Saturday, May 14, 2011

...और अंत में मतदाता का इंसाफ

बालेन्दु शर्मा दाधीच:

पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव नतीजों ने द्रमुक नेता एम करुणानिधि को छोड़कर शायद ही किसी को चौंकाया हो। वे चुनावी हार झेलने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं दिखते थे। भ्रष्टाचार और भाई.भतीजावाद के आरोपों से घिरे इस वयोवृद्ध नेता को चुनावी जीत की सबसे ज्यादा जरूरत थी तो शायद आज जब कानून का शिकंजा उनके परिवार तक आ पहुंचा है। मतदाताओं को लुभाने के लिए हर किस्म के वायदे करने और चुनाव प्रचार में अपनी सारी ताकत झोंकने के बावजूद द्रमुक न सिर्फ पराजित हो गई बल्कि अपनी पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक की तुलना में एक चौथाई से भी कम सीटों पर आ गिरी। देश के सर्वाधिक अनुभवी और जनाधार वाले नेताओं में से एक करुणानिधि के सक्रिय राजनैतिक जीवन का संभवत: यह अंतिम विधानसभा चुनाव था, जिसने उन्हें एक कटु कालखंड की दिशा में धकेल दिया है।

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव नतीजों ने दो महिलाओं के नेतृत्व में दो बड़ी राजनैतिक क्रांतियों को अंजाम दिया है। दो ऐसे दिग्गजों को हाशिये से परे धकेल दिया गया, जिन्हें चुनौती देना कल तक असंभव सा था।


पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों का लगभग वही हश्र हुआ जैसा तमिलनाडु में द्रमुक का। अपने कैडर के दम पर लगभग तीन दशकों से राज्य की सत्ता में वाम मोर्चे को हरा पाना ममता बनर्जी जैसी जीवट की नेता के ही बस का था, जिन्होंने माकपा को उसी की भाषा में जवाब देने की हिम्मत दिखाई और इतने लंबे अरसे तक अपने संघर्ष को जिंदा रखने में कामयाब रहीं। अपनी समृद्ध प्राकृतिक और खनिज संपदा के बावजूद पश्चिम बंगाल की गिनती पिछड़े राज्यों में होती रही है। व्यापक गरीबी और माकपा कैडर के आतंक के बावजूद हर चुनाव में वाम मोर्चा जीत कर आता रहा तो दो कारणों से। पहला, मतदाता के सामने ऐसा कोई दमदार विकल्प मौजूद नहीं था जो राज्य के सर्वशक्तिमान वाम मोर्चे के लिए मजबूत चुनौती खड़ी कर सके। दूसरा, दौरान माकपा कैडर के हिंसक तौरतरीकों ने नियमित रूप से मतदान प्रक्रिया और चुनाव परिणामों को प्रभावित किया। इस बार स्थितियां अलग थीं और ममता बनर्जी का परिवर्तन का नारा जन.आकांक्षाओं से मेल खाता था। सिंगुर और नंदीग्राम की घटनाओं के बाद तृणमूल कांग्रेस ने सिद्ध किया कि वह एक मजबूत ताकत है जो राजनीति और स्थानीय स्तर पर वाम कैडर को उसी के अंदाज में जवाब देने में सक्षम है। इस प्रक्रिया में उन्होंने माओवादियों को साथ लेने जैसा अलोकप्रिय कदम भी उठाया लेकिन पिछले चार.पांच साल में ममता बनर्जी की लगभग हर रणनीति अनुकूल सिद्ध हुई। स्थानीय निकायों के चुनावों से ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में आसन्न बदलाव का संकेत मिल गया था। यह ममता की बड़ी कामयाबी है कि केंद्र में रेल मंत्री का पद संभालने के बावजूद वे पश्चिम बंगाल में ही टिकी रहीं और राज्य सरकार के प्रति उपजे असंतोष को ठंडा नहीं पड़ने दिया। रही सही कसर चुनाव आयोग ने पूरी कर दी जिसने शांतिपूण्र और अनुशासित मतदान सुनिश्चित कर चुनावी हिंसा और धांधली की गुंजाइश खत्म कर दी। इस बार राज्य में रिकॉर्ड मतदान हुआ, जिसका तृणमूल.कांग्रेस गठजोड़ को स्पष्ट लाभ पहुंचा।

