Wednesday, August 13, 2008

कश्मीरः बीस साल पीछे ले जाता एक विघटनकारी उफान

बालेन्दु शर्मा दाधीच

`मुजफ्फराबाद मार्च` के रूप में पाकिस्तान और उसके हिमायती संगठनों को मुंहमांगी मुराद मिल गई। व्यापारियों की मजबूरी के नाम पर कश्मीर घाटी को भावनात्मक रूप से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से जोड़ने का यह प्रयास भले ही व्यावहारिक रूप से नाकाम रहा हो लेकिन उसने जम्मू कश्मीर में भारत के राष्ट्रीय उद्देश्यों को काफी नुकसान पहुंचाया है।

जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात से अगर कोई सबसे ज्यादा खुश होगा तो वह है पाकिस्तान। पिछले डेढ़ दो महीनों में राज्य जनमत का जितना बड़ा विभाजन हुआ है वैसा 1990 के दशक के शुरूआती वर्षों में भी नहीं हुआ था जब अलगाववादी आंदोलन अपने चरम पर था। आज जम्मू कश्मीर भारत और पाकिस्तान के समर्थकों के बीच बंटा हुआ है, हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विभाजित है, जम्मू और कश्मीर के बीच दोफाड़ हो चुका है। राज्य के हालात को नियंत्रित करने के लिए बड़ी मुश्किलों से स्थापित किया गया राजनैतिक तंत्र छिन्न-भिन्न हो चुका है, जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण घटक पर्यटन जो बेहद लंबी और कठिन प्रक्रिया के बाद दोबारा पुनर्जीवित हुआ था, उसी तरह से भरभरा कर गिर गया है जैसे 6.8 तीव्रता वाले भूकम्प के आने पर कच्चे, रीढ़हीन, नींव-रहित मकान धराशाई हो जाते हैं। आतंकवाद के विरुद्ध बना जनमानस, अमन-चैन, रोजी-रोटी, कारोबार और विकास के हक में बना जनमानस अलगाववादी नारों के शोर में बुद्धिभ्रमित हो रहा है। कश्मीर घाटी में फिर हिंसा, फिर मौतें, फिर आशंकाएं, फिर अनिश्चितता, फिर आक्रोश व असंतोष का पटाक्षेप हुआ है। यही तो पाकिस्तान चाहता था।

अलगाववादी दलों, घाटी आधारित राजनैतिक दलों और व्यापारियों के समर्थन से होने वाले `मुजफ्फराबाद मार्च` के रूप में पाकिस्तान और उसके हिमायती संगठनों को मुंहमांगी मुराद मिल गई थी। व्यापारियों की मजबूरी के नाम पर कश्मीर घाटी को भावनात्मक रूप से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से जोड़ने का यह प्रयास भले ही व्यावहारिक रूप से नाकाम रहा हो लेकिन उसने जम्मू कश्मीर में भारत के राष्ट्रीय उद्देश्यों को काफी नुकसान पहुंचाया है। इसने कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का समर्थन करने वाले और उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने वाले नए समूह पैदा किए हैं।

उन्नीस सौ सत्तासी के चुनावों में हुई व्यापक धांधली की प्रतिक्रिया में जब कश्मीर में अशांति और असंतोष का दौर शुरू हुआ था तब वहां के आंदोलनों की कमान जेकेएलएफ जैसे संगठनों के हाथ में थी जो जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के हिमायती हैं। यह एक किस्म का राजनैतिक आंदोलन था लेकिन जनरल जिया उल हक के शासनकाल में शुरू किए गए छद्म युद्ध के तहत पाकिस्तान से बड़ी संख्या में आतंकवादी तत्व कश्मीर भेजे गए और घाटी के पाकिस्तान समर्थक नेताओं को हर तरह की मदद दी गई। पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्रों के रूप में आतंकवादियों की सप्लाई की फैक्टरियां स्थापित की गईं। उन्नीस सौ अट्ठासी में जनरल जिया की जिया की मौत के बाद पाकिस्तान में फिर से लोकतांत्रिक आधार पर सत्ता में आए बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ जैसे नेताओं ने भी सैनिक शासन की इस धरोहर से पीछा छुड़ाने की बजाए उसे प्रोत्साहित करना जारी रखा और कश्मीर में अलगाववाद एवं आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए आईएसआई के जरिए भारी मात्रा में धन, हथियारों और जेहादी फिलासफी का निर्यात करते रहे। इस प्रक्रिया को रोकने में भारत सरकार नाकाम रही और कश्मीर के जन-आंदोलन का चेहरा बदल गया।

आज लगभग बीस साल बाद आज घाटी के आंदोलनकारी और अलगाववादी तत्वों की कमान सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक जैसे नेताओं के हाथ में आ चुकी है जो कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना चाहते हैं। इन तत्वों ने जम्मू के आंदोलन की प्रतिक्रिया में `मुजफ्फराबाद मार्च` का ऐलान कर घाटी के असंतोष की धारा को पाकिस्तान के समर्थन की लोकलहर के रूप में पेश करने की कोशिश की है। भारत के लिए और कश्मीर में स्थायी शांति के सपने देखने वालों के लिए ये कोई आशाजनक संकेत नहीं हैं।

