तानाशाही।
अमर सिंह भले ने भले ही समाजवादी पार्टी में अपनी उपेक्षा के ताजा एपीसोड के मद्देनजर परिवारवाद का मुद्दा उठाया हो, लेकिन वह तो शुरू से ही वैसी ही थी! मुलायम सिंह यादव ने जब विश्वनाथ प्रताप सिंह का साथ छोड़कर पहले चंद्रशेखर के साथ समाजवादी जनता पार्टी और फिर समाजवादी पार्टी बनाई तब उनकी वरीयताएं और सोच बहुत स्पष्ट थी। समाजवादी पृष्ठभूमि को साथ रखते हुए उन्हें उत्तर प्रदेश के जातीय एवं धार्िमक समीकरणों के आधार पर अपनी राजनीति करनी थी। हालांकि समाजवाद और जातिवाद दोनों में बहुत जबरदस्त अंतरविरोध है लेकिन मुलायम सिंह ने दोनों को ऐसा साधा कि वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और जनता दल दोनों के विकल्प बन गए। अयोध्या के घटनाक्रम के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ और जनता दल पहले ही छिन्न.भिन्न तथा विघटित हो चुका था। ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुसलमान स्वाभाविक रूप से समाजवादी पार्टी की ओर मुड़े और मुस्लिम.यादव गठजोड़ से मजबूत हुए मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने में सफल रहे। अलबत्ता, अन्य क्षेत्रीय दलों की ही भांति उनकी पार्टी में उनके अपने परिवार और उनकी जाति के लोगों की प्रधानता बनी रही। अमर सिंह सच कहते हैं कि आज भी हालात में कोई परिवर्तन नहीं आया है।
समाजवादी पार्टी तो शुरू से मुलायम सिंह यादव के परिवार की निजी पार्टी बनी हुई है। यदि अमर सिंह, अमिताभ बच्चन, जया प्रदा और अनिल अंबानी जैसे लोग भी उसमें प्रमुखता पाने में सफल रहे तो इसीलिए कि वे भी श्री यादव के मित्र या परिवारजनों के समान ही हैं। जब तक यह परिवारवाद अमर सिंह के पक्ष में था, वे कभी इसका लाभ उठाने से नहीं चूके। जब.जब उनका टकराव राज बब्बर, आजम खान आदि अन्य पार्टी नेताओं से हुआ तो मुलायम सिंह ने एक पारिवारिक सदस्य के रूप में उनका पक्ष लिया। लेकिन जब स्थिति स्वयं मुलायम सिंह यादव के निजी परिवारीजनों के साथ टकराव तक आ गई तो अमर सिंह को पार्टी प्रमुख की वास्तविक वरीयताओं का अहसास करा दिया गया। स्वयं अमर सिंह को देखिए। वे भी बहुत लंबे अरसे तक स्वयं को मुलायम सिंह के परिवार का ही सदस्य मानते रहे। जब कभी श्री यादव पर कोई आरोप लगा या वे सरकारी कुदृष्टि के शिकार हुए, उनसे पहले अमर सिंह खुद खड़े होकर उनके पक्ष में बयान देते नजर आए। अलबत्ता, पिछले साल भर में अमर सिंह का 'पारिवारिक.सदस्य' वाला दर्जा कमजोर पड़ गया है।
गलत कारणों से उठा सही मुद्दा
