Friday, August 14, 2009

वह हमारी ताकत है जिसे चीन कमजोरी समझता है

चीनी सामरिक विशेषज्ञ आज की बदली हुई भू.राजनैतिक परिस्थितियों से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं जब उनका 'शत्रु' 1950 के दशक के जंग लगे टैंकों और विमानों के युग से बहुत आगे आ चुका है। वह एक परमाणु शक्ति है और महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति भी।

-बालेन्दु शर्मा दाधीच

चीन से लौटकर आने वाले मित्रों से यह सुनना सुखद लगता था कि आम चीनी नागरिक के मन में भारत के प्रति शत्रुता नहीं बल्कि सम्मान का भाव है। शत्रुता या प्रतिद्वंद्विता यदि है तो चीन सरकार, वहां की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के स्तर पर। लेकिन यदा.कदा चीनी सुरक्षा विशेषज्ञों, राजनेताओं और मीडिया की ओर से भारत के बारे में की जाने वाली आक्रामक और बहुधा अपमानजनक टिप्पणियां पढ़कर तथाकथित चीनी.सदाशयता की खुशफहमी काफूर हो जाती है। आम भारतीय चीन को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हुए भी, अब तक के आहत करने वाले अनुभवों के बावजूद, उसके साथ मित्रता का हिमायती है। लेकिन उसके सामने यक्ष.प्रश्न यह है कि क्या चीनी राज्यतंत्र, और उससे भी अहम वहां का आम नागरिक भी ऐसा ही सोचता है?

एक चीनी थिंक.टैंक की वेबसाइट पर डाला गया यह सामरिक विश्लेषण कि भारत को 20 से 30 टुकड़ों में विभाजित कर दिया जाना चाहिए, इस बारे में कोई सुखद या आश्वस्तिकारक अनुभूति प्रदान नहीं करता। झान ली नामक एक विश्लेषक ने लिखा है कि भारत पारंपरिक रूप से एक राष्ट्र नहीं है बल्कि बहुत सारी स्वतंत्र राष्ट्रीयताओं का अनमेल मिश्रण है जिसे 'जरा सी कोशिश करके' खंड.खंड किया जा सकता है। वे चीन सरकार से आग्रह करते हैं कि असम, तमिलनाडु, कश्मीर, नगालैंड आदि राज्यों में मौजूद राष्ट्रवादी और अलगाववादी शक्तियों को समर्थन देकर और भारत के पड़ोसी राष्ट्रों (जिन्हें वे चीन के मित्र करार देते हैं) की थोड़ी सी मदद से उन्हें यह 'शुभ कायर्' कर डालना चाहिए। आखिरकार क्यों अपने पड़ोस में दुनिया के सबसे सफल लोकतंत्र और चीन के लिए उभरते हुए आर्िथक, सैन्य, राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी को लंबे समय तक बर्दाश्त किया जाए!

भारतीय लोकतंत्र की सफलता चीनियों के लिए कुंठा का विषय रही है। झान ली जैसे लोगों की टिप्पणियों से जाहिर है कि यह कुंठा या चिढ़ निरंतर बढ़ रही है। शायद ओलंपिक खेलों के समय तिब्बत में हुए विद्रोह और अब झिनझियांग में उइगुर समुदाय के अलगाववादी आंदोलन की वजह से चीन असुरक्षा बोध का शिकार हो रहा है या फिर शायद भारत के एक समानांतर शक्ति के रूप में उभरने की संभावना को पचाना उसके लिए असंभव हो रहा है।

