हो सकता है कि धीरे-धीरे रूस और चीन के इर्द-गिर्द विभिन्न देशों के एकत्र होने की प्रक्रिया शुरू हो लेकिन अर्थव्यवस्था के प्राधान्य के इस युग में कोई देश अमेरिका की कीमत पर रूस-चीन के खेमे में नहीं जाएगा। न आसियान देश, न खाड़ी देश, न दक्षिण अमेरिकी देश, न नाटो के सदस्य और न ही पूर्व वारसा संधि के अधिकांश सदस्य देश। यही बात कमोबेश भारत पर भी लागू होती है।
विश्व राजनीति में भारत के सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं। पहला, जिसे अब हमने कुछ हद तक कम कर लिया है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं किया, वह है- अमेरिका के विरुद्ध उभरते वैश्विक राजनैतिक तंत्र का हिस्सा बनना। यह तंत्र रूस और चीन के इर्दगिर्द घूमता है। दोनों बड़ी सैनिक, आर्थिक और राजनैतिक शक्तियां हैं और आने वाले एक दशक में बाजार की बड़ी ताकतें बनी रहने की स्थिति में हैं। दूसरी ओर अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्र हैं जो पारंपरिक रूप से विश्व अर्थव्यवस्था पर दबदबा कायम किए हुए हैं। लेकिन उनकी यही स्थिति आगे भी रहेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने तो कह ही दिया है कि अमेरिकी वर्चस्व समापन की ओर अग्रसर है। कुछ कुछ यही बात रूस भी कह रहा है जिसने जार्जिया के मुद्दे पर अमेरिकी प्रभुत्व को खुलेआम चुनौती दी है। चीन तो गाहे-बगाहे अमेरिका के खिलाफ खड़ा होता ही रहा है। विकासशील विश्व में भी अनेक देश अमेरिकी वर्चस्व का विरोध करते हैं।

रूस भारत का पारंपरिक मित्र है और उसके साथ भारत की मित्रता समय की कसौटी पर खरी उतरी है। सोवियत संघ के विघटन के बाद से रूस लगातार मजबूत भी हुआ है और अब उसने वैश्विक शक्ति-केंद्र के रूप में उभरने की अपनी महत्वाकांक्षा भी स्पष्ट कर दी है। लेकिन आज का रूस कल के सोवियत संघ की तुलना में अकेला है। उसके पारंपरिक साथी अमेरिका और यूरोप के खेमे में जा चुके हैं। हां, उसे कुछ नए साथी भी मिले हैं लेकिन गौर कीजिए तो पाएंगे कि वे सभी विश्व राजनीति में दूसरे छोर पर खड़े, अकेले पड़ गए राष्ट्र हैं। मसलन- ईरान और वेनेजुएला। ज्यादातर पूर्व सोवियत गणराज्य आज रूस से दूरी बना चुके हैं। वारसा संधि के देशों में से भी अधिकांश छितरा कर स्वतंत्र विदेश नीति पर चल रहे हैं। रूस आज भी निर्विवाद रूप से एक बड़ी सैनिक और राजनैतिक शक्ति है लेकिन वह विश्व राजनीति का वैसा समानांतर केंद्र नहीं रह गया है जैसा दो दशक पहले तक था। संयुक्त राष्ट्र और अन्य विश्व संस्थाओं में भी उसकी आवाज उतनी मजबूत और फैसलाकुन नहीं रह गई है। वह अमेरिका जैसी महाशक्ति नहीं रह गया है। हो सकता है कि धीरे-धीरे रूस और चीन के इर्द-गिर्द विभिन्न देशों के एकत्र होने की प्रक्रिया शुरू हो लेकिन अर्थव्यवस्था के प्राधान्य के इस युग में कोई देश अमेरिका की कीमत पर रूस-चीन के खेमे में नहीं जाएगा। न आसियान देश, न खाड़ी देश, न दक्षिण अमेरिकी देश, न नाटो के सदस्य और न ही पूर्व वारसा संधि के अधिकांश सदस्य देश।
2 comments:
बेहतरीन आलेख है...
बहुत अच्छा विश्लेषण !! आभार
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