असम में कांग्रेस का लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना बड़ी घटना है। छोटे राज्यों का मतदाता आम तौर पर हर चुनाव में सरकार बदल देता है। लेकिन धीरे.धीरे हमारी राजनीति में यह ट्रेंड बदल रहा है जो कई भाजपा शासित राज्य और कुछ कांग्रेस शासित राज्य पहले भी सिद्ध कर चुके हैं। लोग विकास और ज्वलंत मुद्दों पर ठंडे दिमाग से सोचकर फैसले करने लगे हैं। राज्य में विपक्ष की स्थिति बहुत कमजोर है। भारतीय जनता पार्टी का आधार सीमित है और असम गण परिषद अपने राजनैतिक अंतरविरोधों से बाहर निकलने और अपना पुराना आधार फिर से अर्जित करने में नाकाम रही है। असम की जनता के लिए मौजूदा हालात में अलगाववाद का मुद्दा भाजपा के बांग्लादेशी नागरिकों के मुद्दे से ज्यादा महत्वपूण्र है। उल्फा, बोडो और दूसरे उग्रवादियों के हाथों हजारों निर्दोष नागरिकों को खोने वाले असम को अब हिंसा और अस्थिरता से मुक्ति चाहिए। कई साल की नाकामियों के बाद तरुण गोगोई सरकार उग्रवादी गतिविधियों को नियंत्रित करने में सफल हुई है। उल्फा के साथ सुलह के संदभ्र में हाल के महीनों में कुछ बड़ी कामयाबियां हासिल हुई हैं जिन्होंने इस समस्या के स्थायी समाधान की उम्मीद जगाई है। वहां बिखरे हुए विपक्ष और उग्रवाद विरोधी कामयाबियों ने मतदाता के फैसले को प्रभावित किया है।

कांग्रेस के लिए मिश्रित नतीजे

पांडिचेरी आम तौर पर तमिलनाडु के चुनावी ट्रेंड्स के अनुकूल प्रदर्शन करता है। वहां इस बार भी कमोबेश वही सूरत दिखाई दे रही है। और हर चुनाव में पत्ते बदलने वाला केरल भी अपनी परंपरा पर कायम रहा। हालांकि वहां कांग्रेस की जीत का अंतर बहुत कम रहा। एमएस अच्युतानंदन की निजी छवि ने नतीजों को प्रभावित किया। कांग्रेस को अपने महासचिव राहुल गांधी की सक्रियता से लाभ मिला अन्यथा वहां हालात कुछ और भी हो सकते थे। बहरहाल, अपने प्रभाव वाले तीन में से दो राज्यों की सत्ता गंवा देना माकपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए शुभ संकेत लेकर नहीं आया है। प्रकाश करात के महासचिव बनने के बाद पार्टी के लिए शुरू हुआ गिरावट का सिलसिला अपनी परिणति पर पहुंच गया है। लोकसभा में पहले ही रसातल पर जा पहुंची यह पार्टी सिर्फ त्रिपुरा में सत्ता में रह गई है। पश्चिम बंगाल में सत्ता से बेदखल होना उसके भविष्य के लिए अशुभ संकेत देता है क्योंकि पार्टी को उसकी राजनैतिक, आर्िथक और वैचारिक शक्ति वहीं से मिलती है। वहां जनाधार खोने के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर अप्रासंगिक होने की ओर बढ़ रही है। आने वाले दिनों में यह पार्टी के आंतरिक संगठन को भी प्रभावित करेगा।

कांग्रेस के लिए चुनाव नतीजे मिश्रित उपलब्धियों वाले रहे। पार्टी को उम्मीद थी कि पांचों राज्यों में चुनाव नतीजे उसके अनुकूल रहेंगे। लेकिन अंतत: संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को तीन राज्यों की जनता से ही मंजूरी मिली। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को पछतावा हो रहा होगा कि उसने न सिर्फ कुछ महीने पहले तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ गठजोड़ का मौका खो दिया बल्कि पार्टी के शीर्ष नेताओं ने द्रमुक के साथ चुनाव सभाओं में हिस्सा लेकर निकट भविष्य में भी अन्नाद्रमुक को साथ लेने की संभावना खत्म कर दी। द्रमुक की गिरती छवि, पार्टी के आंतरिक संघर्ष और बढ़ती अलोकिप्रयता के बावजूद सोनिया गांधी और डॉ॰ मनमोहन सिंह ने तमिलनाडु में चुनाव प्रचार किया और द्रमुक नेताओं के साथ मंच साझा किया। वह न सिर्फ मतदाता का मानस पढ़ने में नाकामयाब रहा बल्कि उसने इस तथ्य को भी नजरंदाज कर दिया कि पिछली बार को छोड़कर तमिलनाडु में प्राय: हर चुनाव में सत्ताधारी बदल जाते हैं। जिस तरह 2जी स्पेक्ट्रम में कानून के हाथ स्वयं करुणानिधि के परिवार तक जा पहुंचे हैं और पूवर् केंद्रीय मंत्री ए राजा जेल की सलाखों के पीछे हैं, उस स्थिति में मतदाता से समर्थन की उम्मीद लगाना अव्यावहारिक होता।

