Thursday, August 7, 2008

और अलगाववादी इस जम्मू को पाकिस्तान में मिलाने चले थे?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

जम्मू का आंदोलन चिंताजनक है मगर उसने जम्मू कश्मीर के स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान का हिस्सा होने संबंधी अलगाववादी तत्वों के दावों को परोक्ष रूप से पंचर कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संदेश गया है कि अलगाववादी अलग-थलग पड़ रहे हैं और दर्शक बनने को विवश कर दिए गए हैं।

कश्मीर घाटी में जो हुर्रियत कांफ्रेंस, नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने किया था वही संघ परिवार के संगठन और कुछ कांग्रेसी जम्मू में कर रहे हैं। कश्मीर में केंद्रित संगठनों के अपने सियासी मकसद थे तो जम्मू से संचालित दलों के अपने राजनैतिक उद्देश्य। उनमें से किसी एक को सही और दूसरे को गलत बताकर हम वही गलती करेंगे जो केंद्र की सरकारों ने पिछले साठ सालों में अनेक बार दोहराई है।

श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई 100 एकड़ भूमि के आवंटन का फैसला वापस लेने के विरोध में पिछले चालीस दिन से चल रहा आंदोलन न तो सिर्फ इस मुद्दे तक सीमित है और न ही इस मुद्दे से पैदा हुआ है। इसकी जड़ें जम्मू कश्मीर राज्य में जम्मू क्षेत्र के साथ कई दशकों से चले आए दोयम दर्जे के बर्ताव और घाटी के अधिनायकवाद में छिपी हैं। भारत की आजादी के बाद पिछले छह दशकों में कश्मीरी पार्टियां, भारत सरकार और यहां तक कि विदेशी ताकतें भी घाटी की आवाज को राज्य की जनता की प्रतिनिधि आवाज के रूप में लेती रही हैं। लेकिन कश्मीर घाटी के अलावा भी जम्मू कश्मीर है और अमरनाथ भूमि मुद्दे पर चल रहे आंदोलन ने पहली बार अहसास कराया है कि उसका अपना स्वतंत्र मत है, उसकी अपनी आकांक्षाएं हैं और उसके अपने अधिकार हैं। जम्मूवासियों के मन में दशकों से दमित पीड़ा और आक्रोश कभी भी, किसी भी बड़े मुद्दे के बहाने आज नहीं तो कल, बाहर आना ही था।


जब भारतीय राष्ट्रध्वज हाथ में लिए लोगों के स्वत:स्फूर्त जत्थे आतंकवादियों के डर से मुक्त होकर प्रतिरोध की आवाज बुलंद कर रहे हों, पुलिस तथा सेना तक से मुकाबले को तैयार हों और कर्फ्यू का उल्लंघन कर गोली खाने में संकोच न कर रहे हों तो वह कोई क्षणिक आवेश या किसी राजनैतिक दल द्वारा प्रायोजित क्रोध मात्र नहीं हो सकता। जम्मू ने पहली बार इतने मुखर तरीके से अपने आपको अभिव्यक्त किया है।

यह आंदोलन कश्मीर घाटी में गाहे-बगाहे आयोजित होने वाले बंद, प्रदर्शनों और सभाओं जैसा नहीं है जिनमें भारत के खिलाफ आग उगली जाती है और पाकिस्तानी झंडे लहराए जाते हैं। इसमें राष्ट्र के विरुद्ध कहीं कोई नकार नहीं है बल्कि उसकी सर्वोच्चता का स्वीकार है। माना कि जम्मू के हालात बहुत विकट हैं और स्थिति किसी भी दिशा में जा सकती है लेकिन इन आंदोलनकारियों ने भारतीय राष्ट्रवाद में आस्था का मुखर प्रदर्शन कर सिर्फ धर्म के प्रति अपने लगाव और श्रद्धा को ही अभिव्यक्त नहीं किया है। उनका इस तरह उठ खड़ा होना उन ताकतों का प्रतिरोध भी है जिन्होंने राज्य सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इस जनांदोलन ने जम्मू कश्मीर के स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान का हिस्सा होने संबंधी अलगाववादी तत्वों के दावों को परोक्ष रूप से पंचर किया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संदेश गया है कि जम्मू-कश्मीर अलगाववादियों या पाकिस्तान समर्थकों के साथ हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। बल्कि ऐसे लोग अलग-थलग पड़ रहे हैं और दर्शक बनने को विवश कर दिए गए हैं।

वास्तविकता यह है कि अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक तत्वों को खुद कश्मीर घाटी में भी पूर्ण समर्थन प्राप्त नहीं है। उन्हें मंथन करना चाहिए कि क्या वे जम्मू के इन राष्ट्रवादी तत्वों को पाकिस्तान में मिलाने की बात सोच भी सकते हैं? जम्मू के आंदोलन के कारण भले कुछ और हैं लेकिन उसने अलगाववादी तत्वों को जमीनी हालात की असलियत से वािक़फ करा दिया है जिन्होंने बड़ी कोशिशों से जम्मू कश्मीर को राजनैतिक लिहाज से एक इकाई और स्वयं को उसके स्वाभाविक प्रतिनिधि के रूप में पेश करने की कोशिश की थी।

6 comments:

संजय बेंगाणी said...

