Tuesday, September 23, 2008

आतंकवाद के खिलाफ कानून अकेला क्या करेगा?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

आतंकवाद का मुकाबला सिर्फ कानून से होता तो अमेरिका को देश में अलग होमलैंड सिक्यूरिटी विभाग बनाने की जरूरत नहीं पड़ती। तब न अमेरिका को नेशनल काउंटर टेररिज्म एजेंसी बनाने की जरूरत थी और न ही रूस को नेशनल एंटी-टेररिज्म कमेटी के गठन की। एक कानून ही पर्याप्त होता तो उसकी मौजूदगी में संसद, रघुनाथ मंदिर और अक्षरधाम मंदिर पर हमले नहीं होते।

एक तरफ कांग्रेस है जो आतंकवाद के प्रति साथी दलों के दबाव और चुनावी स्वार्थ के चलते नरम है। तो दूसरी तरफ भाजपा है जिसके लिए आतंकवाद के सफाए की लड़ाई में सिर्फ पोटा ही महत्वपूर्ण है और कुछ नहीं। पिछले चुनाव के बाद से आतंकवाद के विरुद्ध उसका हर बयान सिर्फ पोटा की वापसी पर केंद्रित है। हमें निर्विवाद रूप से पोटा या उससे भी मजबूत आतंकवाद निरोधक कानून की फौरन जरूरत है, लेकिन सिर्फ कानून ही सब कुछ नहीं है। उसे लागू करना और अदालतों से त्वरित फैसलों की व्यवस्था करना भी उतना ही जरूरी है। आतंकवाद का मुकाबला सिर्फ कानून से होता तो अमेरिका को देश में अलग होमलैंड सिक्यूरिटी विभाग बनाने की जरूरत नहीं पड़ती। तब न अमेरिका को नेशनल काउंटर टेररिज्म एजेंसी बनाने की जरूरत थी और न ही रूस को नेशनल एंटी-टेररिज्म कमेटी के गठन की। एक कानून ही पर्याप्त होता तो उसकी मौजूदगी में संसद, रघुनाथ मंदिर और अक्षरधाम मंदिर पर हमले नहीं होते। चाहे पोटा हो या टाडा, कोई भी कानून आतंकवाद को रोकता नहीं बल्कि आतंकवादी घटना घटित होने और दोषियों के पकड़े जाने के बाद अपना काम शुरू करता है। दोषियों को कड़ी सजा दिया जाना आतंकवादी गतिविधियों के विरुद्ध एक स्वाभाविक अवरोधक जरूर है लेकिन सिर्फ कड़ा कानून ही देश का एकमात्र तारनहार नहीं हो सकता। कड़ा कानून तो बने ही, लेकिन उससे आगे भी सोचा जाए यह जरूरी है।

किसी भी अपराध की तरह आतंकवाद की रोकथाम के लिए भी गुप्तचर व्यवस्था की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि एक चुस्त-दुरुस्त, सक्षम और चालाक खुफिया तंत्र का मूलभूत उद्देश्य ही विनाशकारी घटना को होने से रोकना है। कानून की भूमिका तो घटना के होने के बाद आती है। दुर्भाग्य से हमारा खुफिया तंत्र आतंकवादी घटनाओं से मुकाबला करने में अक्षम सिद्ध हुआ है। औरों की तो छोड़िए हम अपनी संसद तक को आतंकवादी हमले से नहीं बचा सके। खुफिया जानकारी पर केंद्रीय गृह मंत्री का एक और बयान काबिले तारीफ है कि हमें इस बात का तो पता था कि दिल्ली में आतंकवादी हमला होगा, मगर यह नहीं पता था कि कब और कहां होगा। गनीमत है उन्होंने यह नहीं कहा कि आतंकवादियों ने हमले के लिए रवाना होने से पहले हमें बताया नहीं वरना हम हमला होने ही नहीं देते। गृह मंत्री की यह टिप्पणी हमारे खुफिया तंत्र की दयनीय स्थिति भी बयान करती है और खुफिया सूचनाओं के प्रति सरकारी रवैए की भी।