भले ही गलत कारणों से, लेकिन अमर सिंह ने सपा में परिवारवाद की प्रधानता का मुद्दा उठाकर सभी क्षेत्रीय दलों की स्थिति की ओर ध्यान खींचा है। इसे भारतीय राजनीति का दुभ्राग्य कहें, या कुछ राज्यों के राजनैतिक क्षत्रपों का सौभाग्य कि वे कोई सुस्पष्ट वैचारिक पृष्ठभूमि या सिद्धांतों की गैर.मौजूदगी में भी अपने.अपने राज्य में क्षेत्रीय दल खड़े करने तथा उन्हें सत्ता में लाने में सफल रहे। सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही क्यों, लालू प्रसाद यादव का राजद, मायावती की बसपा, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, ओम प्रकाश चौटाला का इनेलो, अजित सिंह का रालोद, शिबू सोरेन का झामुमो, उमा भारती की भाजश, बाल ठाकरे की शिव सेना, करुणानिधि की द्रमुक, जयललिता की अन्नाद्रमुक, रामविलास पासवान की लोजपा और यहां तक कि हाल ही में गठित चिरंजीवी की प्रजा राज्यम तक वैसी ही पार्िटयां हैं। इनमें से बहुत कम दल किसी सुस्पष्ट राजनैतिक विचारधारा के पालन के लिए कटिबद्ध हैं। उनका नेतृत्व उन्हीं परिवारों के हाथ में रहेगा, जिन्होंने उनकी स्थापना की।
वास्तव में ये दल कुछ क्षेत्रीय नेताओं के पुनर्वास के लिए स्थापित निजी कंपनियों की तरह हैं जिनमें उनके संस्थापकों तथा उनके परिवारजनों का दर्जा किसी 'पोलित ब्यूरो' के जैसा ही है। भले ही राष्ट्रीय राजनीति हो या प्रादेशिक राजनीति, इन पार्िटयों का पहला लक्ष्य अपने संस्थापक परिवारों के हितों की रक्षा करना ही है, और रहेगा। इसके लिए जरूरत पड़ने पर वे जातिवादी, क्षेत्रवादी, भाषायी या धार्िमक राजनीति करने से पीछे नहीं हटते। आंध्र प्रदेश में जिस तरह क्षेत्रीय दलों के बीच तेलंगाना के मुद्दे का समर्थन करने के लिए अचानक होड़ मच गई है, उससे क्षेत्रीय दलों की सैद्धांतिक प्रतिबद्धताओं का अंदाजा लग जाता है। तेलुगूदेशम और प्रजा राज्यम जैसे क्षेत्रीय दल जो कुछ दिन पहले तक तेलंगाना के विरोधी थे, अचानक इसके समर्थक हो गए हैं। उधर झारखंड में जो झामुमो भाजपा की 'सांप्रदाियक' राजनीति का विरोध करता था, आज वह उसी के साथ सरकार बना चुका है। मायावती भी ऐसा कर चुकी हैं और नवीन पटनायक का बीजू जनता दल भी। नेशनल कांफ्रेंस, तृणमूल कांग्रेस, रालोद और लोजपा जैसे दल तो लगभग हर चुनाव में सिद्ध कर देते हैं कि उनकी कोई राजनैतिक विचारधारा नहीं है और यदि कोई है भी तो वे उसे सत्ताधारी दलों के पक्ष में बड़ी सफाई से 'परिमार्िजत' करने में सक्षम हैं। ऐसे दलों का फलना.फूलना भारतीय राजनीति के क्षरण, हमारे मतदाताओं के बीच जागरूकता के अभाव और हमारे लोकतंत्र की खामियों का प्रतीक है। लेकिन यही सत्य है।
परिवार ही वरीयता
