Saturday, August 9, 2008

तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं बनाना जरूरी कैसे नहीं है?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

समझ में नहीं आता कि जिन धार्मिक स्थानों पर लाखों, करोड़ों लोग श्रद्धापूर्वक जुटते हैं, उनके विकास का दायित्व उसका कैसे नहीं है? फिर भले ही वह हज हाउस का निर्माण हो, ख़्वाजा के दर पर जाने के लिए विशेष रेलगाड़ियां चलाना हो, कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए विशेष रियायतें देना हो, हज़ के लिए आर्थिक मदद देना हो या अमरनाथ के आधार स्थल पर हिंदू तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाओं की स्थापना करने का। ये सभी हमारे धर्मभीरू नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतें हैं जो सरकारी दायित्व के दायरे में आती हैं। इनमें राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। आखिरकार वे तीर्थयात्री हैं, कोई अवांछित तत्व नहीं।

श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को भूमि आवंटित किए जाने के मुद्दे को कश्मीरियत और उसकी विशेष स्थिति पर हमला करार देने वाले राजनेता वही हैं जो इस राज्य को स्वाभाविक रूप से धर्मनिरपेक्ष और विभिन्न समुदायों के सह-अस्तित्व को कश्मीरी संस्कृति की अंतरनिहित विशेषता करार देते हैं। सर्दी, बारिश, बर्फ, प्राकृतिक आपदाओं, खराब रास्तों और आतंकवाद तक की चुनौती का सामना करते हुए उनके राज्य के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल अमरनाथ जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए जरूरी सुविधाओं के निर्माण पर भला कौनसा असांप्रदायिक व्यक्ति आपत्ति कर सकता है? एक धर्मनिरपेक्ष सरकार का अर्थ धर्महीन सरकार नहीं है। उसका अर्थ है सभी धर्मों का सम्मान करने वाली सरकार। समझ में नहीं आता कि जिन धार्मिक स्थानों पर लाखों, करोड़ों लोग श्रद्धापूर्वक जुटते हैं, उनके विकास का दायित्व उसका कैसे नहीं है? फिर भले ही वह हज हाउस का निर्माण हो, ख़्वाजा के दर पर जाने के लिए विशेष रेलगाड़ियां चलाना हो, कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए विशेष रियायतें देना हो, हज़ के लिए आर्थिक मदद देना हो या अमरनाथ के आधार स्थल पर हिंदू तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाओं की स्थापना करने का। ये सभी हमारे नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतें हैं जो सरकारी दायित्व के दायरे में आती हैं। इनमें राजनीति, सांप्रदायिकता या भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। आखिरकार वे तीर्थयात्री हैं, कोई अवांछित तत्व नहीं।

हिंदू तीर्थयात्रियों से होने वाली आमदनी की जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था में कितना बड़ी भूमिका है उसे भुला भी दिया जाए तो कम से कम नैतिक आधार पर ही सही, उनके लिए बुनियादी सुविधाओं के निर्माण की जरूरत को कैसे नकारा जा सकता है? लेकिन इस घटना की तुलना इजराइल से की गई और कहा गया कि केंद्र सरकार राज्य में जनसंख्यामूलक (demographic) परिवर्तन करने पर तुली हुई है जिससे भविष्य में कश्मीरी लोग घाटी में अल्पसंख्यक बनकर रह जाएंगे। घाटी में सरकारी फैसले के खिलाफ जिस तरह का विस्फोटक माहौल बन रहा था उसमें किसी को इस बात का ख्याल करने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि इस भूमि का इस्तेमाल साल में सिर्फ दो महीने के लिए किया जाना था। उन्होंने वैष्णो देवी मंदिर क्षेत्र में कुछ साल पहले किए गए विकास कार्यों के उदाहरण को भी भुला दिया जिसने कश्मीरी संस्कृति या उसके सामाजिक ताने-बाने को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।