आम तौर पर कश्मीर में जब भी लोग बाहर निकलते, पाकिस्तान के झण्डे और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे होते थे, यहाँ तिरंगे को लहराता देख आशाएं जगी है. यह शुभकारी है.

संजय बेंगाणी said...

परम ज्ञानियों को इसमें हिन्दुओं की कट्टरता नजर आती है, ऐसी आग नजर आती है जिसे नदी का पानी ठण्डा नहीं कर सकता, मगर उन्हे तिरंगे नजर नहीं आते.

Cyril Gupta said...

आपने सही कहा, इससे अलगाववादियों के पास यह संदेश गया है कि वो उनको हल्का न लें जो भारत की अखंडता कायम रखना चाहते हैं.

यह भी सही है कि अगर कश्मीरी प्रदर्शनकारियों को सही कहा था, तो इनको भी गलत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कारण वहीं हैं, स्थिती वही, और arguments भी वही हैं.

लेकिन प्रदर्शन जानलेवा न बनें तो सही हो

राजीव रंजन प्रसाद said...

यह विशुद्ध आन्दोलन है और इसके अनेको मायने होंगे। कश्मीर को जम्मू से अलग नहीं देखा जा सकता और अलगाववादियों को इस आन्दोलन नें यह संदेश गहरे दिया है। यह मसला साम्प्रदायिक भी नहीं है वरन पूर्णत: सांस्कृतिक है..
केवल सरकार नहीं देख पाती।

***राजीव रंजन प्रसाद

मिहिरभोज said...

बंधु बङी देर कर दी आपने लिखने मैं,भारत माता की जय बोलते हुए तिरंगा लहराते हुए सीने पर अपनी ही सेना से गोलियां खाते हुए ये लोग स्वतंत्रता सेनानियों से कम नहीं है..पर भारत की आतंकवादियों की समर्थक सरकार हुरियत के आंदोलन के समय इतनी कठोरता से पेश नहीं आयी जितनी की अब आ रही है ....वंदेमातरम्

Mukul said...

जम्मू और कश्मीर में आज जो हालात बने हैं उसकी एकमात्र और सिर्फ एकमात्र वजह हमारे देश के नेता (जिन्हें हम माननीय, परम पूज्य, अन्नदाता भी कह सकते हैं) और केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा साठ वर्षों से किया जा रहा मुस्लिम तुष्टिकरण है। जिनकी मुस्लिम तुष्टिकरण और अलगाववादी नीतियों के कारण आज जम्मू और कश्मीर एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां कोई समाधान होता नहीं दिखता। हमारे देश के कुछ मुस्लिम नेताओं ने पिछले काफी लंबे समय से जम्मू और कश्मीर की मुस्लिम जनता को इस कदर भारत के विरोध में खड़ा कर दिया है कि आज वो ‘पाकिस्तान जिंदाबाद, हिन्दुस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे हैं। ये लोग जिस तरह से भारत में रहकर, भारत का ही खाकर, भारत का ही पहनकर तथा भारतीय दयादृष्टि के पात्र बनकर, बल्कि ये कहना ही उचित होगा कि भारत के ही टुकड़ों पर पलकर, भारत को ही तोड़ने पर आमादा हैं, आजाद होने पर आमादा हैं, अलग राष्ट्र बनाने पर आमादा हैं, तो क्या ये सही कर रहे हैं? क्या हमें इनका कहा मान लेना चाहिए? जैसा कि हम आज तक करते आ रहे हैं? क्या श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन नहीं देनी चाहिए? नहीं ये बिल्कुल भी सही नहीं है और जमीन के टुकड़े को लेकर जो विवाद हो रहा है वो बिल्कुल ही सही दिशा में है, क्योंकि पहले ही बहुत देर हो चुकी है और अगर अब थोड़ी और देर हुई तो शायद कश्मीर भी पाकिस्तान, तिब्बत, म्यांमार और अफगानिस्तान की तरह ही भारत का हिस्सा न रहे।

इतिहास के एक अहम कालखंड से गुजर रही है भारतीय राजनीति। ऐसे कालखंड से, जब हम कई सामान्य राजनेताओं को स्टेट्समैन बनते हुए देखेंगे। ऐसे कालखंड में जब कई स्वनामधन्य महाभाग स्वयं को धूल-धूसरित अवस्था में इतिहास के कूड़ेदान में पड़ा पाएंगे। भारत की शक्ल-सूरत, छवि, ताकत, दर्जे और भविष्य को तय करने वाला वर्तमान है यह। माना कि राजनीति पर लिखना काजर की कोठरी में घुसने के समान है, लेकिन चुप्पी तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है। बोलोगे नहीं तो बात कैसे बनेगी बंधु, क्योंकि दिल्ली तो वैसे ही ऊंचा सुनती है।

बालेन्दु शर्मा दाधीचः नई दिल्ली से संचालित लोकप्रिय हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक। नए मीडिया में खास दिलचस्पी। हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी को करीब लाने के प्रयासों में भी थोड़ी सी भूमिका। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन से पुरस्कृत। अक्षरम आईटी अवार्ड और हिंदी अकादमी का 'ज्ञान प्रौद्योगिकी पुरस्कार' प्राप्त। माइक्रोसॉफ्ट एमवीपी एलुमिनी।
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- आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, 2007, न्यूयॉर्क

ईमेलः baalendu@yahoo.com