क्षेत्रीय दलों की एक मजेदार बात यह है कि उनके नेतृत्व की पहली पंक्ति के बारे में किसी तरह का शक.सुबहा या विवाद हो ही नहीं सकता। न ही उनके द्वारा चुनावों में खड़े किए जाने वाले उम्मीदवारों को लेकर कोई प्रतिवाद संभव है। क्योंकि ये सभी निण्रय सिर्फ एक व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं और यदि वह इस प्रक्रिया में अन्य लोगों की राय लेता भी है तो महज औपचारिकतावश। दोनों पक्ष जानते हैं कि इस सलाह का महत्व कितना क्षणिक है। भले ही उनमें से कुछ दल समाजवादी या साम्यवादी विचारधारा के साथ अपने जुड़ाव के दावे करें, उनकी राजनीति में लोकतंत्र, समता या सामूहिकता के तत्व कहीं दिखाई नहीं देते। यह अलग बात है कि अपनी सुविधा के अनुसार बीच.बीच में मुख्यधारा के साम्यवादी दल भी निरंकुश पारिवारिक प्रभुत्व से ग्रस्त इन दलों को साथ लेने में नहीं झिझकते।
यदि ये दल वास्तव में लोकतांत्रिक होते तो क्या अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल ने फिरोजाबाद से चुनाव लड़ा होता? समाजवादी पार्टी ने आधिकारिक रूप से कहा था कि फिरोजाबाद की जनता की निरंतर मांग के कारण ही डिम्पल को राजनीति में आना पड़ रहा है। शायद मुलायम सिंह यादव खुद भी डिम्पल यादव के नेतृत्व की उन क्षमताओं से परिचित नहीं होंगे जिनकी पहचान, जैसा कि उनकी पार्टी के दावे से स्पष्ट है, फिरोजाबाद की जनता ने कर ली थी। यह अलग बात है कि स्वयं अमर सिंह को भी डिम्पल यादव की उम्मीदवारी से कोई ऐतराज नहीं था बल्कि उन्होंने तो शिकायत की कि उन्हें फिरोजाबाद में अपनी बहू के पक्ष में प्रचार करने का पूरा मौका नहीं मिला।
बहरहाल, पार्टी नेतृत्वों द्वारा देखे गए इसी तरह के अद्वितीय 'नेतृत्वकारी गुणों' के कारण बिहार में राबड़ी देवी सत्ता में आती हैं, राज ठाकरे के सारे राजनैतिक अनुभव पर उद्धव ठाकरे को वरीयता दे दी जाती है और करुणानिधि को लगता है कि उनकी सभी पत्नियों से उत्पन्न संतानें केंद्र सरकार में महत्वपूण्र पद संभालने के लायक हैं। कल्याण सिंह भी यह मानते हैं कि उनके सुपुत्र राजवीर सिंह उर्फ राजू, जो कि 'किसी भी दल के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष' हैं, उत्तर प्रदेश की जनता के हितों की रक्षा करने के लिए सबसे सक्षम हैं।
भारत का भविष्य परिवारवाद और निजी हितों की बुनियाद पर खड़े क्षेत्रीय दलों में नहीं हो सकता। हालांकि कुछ वर्ष पहले इसी क्षेत्रीयता को वास्तविक राष्ट्रीयता माना गया था और तब यह दलील दी गई थी कि निचले स्तर से उठकर आने वाले नेता ही वास्तविक भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन इसके चलते यदि कोई साधु यादव, कोई अजय चौटाला, कोई डिम्पल यादव और कोई हेमंत सोरेन ही हमारे लोकतंत्र के भाग्यविधाता बनने का अधिक बड़ा अधिकार रखते हैं तो शायद क्षेत्रीयता को राष्ट्रीयता मानने वाली इस सोच में बड़ा खोट है। विचारधारा, योग्यता, लोकतंत्र और मूल्यों से दूर का रिश्ता रखने वाले ऐसे दलों से तो कांग्रेस, भाजपा और कम्युनिस्टों जैसे राष्ट्रीय दल ही अच्छे। माना कि उनमें भी तमाम कमजोरियां हैं और परिवारवाद तथा अवसरवाद से वे भी पूरी तरह मुक्त नहीं, मगर वे इधर या उधर, किसी विचारधारा पर तो टिकते हैं।