अमरनाथ भूमि संबंधी आंदोलन शुरू करने और तेज करने में भले ही राजनैतिक दलों की भूमिका रही हो लेकिन अब यह उनके नियंत्रण से बाहर निकल चुका है। अगर इस मुद्दे का जल्दी हल न निकाला गया तो यह गलत दिशाओं में भी जा सकता है जिनके न सिर्फ कश्मीर बल्कि भारत के लिए भी घातक परिणाम हो सकते हैं। कश्मीर घाटी की आर्थिक नाकेबंदी और आंदोलन का सांप्रदायीकरण ऐसे ही चिंताजनक पहलू हैं जिन्हें रोका जाना जरूरी है। इससे पहले कि मामला जम्मू बनाम कश्मीर का हो जाए, केंद्र सरकार को इस मुद्दे का कोई सर्वमान्य समाधान खोजना होगा। इससे पहले कि कश्मीर घाटी में गंभीर मानवीय संकट पैदा हो जाए, राजनैतिक दलों को इसे चुनावी नफे-नुकसान से ऊपर उठकर देखना होगा। इससे पहले कि पूरी तरह अलग-थलग और अकेले पड़ जाएं, घाटी के राजनेताओं को हालात की नजाकत को समझते हुए कुछ ठोस रियायतें देनी होंगी। वरना जम्मू तो एक लंबे राजनैतिक तूफान के मूड में दिखता है।

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की तरफ से आया यह सुझाव कि विवादित सौ एकड़ जमीन श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को लौटा दी जाए लेकिन उसके इस्तेमाल के लिए दो महीने की शर्त लगा दी जाए, संभवतः मौजूदा विवाद के समाधान का प्रस्थान बिंदु हो सकता है। इसे आधार बनाकर बातचीत शुरू की जाए और दोनों पक्षों की बात सुनते हुए आगे बढ़ा जाए। जरूरत हो तो इसमें संशोधन किए जाएं। इस फार्मूले से कुछ हद तक दोनों पक्षों की बात रह जाती है। जम्मू के पूर्व शासक और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. कर्ण सिंह ने भी एक फार्मूला सुझाया है जिसके तहत अमरनाथ क्षेत्र में सुविधाओं का विकास चरणबद्ध ढंग से किया जाना चाहिए। उन्होंने राज्यपाल को हटाने और अमरनाथ श्राइन बोर्ड में नए, प्रतिष्ठित सदस्यों की नामजदगी की बात भी कही है। हो सकता है कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के जम्मू और कश्मीर दौरे के बाद कुछ अन्य फार्मूले भी सामने आएं। हालांकि संघर्ष समिति के सदस्यों द्वारा उससे मुलाकात न करना निराश करता है। आखिरकार वह सब दलों का प्रतिनिधिमंडल है और उसे नकारना हठधर्मिता की ओर संकेत करता है, जो सकारात्मक नहीं है।

अहम मुद्दा यह है कि इस विवाद को प्राथमिकता के आधार पर लिए जाने की जरूरत है क्योंकि जम्मू बनाम घाटी के विवाद को हिंदू बनाम मुस्लिम का रूप लेते ज्यादा देर नहीं लगेगी।

1 comment:

मिहिरभोज said...

बहुत ही शानदार सारगर्भित पोस्ट है...स्थिति का बहुत सी सही विश्लेषण किया है आपने....

इतिहास के एक अहम कालखंड से गुजर रही है भारतीय राजनीति। ऐसे कालखंड से, जब हम कई सामान्य राजनेताओं को स्टेट्समैन बनते हुए देखेंगे। ऐसे कालखंड में जब कई स्वनामधन्य महाभाग स्वयं को धूल-धूसरित अवस्था में इतिहास के कूड़ेदान में पड़ा पाएंगे। भारत की शक्ल-सूरत, छवि, ताकत, दर्जे और भविष्य को तय करने वाला वर्तमान है यह। माना कि राजनीति पर लिखना काजर की कोठरी में घुसने के समान है, लेकिन चुप्पी तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है। बोलोगे नहीं तो बात कैसे बनेगी बंधु, क्योंकि दिल्ली तो वैसे ही ऊंचा सुनती है।

बालेन्दु शर्मा दाधीचः नई दिल्ली से संचालित लोकप्रिय हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक। नए मीडिया में खास दिलचस्पी। हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी को करीब लाने के प्रयासों में भी थोड़ी सी भूमिका। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन से पुरस्कृत। अक्षरम आईटी अवार्ड और हिंदी अकादमी का 'ज्ञान प्रौद्योगिकी पुरस्कार' प्राप्त। माइक्रोसॉफ्ट एमवीपी एलुमिनी।
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- मतान्तरः राजनैतिक ब्लॉग
- आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, 2007, न्यूयॉर्क

ईमेलः baalendu@yahoo.com