यह 62 वाला भारत नहीं

चीनी 'विशेषज्ञ' के बयान पर चिंता इसलिए होती है कि वह वहां के राजनैतिक तंत्र के मन में भारत के लिए मौजूद रंजिश की भावना को अनावृत्त करता है। लेकिन उस पर हंसी इसलिए आती है कि बहुत से चीनी विशेषज्ञ और टिप्पणीकार संभवत: आज भी 1962 की मानसिकता में जी रहे हैं। वे बदली हुई भू.राजनैतिक परिस्थितियों से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं जब उनका 'शत्रु' 1950 के दशक के जंग लगे टैंकों और विमानों के युग से बहुत आगे आ चुका है। वह एक राजनैतिक, कूटनीतिक, आर्िथक और परमाणविक महाशक्ति है। ऐसे किसी राष्ट्र को विभाजित या नष्ट करने का प्रयास करने वाला राष्ट्र, भले ही वह अपनी शक्ति को लेकर कितने भी अति.आत्मविश्वास से ग्रस्त क्यों न हो, स्वयं भी विनाशकारी परिणामों का सामना किए बिना नहीं रह सकता।

चीनी राजनैतिक विश्लेषकों के लिए भारतीय लोकतंत्र की शक्तियों, विशेषताओं और सफलता को समझना मुश्किल लगता है। निरंकुश, जवाबदेही से रहित और दमनकारी राजनैतिक व्यवस्था में जीने वालों के लिए उदार भारतीय लोकतंत्र की बहुलवादी, समावेशी प्रकृति, देश का भविष्य तक करने की प्रक्रिया में हर नागरिक की भागीदारी की व्यवस्था एक पहेली है। भारतीय संघ के विभिन्न भागों में मौजूद जिस अनेकता का चीनी विश्लेषक लाभ उठाने की दलील दे रहे हैं वही तो 'विभिन्नता में एकता' पर आधारित इस अद्वितीय लोकतंत्र को जोड़ने वाली कड़ी है। तमिलनाडु, पंजाब, मिजोरम और अन्य क्षेत्रों में बाह्य प्रोत्साहन तथा आंतरिक समस्याओं के कारण समय.समय पर अलगाववादी शक्तियां उभरी हैं। ऐसा विश्व के अधिकांश देशों में होता रहा है। लेकिन ये ताकतें भारत के अस्तित्व के लिए खतरा नहीं बन सकीं तो सिर्फ इसलिए कि लोकतंत्र हमारे स्वभाव में है। हिंदुत्व के उदारतावादी दर्शन के साथ उसका बहुत स्वाभाविक मेल होता है। भारत भले ही राष्ट्र.राज्य की एकतरफा चीनी अवधारणा पर फिट न बैठता हो लेकिन अनंत काल से एक समेकित सभ्यता के रूप में उसका अस्तित्व रहा है। मुस्लिम एवं अंग्रेज शासकों के आने के बाद यही हमारी राजनैतिक एकता में घनीभूत हुई, जो अब एक शाश्वत सत्य के रूप में स्वीकार हो चुकी है। भारत का हर नागरिक इस एकता को ही स्वाभाविक सत्य समझता है और इसमें उसकी अटूट आस्था है जिसे खंडित करने के ख्याली पुलाव पकाए तो बहुतों ने, खा कोई भी न सका।

भारत ने अलगाववादी ताकतों को चीन की भांति सैन्य शक्ति के निर्मम प्रयोग और निरंकुश दमन से नहीं बल्कि लोकतंत्र की शक्ति से जीता है। वही असम, कश्मीर और नगालैंड में भी होगा। वैसे भी भारत को तीस हिस्सों में बांटने वाले चीनी विशेषज्ञ सिर्फ चार.पांच राज्यों में ही समस्याएं खोज पाए। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का यह पांच प्रतिशत भी नहीं है। दूसरी ओर स्वयं चीन का लगभग चालीस प्रतिशत हिस्सा अलगाववादी आंदोलनों की चपेट में है। तमाम अत्याचारों के बावजूद चीन झिनझियांग, तिब्बत, आंतरिक मंगोलिया और हेलोंगजांग में बगावत को शांत करने में नाकाम रहा है। क्या भारत या रूस जैसे चीन के पड़ोसी देश उन्हीं दलीलों का प्रयोग चीन के विरुद्ध नहीं कर सकते जिन्हें झान ली ने भारत के विरुद्ध पेश किया है?