मुजफ्फराबाद मार्च के दौरान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के नेताओं द्वारा घाटी के कारोबारियों का स्वागत करने की घोषणा, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चकोटी में आतंकवादी संगठनों और पाक अधिकृत कश्मीर के नेतृत्व का समर्थन प्राप्त लोगों का जमाव, लश्कर ए तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद द्वारा सैयद अली शाह गिलानी से बात कर घाटी के आंदोलन के प्रति सक्रिय समर्थन का ऐलान करना उस अपरिमित प्रसन्नता को अभिव्यक्त करता है जो कश्मीर घाटी के बिगड़ते हालात के चलते एलओसी के उस पार पैदा हुई है। ग्यारह सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों के बाद विश्व भर में जेहादी और आतंकी तत्वों के खिलाफ चली दमदार मुहिम से ऐसी शक्तियां कमोजोर हुई थीं और पाकिस्तान पर पड़ते भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव का असर कश्मीर के जमीनी हालात पर भी दिखाई दे रहा था। जम्मू कश्मीर में हुए चुनावों और दो सरकारों के सफल कामकाज से भी हालात सुधरे थे। लेकिन अमरनाथ श्राइन बोर्ड मुद्दे पर जिस तरह से राज्य के अलग-अलग क्षेत्र व समुदाय परस्पर विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं उसने पाकिस्तान समर्थकों और आतंकवादियों को ऐसा मौका दे दिया है जिसकी उन्हें बेताबी से तलाश थी।

4 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

आपका लेख बहुत बढ़िया लगा. समस्या को अपने-अपने स्तर पर भुनाने का प्रयास चारों तरफ़ से हुआ है. मजे की बात यह है कि समस्या को जन्म देने वालों ने ही इसे आगे बढाया है. हमारी तथाकथिक सरकार ने समस्या को एक फोड़े की तरह पकने का खूब समय दिया. अब जब स्थिति इतनी ख़राब हो गयी है तो समस्या को सुलझाने का नाटक भी खूब कर रहे हैं. आजतक देश में हुई सर्वदलीय बैठकें कितनी समस्याओं को सुलझा चुकी हैं, हम सभी जानते हैं.

समझ में यह नहीं आता कि कुछ एकड़ जमीन को किसी धार्मिक काम में देने से रोकने के पीछे क्या यह लॉजिक ठीक है कि; "कश्मीर के लोगों के पास खेती के लिए ज़मीन कम है इसलिए थोडी सी ज़मीन किसी को नहीं दिया जाना चाहिए."

Jagdish Bhatia said...

जब से आपका यह ब्लॉग शुरू हुआ है, हर लेख पठनीय है।

मिहिरभोज said...

कैंद्र सरकार ने सैक्यूलरपना दिखाने के चक्कर मैं ये सब पंगा मोल लिया है..दरअसल आतंकवादी चाहते ही नहीं कि कोई हिंदु वहां आये इसलिए वहां किसी तरह की सहूलियत दी जाये तो संख्या और बढेगी और फिर वे कश्मीर को क्या कर भारत से अलग दिखा पायेंगे और फिर कोई क्यों कर कशमीर आयेगा अंग्रेजी की कहावत है out of site is out of mind

Balendu Sharma Dadhich said...

शिवकुमारजी, जगदीशजी एवं मिहिर भोज जी, आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद। जगदीशजी की टिप्पणी बहुत संतोष देती है। मेरी कोशिश तो निष्पक्ष एवं तटस्थ रहते हुए सिर्फ भारत के हित में सोचने की है। पता नहीं, मैं इस लक्ष्य के साथ कितना न्याय कर पा रहा हूं।

इतिहास के एक अहम कालखंड से गुजर रही है भारतीय राजनीति। ऐसे कालखंड से, जब हम कई सामान्य राजनेताओं को स्टेट्समैन बनते हुए देखेंगे। ऐसे कालखंड में जब कई स्वनामधन्य महाभाग स्वयं को धूल-धूसरित अवस्था में इतिहास के कूड़ेदान में पड़ा पाएंगे। भारत की शक्ल-सूरत, छवि, ताकत, दर्जे और भविष्य को तय करने वाला वर्तमान है यह। माना कि राजनीति पर लिखना काजर की कोठरी में घुसने के समान है, लेकिन चुप्पी तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है। बोलोगे नहीं तो बात कैसे बनेगी बंधु, क्योंकि दिल्ली तो वैसे ही ऊंचा सुनती है।

बालेन्दु शर्मा दाधीचः नई दिल्ली से संचालित लोकप्रिय हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक। नए मीडिया में खास दिलचस्पी। हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी को करीब लाने के प्रयासों में भी थोड़ी सी भूमिका। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन से पुरस्कृत। अक्षरम आईटी अवार्ड और हिंदी अकादमी का 'ज्ञान प्रौद्योगिकी पुरस्कार' प्राप्त। माइक्रोसॉफ्ट एमवीपी एलुमिनी।
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- संशोधकः विकृत यूनिकोड संशोधक
- मतान्तरः राजनैतिक ब्लॉग
- आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, 2007, न्यूयॉर्क

ईमेलः baalendu@yahoo.com