विद्रोही तेवर और वैचारिक गहनता के लिए जाने जाने वाले प्रभाष जोशी ने नए पत्रकारों के साथ जनसत्ता शुरू किया और उसे भारतीय पत्रकारिता के बेहद लोकप्रिय, पठनीय एवं प्रबल प्रतीक में बदल दिया।- बालेन्दु शर्मा दाधीचमैंने राजस्थान पत्रिका में अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की थी। मेरे लिए वह सीखने का समय था और 'पत्रिका' के दफ्तर में आने वाले प्रांतीय एवं राष्ट्रीय अखबारों को पढ़ने के लिए हम युवा मित्रों में होड़ सी लगी रहती थी। लेकिन अखबारों के गट्ठर में जिस अखबार को उठाने के लिए हम सबसे पहले लपकते थे, वह था- 'जनसत्ता।' दर्जन भर अखबारों के बीच वह अलग ही दिखाई देता। बहुत प्रबल उपस्थिति थी उसकी। प्रभाषजी के संपादन में निकले इस नए अखबार ने कुछ ही महीनों में देश भर में युवकों को आकर्षित कर लिया था। जहां हिंदी पत्रकारिता में हम सब एक सी लीक पीटने में लगे हुए थे और रोजमर्रा की खबरों को किसी तरह आकर्षक ले-आउट (अखबार का डिजाइन) में चिपका देने को ही बहुत बड़ी सफलता माने बैठे थे वहीं जनसत्ता ने हम सबको बड़ा झटका दिया था। सिर्फ पाठकों को ही नहीं, प्रबंधकों को भी, पत्रकारों को भी, संपादकों को भी और नेताओं को भी।
हिंदी पत्रकारिता के लिए लगभग ठहराव के से उस जमाने में स्व॰ प्रभाष जोशी ने हमें झकझोर कर बताया कि सब कुछ ठहरा हुआ नहीं है। हिंदी में भी नया करने के लिए असीमित गुंजाइश मौजूद है। 'जनसत्ता' से हमने जाना कि अखबार क्या होता है, छपे हुए शब्दों की ताकत क्या होती है, इनोवेशन (नवीनता) क्या होता है। ऐसा लगता था जैसे हर खबर किसी भट्टी में तप कर खरा सोना बनकर निकली है। एक-एक शब्द का महत्व था। सामान्य सी खबरें जब जनसत्ता में छपती थीं तो दिलचस्प हो जाती थीं। रोजमर्रा की घटनाओं के पीछे व्यापक अर्थ दिखाई देने लगते थे। कितनी सरल, देसज, किंतु दमदार भाषा! कितना चुस्त संपादन! खबरों का कितना सटीक चयन! कितनी निष्पक्षता और कितनी निडरता!
प्रभाषजी के जनसत्ता को हम लगभग उतनी ही तल्लीनता के साथ पढ़ते थे जैसे जेम्स बांड का कोई उपन्यास पढ़ रहे हों। रोज उसके आगमन का वैसे ही इंतजार करते थे जैसे कि छुट्टी पर घर लौटने वाला नया-नवेला रंगरूट विलंब से चल रही रेलगाड़ी का करता है। यह एक चमत्कार था। लगता था, स्वाधीनता आंदोलन के लंबे अरसे बाद पत्रकारिता का गौरवशाली युग लौट आया था। इस सबके पीछे जादू था प्रभाष जोशी का, जो योजनाकार, प्रबंधक, संपादक, भाषा-शास्त्री, एक्टिविस्ट, डिजाइनर और टीम-लीडर जैसी कितनी ही भूमिकाएं एक साथ, एक जैसी कुशलता के साथ निभा रहे थे। पत्रकारिता की जनसत्ता शैली आज प्रिंट से लेकर टेलीविजन और ऑनलाइन मीडिया तक फैल चुकी है। उस शैली के शिल्पकार प्रभाष जोशी ही थे।
निष्पक्षता की हद!