एक निराशाजनक सिलसिला

एक चीनी विशेषज्ञ (जिसके बारे में अब दावा किया गया है कि वह चीन सरकार, कम्युनिस्ट पार्टी या सरकारी संस्थानों से जुड़ा हुआ नहीं है) की टिप्पणियों को लेकर हलचल इसलिए मची है कि इस तरह की टिप्पणिया मौजूदा वैश्विक वास्तविकताओं के अनुकूल नहीं है। वे एशिया की बदली हुई स्थितियों के अनुकूल भी नहीं हैं। यह विस्तारवाद का युग नहीं है। किसी राष्ट्र को समाप्त करने की बात सोचना, भले ही वह कितना भी छोटा राष्ट्र क्यों न हो (कुवैत में इराक ने जो किया उसका हश्र हम जानते हैं), आत्म.विनाशकारी दुस्साहस से अधिक कुछ नहीं है। चीनियों को अपनी सोच में व्यावहारिक होने की भी जरूरत है। जब चीन इतने दशकों में जरा से ताइवान का कुछ नहीं बिगाड़ सका तो वह भारत का भला क्या बिगाड़ सकता है जो धीरे.धीरे वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है? लेकिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और सेना में ऐसे अनेक लोग हैं जो आज भी पांच दशक पुरानी आक्रामक मानसिकता के शिकार हैं। यह आक्रामकता अपने अधिक शक्तिशाली पड़ोसी राष्ट्र रूस के सामने तो काफूर हो जाती है लेकिन जब जापान, भारत, ताइवान आदि का प्रसंग आता है तो इसे मुखर होने में देर नहीं लगती।

चिंता की बात यह है कि झान ली का लेख अपने आप में अकेला नहीं है। कुछ समय पहले 'पीपुल्स डेली' में भी एक लेख छपा था जिसमें भारत को अरुणाचल प्रदेश में सेना की सुरक्षात्मक तैनाती और सड़कें आदि बनाने के खिलाफ चेतावनी दी गई थी। खुद झान ली ने भी डेढ़ साल पहले 'भारत को चेतावनी' नामक एक लेख में कहा था कि भारत फिर से वैसी ही गतिविधियों में लगा है जिनके चलते 1962 का युद्ध हुआ था। झान ली के जिस चाइनीज इंटरनेशनल इन्स्टीट्यूट फार स्ट्रेटेजिक स्टडीज (सीआईआईएसएस) से जुड़े होने की बात कही जा रही है उसकी वेबसाइट पर पिछले दिनों भारत की सैन्य आकांक्षाओं के बारे में भ्रामक लेख छपे हैं। एक लेख में कहा गया है कि भारत चीन का सैनिक तौर पर मुकाबला करने के लिए 150 अरब डालर की रकम खर्च करने वाला है। इस तरह की खबरें चीनी जनमानस को भी जरूर प्रभावित करती होंगी।

प्रसंगवश, चीन के 'ग्लोबल टाइम्स' नामक अखबार द्वारा कराए गए जनमत.सर्वेक्षण पर ध्यान देना दिलचस्प होगा। इसमें भाग लेने वाले करीब 81 फीसदी चीनियों ने कहा कि उनके देश को भारत के अलगाववादी तत्वों को प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन देना चाहिए। सिर्फ पंद्रह प्रतिशत का कहना था कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। यदि इस राय को आम चीनी लोगों की मानसिकता का प्रतिनिधि माना जाए तो हमारे बारे में चीनी धारणाओं की बड़ी नकारात्मक तस्वीर उभरती है। अब भले ही भारत में स्थित चीनी राजदूत दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ताओं तथा पर्यावरण मुद्दे पर हुए सहयोग को लेकर सकारात्मक टिप्पणियां करें लेकिन चीन के बारे में भारतीयों के मन में निरंतर गहरे होते संदेह के बादल महज इन टिप्पणियों से छंट नहीं सकते।

5 comments:

विनय ‘नज़र’ said...

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। जय श्री कृष्ण!!
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INDIAN DEITIES

अनुनाद सिंह said...

अच्छा विश्लेषण ।

जयराम "विप्लव" said...