फिलहाल आतंकवाद से मुकाबले का काम पुलिस के हवाले है जो सामान्य अपराधों से निपटने में भी नाकाम सिद्ध होती रही है। वह न प्रशिक्षण, न हथियारों और न ही मानसिकता के लिहाज से आतंकवाद से मुकाबले के लिए तैयार और सक्षम है। इतना ही नहीं, वह नई घटनाओं से सीखने, नई तकनीक को जानने के लिए भी तैयार नहीं दिखती। दिल्ली के गफ्फार मार्केट में लगे सीसीटीवी कैमरे उसके बेपरवाह रवैए के गवाह हैं जिन्होंने कभी किसी घटना को रिकॉर्ड नहीं किया। पुलिस का पाला पारंपरिक अपराधियों से पड़ता आया है मगर आतंकवादी उनसे अलग हैं। वे युवा हैं जिन्हें नए जमाने के तौर-तरीकों का अंदाजा है। वे लगातार सीख रहे हैं, अपराध के इनोवेटिव तरीके अपना रहे हैं। जब आतंकवादियों ने साइकिलों पर बम लगाने शुरू कर दिए तो पुलिस ने साइकिलों की बिक्री पर निगरानी बढ़ा दी। लेकिन दिल्ली में उन्होंने कूड़ेदान में बम रखने शुरू कर दिए। अब पुलिस ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की कानपुर यात्रा के दौरान उनके इक्कीस किलोमीटर लंबे मार्ग से कूड़ेदान हटाने के आदेश दे दिए हैं। यही पुलिसिया मेधा की सीमा है। क्या यह जरूरी है कि आतंकवादी हर स्थान पर कूड़ेदान को ही लक्ष्य बनाएंगे? ईमेल भेजने के लिए आतंकवादियों ने पहले साइबर कैफे का प्रयोग किया था। पुलिस ने साइबर कैफे पर अंकुश लगाया तो उन्होंने वायरलैस इंटरनेट का प्रयोग करना शुरू कर दिया। वे पुलिस से एक कदम आगे चलते हैं और ऐसे कदम पुलिस की कल्पना से बाहर हैं। वह सिर्फ पारंपरिक अपराधों से मुकाबले के लिए ठीक है।

5 comments:

Deepak Bhanre said...

पूरी तरह पुलिस और खुफिया तंत्र को दोषी नही ठहराया जा सकता है .
यह तंत्र ऐसा हो गया है जो इन्हे स्वतंत्र काम करने से रोकता है .

रंजन said...

सही है.. कानुन से क्या होगा... अभी कितने कानुन है.. पर अपराध नहीं होते क्या?

परमजीत बाली said...

सही बात है।कानून बना देनें से कुछ नही होता।आज हर क्षेत्र मे सुधार की जरूरत है।

संजय बेंगाणी said...

स्वतंत्र न्याय प्रणाली की तरह कोई स्वतंत्र तंत्र की आवश्यकता है.

दिनेशराय द्विवेदी said...

आतंकवाद कानून से नहीं रुकेगा। हम आज तक। मादा भ्रूण हत्या और बाल विवाह तो इस के भरोसे रोक नहीं पाए। पूरे देश और समाज को जगाना होगा। और इस में आप की हमारी सभी की भूंमिका है।

इतिहास के एक अहम कालखंड से गुजर रही है भारतीय राजनीति। ऐसे कालखंड से, जब हम कई सामान्य राजनेताओं को स्टेट्समैन बनते हुए देखेंगे। ऐसे कालखंड में जब कई स्वनामधन्य महाभाग स्वयं को धूल-धूसरित अवस्था में इतिहास के कूड़ेदान में पड़ा पाएंगे। भारत की शक्ल-सूरत, छवि, ताकत, दर्जे और भविष्य को तय करने वाला वर्तमान है यह। माना कि राजनीति पर लिखना काजर की कोठरी में घुसने के समान है, लेकिन चुप्पी तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है। बोलोगे नहीं तो बात कैसे बनेगी बंधु, क्योंकि दिल्ली तो वैसे ही ऊंचा सुनती है।

बालेन्दु शर्मा दाधीचः नई दिल्ली से संचालित लोकप्रिय हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक। नए मीडिया में खास दिलचस्पी। हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी को करीब लाने के प्रयासों में भी थोड़ी सी भूमिका। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन से पुरस्कृत। अक्षरम आईटी अवार्ड और हिंदी अकादमी का 'ज्ञान प्रौद्योगिकी पुरस्कार' प्राप्त। माइक्रोसॉफ्ट एमवीपी एलुमिनी।
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- संशोधकः विकृत यूनिकोड संशोधक
- मतान्तरः राजनैतिक ब्लॉग
- आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, 2007, न्यूयॉर्क

ईमेलः baalendu@yahoo.com