राजस्थान पत्रिका के बीकानेर संस्करण में बतौर डेस्क इंचार्ज काम करते हुए मैंने इंडियन एक्सप्रेस समूह पर सीबीआई के छापे की खबर पढ़ी। यह देखकर मैं भौंचक्का रह गया कि 'जनसत्ता' ने अपने प्रभात संस्करण में यह खबर एजेंसी के माध्यम से दी थी। प्रभाषजी निष्पक्षता के लिए इस हद तक जा सकते हैं कि खुद अपने ही प्रतिष्ठान पर हुए हमले की खबर दूसरे स्रोतों के जरिए छापें! ऐसा उदाहरण मैंने कोई और नहीं देखा जब किसी संस्थान ने खुद अपने बारे में भी तटस्थ माध्यम से खबर दी हो। रिलायंस और बोफर्स जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार के विरुद्ध खड़े होने का परिणाम एक्सप्रेस समूह ने लंबे समय तक भोगा था। लेकिन प्रभाषजी का 'जनसत्ता' दमन का सामना करते हुए भी सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के पत्रकारीय मानदंडों को नहीं भूला।
मैंने इसी घटना से प्रभावित होकर, प्रभाषजी की टीम का हिस्सा बनने का सपना देखा था। सच की लड़ाई में मेरे जैसे कई युवक उनके साथ खड़े होना चाहते थे। संयोगवश, कुछ महीने बाद मुझे इसका अवसर भी मिला जब 'जनसत्ता' ने नए लोगों की भर्ती का विज्ञापन निकाला। अखबार में चयनित होने के बाद हर दिन प्रभाषजी से कुछ न कुछ सीखा- कभी सीधे, तो कभी परोक्ष रूप में।
कमाल का आदर्शवाद था उनका- जनसत्ता को आम आदमी की आवाज बनना है। सिर्फ उसी के प्रति जवाबदेह हैं हम। हमें प्रतिष्ठान पर अंकुश लगाने वाले जन.माध्यम की भूमिका निभानी है। व्यक्तिवाद के लिए कहीं जगह नहीं थी। निर्देश था कि प्रभाषजी से जुड़े आयोजनों की खबरें 'जनसत्ता' में नहीं छपेंगी। वह भी क्या जमाना था! रामनाथ गोयनका जैसे फायरब्रैंड अखबार मालिक और प्रभाष जोशी तथा अरुण शौरी (इंडियन एक्सप्रेस) जैसे संपादक। अरुण शौरी भले ही कई मायनों में बड़े पत्रकार, राजनीतिज्ञ और लेखक रहे हों लेकिन प्रभाष जी की बात कुछ और थी। उनकी सोच, ज्ञान, प्रतिभा और क्षमताओं का दायरा कहीं बड़ा और विस्तृत था।
'जनसत्ता' जो भी लिखता, बड़े अधिकार एवं प्रामाणिकता के साथ लिखता। खबर किसके पक्ष में है और किसके खिलाफ, यह कभी किसी ने नहीं सोचा। अगर कुछ गलत है तो उसका प्रबलता से विरोध करना है। भले ही परिणाम जो भी हो। और अगर कोई सही है तो उसके साथ खड़े होने में संकोच एक किस्म का अपराध है। मुझ जैसे पत्रकारों, जिन्हें जनसत्ता की सफलता के दौर में वहां प्रशिक्षण पाने का मौका मिला, को प्रभाषजी के दिए संस्कारों, उनके सिखाए मूल्यों और आदर्शों से इतना कुछ मिला है कि वह जीवन भर हमारे मार्ग को निर्देशित करेगा। नए-नवेले पत्रकारों की टीम को सिर्फ पत्रकारिता, भाषा और प्रयोगवाद की दीक्षा ही नहीं दी, सार्थक जीवन के मायने भी सिखाए।
वे बदलाव चाहते थे
वे सिर्फ सुयोग्य ही नहीं थे। वे सिर्फ प्रतिबद्ध मात्र भी नहीं थे। वे समाज और राजनीति में बदलाव लाने के लिए बेचैन एक्टिविस्ट भी थे। वे समाज में बड़ा बदलाव लाना चाहते थे. उसे सकारात्मक, समावेशी, उदार, जीवंत बनाने के लिए योगदान देना चाहते थे। उन्हें अखबार की दुनिया से बाहर आकर कोई बड़ी भूमिका निभाने का मौका नहीं मिला। यदि मिलता तो शायद वह एक अलग अध्याय होता। उनकी विचारधारा पर गांधी का गहरा असर था। लेकिन प्रभाषजी में ऐसा बहुत कुछ था जो उनका अपना था। बहुत मौलिक, गहन मंथन और अनुभवों के बाद निकला हुआ। 