मतान्तर " एक सार्थक नाम और आपके चिट्ठे की सामग्री ने सार्थकता को साबित किया है । प्रथम बार आपके इस चिट्ठे पर आना हुआ । काफ़ी अच्छा लगा । ब्लॉग्गिंग जगत में फैले निराशाओं के बीच आपका ब्लॉग / न्यूज़ पोर्टल / आशा की किरण जगाते हैं । आजकल जसी प्रकार की गंध अंतरजाल पर मची हुई है वो तो आपको पता हीं है । लेकिन हम जैसे नए लोगों को आपके प्रयासों कोदेख कर संबल मिलता है ।
अब आते हैं आपके इस आलेख की ओर , हमारी विविधता ने हीं तो ५ हज़ार साल से हमें जीवित रखा है । शक , हुन, युची, मुग़ल, मंगोल, तुर्क , अंग्रेज सब के सब आए और यहीं के होकर रह गए । इनमें से दो तेज तरार कौम मुगलों और अंग्रेजों ने थोड़ा बहुत ख़ुद की मौलिक पहचान कायम राखी हुई है । बाकि सब तो यहाँ की विविधतापूर्ण संस्कृति में खो गए / खप गए / पाच गए / समागए / । फ़िर , भी हमें अपनी इस ताकत के दंभ में चीन को नजरअंदाज नही करना चाहिए । आज वैशिक दृष्टि से बदलते समीकरणों के आधार पर भारत को अपनी विदेश निति और आतंरिक सुरक्षा से सम्बंधित मुद्दे , पाकिस्तान को केन्द्र में रख कर नही बल्कि चीन को रखकर , निर्धारित करने चाहिए .

www.janokti.com

www.janokti.blogspot.com

मुनीश ( munish ) said...

oye Jhan Li kee jaan le loonga main !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

जिस शरीर में मन अनुदार होता है, उस शरीर में विचार भी संकीर्ण ही होते हैं. तानाशाह अगर संसार की सच्चाई समझ सकते होते तो शायद स्वयं ही जनतंत्र का रास्ता खोल देते. ऐसे लोगों से कोई विशेष बुद्धिमानी की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. उनको खामोख्याली में जीने दीजिये मगर अपना घर मजबूत रखना तो हमारी ही जिम्मेदारी है जो हमें ही निभानी पड़ेगी.

स्वतन्त्रता दिवस पर शुभकामनाएं!

इतिहास के एक अहम कालखंड से गुजर रही है भारतीय राजनीति। ऐसे कालखंड से, जब हम कई सामान्य राजनेताओं को स्टेट्समैन बनते हुए देखेंगे। ऐसे कालखंड में जब कई स्वनामधन्य महाभाग स्वयं को धूल-धूसरित अवस्था में इतिहास के कूड़ेदान में पड़ा पाएंगे। भारत की शक्ल-सूरत, छवि, ताकत, दर्जे और भविष्य को तय करने वाला वर्तमान है यह। माना कि राजनीति पर लिखना काजर की कोठरी में घुसने के समान है, लेकिन चुप्पी तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है। बोलोगे नहीं तो बात कैसे बनेगी बंधु, क्योंकि दिल्ली तो वैसे ही ऊंचा सुनती है।

बालेन्दु शर्मा दाधीचः नई दिल्ली से संचालित लोकप्रिय हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक। नए मीडिया में खास दिलचस्पी। हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी को करीब लाने के प्रयासों में भी थोड़ी सी भूमिका। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन से पुरस्कृत। अक्षरम आईटी अवार्ड और हिंदी अकादमी का 'ज्ञान प्रौद्योगिकी पुरस्कार' प्राप्त। माइक्रोसॉफ्ट एमवीपी एलुमिनी।
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- माध्यमः निःशुल्क हिंदी वर्ड प्रोसेसर
- संशोधकः विकृत यूनिकोड संशोधक
- मतान्तरः राजनैतिक ब्लॉग
- आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, 2007, न्यूयॉर्क

ईमेलः baalendu@yahoo.com