आने वाले दिनों के संकेत



देश के मुख्य विपक्षी दल भाजपा के लिए इन चुनावों में कुछ विशेष नहीं था फिर भी नतीजों ने उसे निराश ही किया होगा। पार्टी असम के चुनाव प्रचार में जमकर ऊर्जा झोंकी थी और वहां मुख्य विपक्षी दल बनने को लेकर आश्वस्त थी। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि राज्य विधानसभा में उसकी सीटें पिछली बार की तुलना में आधी से भी कम हो गई हैं। पश्चिम बंगाल में जरूर वह अपना खाता खोलने में सफल रही लेकिन वोटों के प्रतिशत में गिरावट के साथ। पिछले कुछ वषर्ों से पार्टी केरल पर भी काफी उत्साह के साथ फोकस कर रही है लेकिन फिलहाल वहां का मतदाता पड़ोसी कर्नाटक की तरह भाजपा के प्रति सहज नहीं हो सका है। तमिलनाडु और पांडिचेरी में भी पार्टी की कोई भूमिका नहीं है। इन चुनावों ने यह प्रश्न एक बार फिर खड़ा कर दिया कि क्या मौजूदा हालात में पार्टी अगले लोकसभा चुनावों में सत्ता में लौटने की उम्मीद रख सकती है? केंद्र में सत्तारूढ़ संप्रग गठबंधन की लोकिप्रयता का क्षरण जरूर हो रहा है, भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे ने आम जनमानस को भी झकझोरा है लेकिन क्या भाजपा इस माहौल का राजनैतिक लाभ उठाने की स्थिति में है? पांच राज्यों के चुनावों में उसका नामो.निशान तक न होना स्पष्ट करता है कि वह देश के बड़े भूभाग में उसकी राजनैतिक भूमिका बहुत सीमित है। अन्नाद्रमुक अब उसके साथ नहीं है और चंद्रबाबू नायडू भी दूरी बना चुके हैं। उत्तर प्रदेश में पार्टी के लिए स्थितियां बहुत विकट हैं। और तो और पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश सहित विधानसभा चुनावों के अगले दौर में भी उसे नुकसान हो सकता है। इन हालात में 2014 के चुनावों से पहले राष्ट्रीय राजनीति में बनने वाला माहौल भाजपा के पक्ष में बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन के अनुकूल होगा या नहीं, कहना मुश्किल है।

एक बार फिर पश्चिम बंगाल की की चर्चा, जहां की राजनैतिक सूरत बदलने जा रही है। वहां ममता बनर्जी का सत्ता में आना जमीनी स्तर पर क्या बदलाव लाएगा, इस बारे में सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं। एक संघर्षवान राजनेता के रूप में ममता बनर्जी की क्षमता अद्वितीय रही है। आम लोगों के साथ जुड़ाव और जनसमस्याओं के प्रति उनकी समझ को लेकर भी कोई संदेह नहीं है। लेकिन एक मंत्री और प्रशासक के रूप में उनकी भूमिका कई सवाल खड़े करती है। हजारों करोड़ रुपए के कर्ज में दबे पश्चिम बंगाल की जनता को उनसे इतनी उम्मीद तो जरूर है कि वे राज्य में विकास की नई प्रक्रिया शुरू करेंगी और उसे हिंसा तथा अराजकता से मुक्त कराएंगी। सवाल यहीं खड़े होते हैं। सिंगुर में टाटा नैनो का कारखाना बंद करवाकर और भारतीय रेलवे को ढीले.ढाले ढंग से चलाकर उन्होंने बहुत अनुकूल संकेत नहीं दिए हैं। आज जबकि वे मुख्यमंत्री के रूप में पश्चिम बंगाल की कमान संभालने जा रही हैं, नई सरकार को लेकर कई ज्वलंत सवाल उपज रहे हैं। विकास के लिए ममता बनर्जी का मॉडल क्या होगा? क्या वे किसानों और उद्योगपतियों के हितों के बीच सामंजस्य पैदा कर पाएंगी? क्या उनके लोकलुभावन रेल बजटों की तरह राज्य में उनकी नीतियां और कायर्क्रम भी लोक.लुभावन ही होंगे या वे किसी विकास की किसी ठोस योजना पर आधारित होंगे? केंद्र सरकार के साथ उनके रिश्ते कैसे रहेंगे? राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन, दोनों के साथ गठबंधन के दिनों में वे अपनी मांगों पर कोई नरमी नहीं दिखाने वाली नेता के रूप में ही दिखी हैं। तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक मामलों में भी वे कठोर नेता के रूप में पेश आई हैं जिन्होंने दूसरी कतार के नेतृत्व को प्रोत्साहित नहीं किया है। नई मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें न सिर्फ इन सवालों के जवाब देने हैं, बल्कि पश्चिम बंगाल को पड़ोसी बिहार की तरह विकास की पटरी पर लाने के लिए दूरगामी विज़न, राजनैतिक लचीलापन और प्रशासनिक क्षमता भी दिखानी है।

5 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

नई चुनौतियों के साथ विकास को गति देने की कवायद ममता कहाँ तक कर पाएंगीं देखने की बात रहेगी...... बहुत उम्दा विवेचन किया आपने .....

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बालेन्दु शर्मा दाधीचः नई दिल्ली से संचालित लोकप्रिय हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक। नए मीडिया में खास दिलचस्पी। हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी को करीब लाने के प्रयासों में भी थोड़ी सी भूमिका। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन से पुरस्कृत। अक्षरम आईटी अवार्ड और हिंदी अकादमी का 'ज्ञान प्रौद्योगिकी पुरस्कार' प्राप्त। माइक्रोसॉफ्ट एमवीपी एलुमिनी।
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- संशोधकः विकृत यूनिकोड संशोधक
- मतान्तरः राजनैतिक ब्लॉग
- आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, 2007, न्यूयॉर्क

ईमेलः baalendu@yahoo.com