'जनसत्ता' के पन्नों पर कभी यह उनके खून खौला देने वाले विशेष मुखपृष्ठ संपादकीय में दिखता था (ऐसे संपादकीय स्व॰ इंदिरा गांधी और स्व॰ राजीव गांधी सरकारों की ज्यादतियों के प्रति एक्सप्रेस समूह के प्रबल प्रतिरोध की अभिव्यक्ति होते थे), तो कभी साहित्यिक गहराई एवं शिल्प-कौशल से परिमार्जित उनके स्तंभों 'मसि-कागद' एवं 'कागद-कारे' में। उनकी लेखन क्षमता को देखकर हैरानी होती थी। साफ-सुंदर, जमा-जमा कर लिखे गए शब्द, जिनकी शिरोरेखाएं घुमावदार होती थीं। एक के बाद एक कितने ही पन्ने लिखते चले जाते थे। जब वे क्रिकेट विश्व कप का कवरेज करने गए तो इतना कुछ लिखा कि दो-तीन किताबें छप जाएं। और सब का सब बेहद दिलचस्प, एक्सक्लूजिव और तेज! लगभग साठ साल की उम्र में उन्होंने ऐसी रिपोर्टिंग की जिसकी उम्मीद नौजवान रिपोर्टरों से नहीं की जा सकती।
हिंदी पत्रकारिता के प्रति उनका योगदान इतना अधिक है कि उन्हें आधुनिक हिंदी पत्रकारिता का पर्याय समझा जाने लगा था। लोकप्रियता का आलम वह कि 'जनसत्ता' हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी अखबारों से भी होड़ लेता था। शायद ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी हिंदी अखबार के संपादक को विशेष संपादकीय लिखकर अपने पाठकों से अनुरोध करना पड़ा हो कि अब वे अखबार को मिल-बांटकर पढ़ें क्योंकि हमारी मशीनों में इतनी क्षमता नहीं कि वे छपाई की और अधिक मांग पूरी कर सकें।
विद्रोही तेवर और वैचारिक गहनता का प्रतीक जनसत्ता धीरे-धीरे भारतीय पत्रकारिता के सबसे लोकप्रिय, पठनीय एवं प्रबल प्रतीकों में बदल गया था। वहां सनसनीखेज पत्रकारिता नहीं थी, जन-सरोकारों को आगे बढ़ाने वाली पत्रकारिता थी। यह प्रभाषजी के नेतृत्व का ही परिणाम था कि दिल्ली के सिख विरोधी दंगों के दौरान जनसत्ता ने सर्वत्र व्यापी उन्माद के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाया और दंगापीङ़ितों के पक्ष में पत्रकारिता की। अब वह सब हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का हिस्सा है। अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के विरोध में उन्होंने अडिग स्टैंड लिया और जीवन पर्यंत उस पर कायम रहे। उस समय हुए दंगों के विरोध में रविवारी जनसत्ता में मंगलेश जी (डबराल) ने विशेष अंक निकाला था जिसमें प्रभाषजी और गिरधर राठी के साथ-साथ मैंने भी एक लेख लिखा था और प्रतिक्रिया में उन्हें ढेरों धमकी भरे पत्र मिले थे तो कुछ मेरे हिस्से में भी आए थे। पीड़ित, दमित और वंचित लोगों के हक में खड़े होने की बातें करते तो बहुत हैं लेकिन व्यावहारिकता की सीमाओं से ऊपर उठकर कितने लोग वास्तव में ऐसा करते हैं? प्रभाषजी ने दिखाया कि पत्रकारिता के उद्देश्यों और सार्थकता के बारे में जो कुछ हमने पढ़ा था वह सिर्फ किताबी नहीं था। सब जगह से निराश, हारे-थके व्यक्ति के लिए उन दिनों एक ठिकाना जरूर था, और वह था जनसत्ता।
प्रभाषजी नहीं रहे। लेकिन उनके संस्कार तो हैं! उनके जीवन-मूल्य तो हैं! प्रभाषजी की तराशी हुई टीम तो है, भले ही अलग-अलग स्थानों पर और अलग-अलग भूमिकाओं में। वह उनके सिखाए को आगे बढ़ाएगी। अपने विचारों और मूल्यों के रूप में प्रभाषजी सदा हमारे बीच रहेंगे- एक मार्गदर्शक बनकर।
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